शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

''उपन्यास, भाषा और स्वातंत्र्य चेतना'' [डॉ. पूर्णिमा शर्मा की पुस्तक]


''उपन्यास, भाषा और स्वातंत्र्य चेतना'' 

 [डॉ. पूर्णिमा शर्मा की पुस्तक]

पुस्तक    -    उपन्यास, भाषा और स्वातंत्र्य चेतना (2011)
प्रकाशक -     लेखनी, सरस्वती निवास, यू-9, सुभाष पार्क,
                      नज़दीक सोलंकी रोड, उत्तम नगर, नई दिल्ली - 110 059 (भारत )
मूल्य      -     650 रुपए
आई एस बी एन -  978-81-920827-3-8
कुल पृष्ठ  -    284
आकार   -     डिमाई 
आवरण  -    क्लॉथ (हार्ड बाउंड)
केटेगरी   -    समीक्षा 

पुस्तक के बारे में 

स्वातंत्र्य चेतना किसी व्यक्ति, समूह, समुदाय, समाज अथवा राष्ट्र की प्रतिबंधहीन आत्मनिर्णय के अधिकार के प्रति सजगता और जागरूकता का नाम है, जिसमें विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना के संबंध में स्वेच्छापूर्वक चयन का अधिकार तो शामिल है ही, अपने ऊपर अपने से इतर किसी भी अन्य शक्ति या सत्ता के नियंत्रण अर्थात पराधीनता से मुक्त होने की सजग चेष्टा और विवेक भी शामिल है। स्वातंत्र्य चेतना ही व्यक्तियों, समाजों और राष्ट्रों को पराधीनता से मुक्ति के लिए आंदोलन, संघर्ष और संग्राम की प्रेरणा देती है। आधुनिक भारतीय संदर्भ में यह चेतना 19वीं-20वीं शताब्दी के सांस्कृतिक नवजागरण, समाज सुधार और स्वाधीनता संग्राम के रूप में पुंजीभूत हुई जिसे अन्य साहित्यिक विधाओं के साथ-साथ हिंदी उपन्यास ने भी आत्मसात और अभिव्यक्त किया।

डॉ.पूर्णिमा शर्मा ने अपने ग्रंथ ''उपन्यास, भाषा और स्वातंत्र्य चेतना'' में पहली बार हिंदी उपन्यासों का पाठ-विश्लेषण इसी स्वातंत्र्य चेतना की अभिव्यक्ति की दृष्टि से किया है। इस ग्रंथ में लेखिका ने उपन्यास-भाषा के विश्लेषण के पांच आधार निर्धारित किए हैं - लेखकीय टिप्पणी, संवाद, घटना, भाषण और धारणाओं का  विश्लेषण  तथा इन आधारों पर हिंदी के प्रमुख उपन्यासों की स्वातंत्र्य चेतना और उसकी अभिव्यक्ति की विशद पड़ताल की है।

यह ग्रंथ इस तथ्य की स्थापना करनेवाला अपनी तरह का प्रथम मौलिक प्रयास है कि हिंदी के कथाकारों ने प्रयोजनमूलक भाषा अथवा प्रयुक्तियों के गठन में भी अप्रतिम योगदान दिया है। व्यावहारिक हिंदी के निर्माण में साहित्यिक हिंदी की इस भूमिका पर भाषा चिंतकों को अभी विचार करना है।

साहित्य-भाषा, शैलीविज्ञान और पाठ विश्लेषण के अध्येता इस ग्रंथ की सामग्री को अत्यंत रोचक और उपादेय पाएँगे।
भूमिका

साम्राज्यवाद के राजनैतिक चेहरे और पूँजीवाद के जन-विरोधी चरित्र को सामने लाने वाले प्रेमचंद हिंदी के पहले बड़े लेखक थे। अपने सही रास्ते की तलाश के संकट और विचारधाराओं की चकाचौंध से वे बहुत जल्दी बाहर आ गए थे। इस जल्दी में भी उन्होंने काफ़ी लंबी यात्रा तय कर ली थी और इस कोने से उस कोने तक लगे दिखावटी लैंप पोस्टों को छूते हुए, सबकी सच्चाई उधेड़ कर अपना वह रास्ता बना लिया था, जिसे आज तक हिंदी कथा-साहित्य का सबसे सार्थक रास्ता माना जा रहा है। 

प्रेमचंद के 'रंगभूमि' उपन्यास पर और चाहे जो और जितने आरोप लगें, किंतु इससे किसी को इनकार नहीं होगा कि इस रचना ने बहुत बड़े कैनवस पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद और देशी राजाओं के गठजोड़, स्वाधीनता के लिए किए जाने वाले संघर्ष के तत्कालीन सभी रूपों तथा पूँजीवाद के समाजार्थिक प्रभावों को चित्रित किया। इसके पूर्व वे बेमेल विवाह, दहेज प्रथा, स्त्रियों के लिए शिक्षित होने की आवश्यकता, स्त्री के देह-व्यापार के रास्ते पर चलने के मूल में विद्‍यमान समाजार्थिक कारण, किसानों में शोषण के विरुद्‍ध खडे़ होने के लिए करवट लेती क्रांतिकारी चेतना, सहज-स्वाभाविक संबंधों में रोड़ा बनने वाले धर्म को चुनौती देती युवा-पीढ़ी आदि की झलक अपने उपन्यासों में दर्शा चुके थे। गांधीवादी विचारधारा के प्रति एक समय की उनकी एकांतिक प्रतिबद्‍धता और फिर यथार्थवादी दृष्टिबोध को आत्मसात करके अपने समय की विचारधाराओं की शव-परीक्षा की गहरी कोशिश ने भी प्रेमचंद का एक दूसरा रूप सबके सामने रखा। आधुनिक भारत ने नवजागरण के प्रभाव से व्युत्पन्न विचार-मंथन से जो सीखा था, यह उसी का यथार्थवादी विस्तार था और प्रेमचंद हिंदी कथा-साहित्य में स्वाधीनता की चेतना के सबसे बडे़ व्याख्याता थे। उनके उपन्यासों में उस काल में भारतीय जनता के हृदय में उभरी स्वातंत्र्य-चेतना की व्यापक अभिव्यक्‍ति हुई। यह वही स्वातंत्र्य-चेतना थी, जिसके स्वरूप का गठन समाज, संस्कृति, राजनीति तथा आर्थिक परिस्थितियों के विश्‍लेषण से प्राप्त तत्वों के आधार पर हुआ था और जिसे एक ओर गांधी ने, तो दूसरी ओर भगत सिंह ने अपने-अपने ढंग से पोषित किया था। प्रेमचंद के बाद के अनेक कथाकारों ने इस परंपरा को आगे बढा़या,किसी ने स्वतंत्र रूप से इसी विषय पर उपन्यास लिख कर और किसी ने अन्य विषय को केंद्र में रखते हुए भी स्वातंत्र्य-चेतना से जुड़े प्रसंग उपस्थित करके। 

ध्यान देने की बात यह है कि स्वातंत्र्य-चेतना और स्वाधीनता के लिए किए जाने वाले संघर्ष को अपनी रचनाओं में स्थान देने वाले कथाकारों ने एक ऐसी नई कथा-भाषा का निर्माण भी किया, जो इस चेतना को संभाल सके तथा अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उसकी अभिव्यक्‍ति कर सके। यह कोई कम जोखिम भरा काम नहीं था। कारण यह, कि स्वातंत्र्य-चेतना में एक ओर जहाँ सघन रोमानियत की भूमिका होती है, वहीं असंतोष एवं आक्रोश उसके मूल तत्वों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। यथार्थ के सपाट रास्ते पर चलते हुए एक नवीन व्यवस्था को निर्मित करने की व्याकुल रचनाशीलता उसमें बनी रहती है। कथाकार को इन सभी तत्वों और स्थितियों को आकार देने में समर्थ भाषा का गठन करना होता है। यह एक कठिन साधना है, जिसमें कथाकार को शब्दों, वाक्यों, भाषिक-चिह्नों, मुहावरों,प्रतीकों, बिंबों आदि के प्रयोग का एक सुनियोजित और सुगठित ढाँचा खडा़ करना होता है। भाषा के बीच ही उसे उन पात्रों को भी खडा़ करना होता है, जो उसके प्रत्यक्ष प्रयोक्‍ता भी हैं और उसी के बीच रह कर अपने व्यक्‍तित्व का विकास करने वाली शक्‍तियाँ भी। ऐसे पात्रों की विश्‍वसनीयता उनके द्‍वारा प्रयुक्‍त संवादों में सबसे अधिक प्रकट होती है। इसी के साथ उन प्रतिक्रियाओं में भी सामने आती है, जो इन पात्रों के व्यवहार द्‍वारा विविध संघर्षशील और संक्रमणशील दशाओं में अभिव्यक्‍त होती हैं। अंततः इन समस्त प्रतिक्रियाओं की प्रस्तुति भी भाषा के सहारे ही होती है।

स्वातंत्र्य-चेतना की भाषिक अभिव्यक्‍ति का यह इतना महत्वपूर्ण पक्ष हिंदी आलोचना में उपेक्षित है। इसका एक अर्थ यह है कि हिंदी के कथाकारों ने स्वाधीनता के संदर्भ में जो ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसका मूल्यांकन अब तक अधूरा ही है।

डॉ. पूर्णिमा शर्मा का इस विषय पर केंद्रित यह पूरा ग्रंथ इस संदर्भ में सचमुच एक अभाव की पूर्ति है। उन्होंने प्रेमचंद से प्रारंभ करके गिरिराज किशोर तक चुने हुए कथाकारों की उपन्यास-रचनाओं में स्वातंत्र्य-चेतना की भाषिक-अभिव्यक्‍ति का सूझबूझ के साथ विश्‍लेषण किया है और कथा-भाषा की तत्संबन्धी क्षमता की परीक्षा की है। डॉ. पूर्णिमा शर्मा के इस समालोचना-कर्म से हिंदी-समीक्षा के विकास की परंपरा में एक नवीन कड़ी जुड़ने की आशा है। 

मैं उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।
पूर्व अधिष्ठाता, मानविकी संकाय 
मणिपुर विश्‍व विद्‍यालय 
कांचीपुर, इम्फाल- ७९५ ००३ (मणिपुर)

बुधवार, 6 जुलाई 2011

मणिपुर में हिंदी-आंदोलन : संकल्प और साधना

१८वीं शताब्दी में वैष्णव-पदावली ["ब्रजबुलि-पदों" के नाम से] मणिपुर के मंदिरों में गाई जाने लगी थीं। इसे चैतन्य महाप्रभु के शिष्य वैष्णव धर्म के संदेश के साथ लेकर मणिपुर पहुँचे थे। इन भक्तों की चार विशेषताएँ थीं-


एक- राधाकृष्ण की सरस व मोहक लीलाओं को संगीतमय बनाकर आकर्षक  रूप में प्रस्तुत करना; 
दो- बिना किसी विरोध को जन्म दिए स्थानीय जनता के मन में भक्ति व प्रेम की स्थापना करना; 
तीन- मणिपुर के लौकिक वातावरण को स्वीकार करके भक्ति को पढ़े बे-पढ़े सबके लिए सुलभ बनाना और 
चार- समूह गान की परम्परा। 

धीरे-धीरे वैष्णव-मत का प्रचार-प्रसार बढ़ने लगा। गाँव-गाँव, घर-घर मंदिर बनाए जाने लगे और कीर्तन की ध्वनि गूँजने लगी। मणिपुर के राजा वैष्णव मत में दीक्षित हो गए। इससे राधा-कृष्ण और उनके माध्यम से भारत की वैष्णवी-सांस्कृतिक धारा इस राज्य में बहने लगी।

इस धार्मिक-सांस्कृतिक जागरण का विशेष पहलू है- तीर्थ यात्राओं की परम्परा। राधा और कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाले लोग मथुरा-वृंदावन के उन क्षेत्रों के दर्शन करना अपना परम सौभाग्य मानते थे, जहाँ राधा-कृष्ण ने अपनी लीलाएँ सम्पन्न की थीं। जो साधना-सम्पन्न थे, वे कभी-कभी प्रतिवर्ष इस यात्रा में भाग लेते थे। इसके अतिरिक्त यथा-समय हरिद्वार, काशी, प्रयाग, गया, नवद्वीप आदि की यात्राओं का क्रम चलता रहता था। मणिपुर के राजाओं व सम्पन्न जनसाधारण द्वारा इनमें से कुछ तीर्थ स्थानों पर बनवाए गए मंदिरों व रासमंडलों को आज भी देखा जा सकता है। तीर्थ-यात्राओं का वह आयोजन मणिपुर निवासियों को भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति और ब्रज भाषा तथा हिंदी की बोलियों के निकट सम्पर्क में लाता था। ये लोग जब अपने घरों को लौटते थे तब उन्हें हिंदी के इन रूपों का परिचय प्राप्त हो चुका होता था। साथ ही वे यह भी समझ चुके होते थे कि मणिपुर के बाहर मणिपुरी में काम चलाना कठिन है तथा इसके लिए व्यापक सम्पर्क की भाषा जानना आवश्यक है। यात्रा की सुविधा और सम्पर्क की सरलता के लिए ये धर्म-प्रधान मणिपुरी अनजाने ही हिंदी को अपनी निज की भाषा स्वीकार कर लेते थे। इस प्रकार पहले-पहल हिंदी ने मणिपुर में अपना स्थान बनाया।

भारतवर्ष पर मुसलमानों के आक्रमण के साथ ही प्रव्रजन एकाएक बढ़ना शुरू हुआ। मुसलमानों ने लूट-पाट, राज्य स्थापना और शक्ति के बल पर इस्लाम के प्रचार को उद्देश्य बना कर भारत पर आक्रमण किए। ११ वीं शताब्दी के काल में ज़बरदस्ती धर्म-परिवर्तन का क्रम चल पड़ा था। इसके परिणाम सामने आए। कुछ लोग कत्ल कर दिए गए, कुछ ने प्राणों की रक्षा हेतु धर्म बदलना स्वीकार कर लिया और कुछ ने इधर-उधर भाग कर अपने धर्म की सुरक्षा का प्रयास किया। मणिपुर के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी ऐसे ब्राह्मण परिवारों के वंशज हैं, जिनके पूर्वज अपना धर्म बचाने के लिए इधर चले आए थे। इनमें से काफी ब्राह्मण मिथिला के हैं। गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि से भी इस क्रम में अनेक ब्राह्मण आ गए थे। अन्याय से बचने के लिए ये ब्राह्मण अन्य पूर्वोत्तर राज्यों की भाँति मणिपुर में यत्र-तत्र जहाँ भी अनुकूल परिवेश मिलता था, बस जाते थे। जैसे-जैसे समय बीतता जाता था, ये लोग अपने को स्थानीय परिस्थितियों में ढाल लेते थे। यहाँ की भाषा सीख लेते थे। आज तो मणिपुर के सभी ब्राह्मण शर्मा लिखते हैं किंतु यदि इनके गोत्र पूछे जाएँ तो इनके मूल निवास स्थान का पता लगाना कठिन नहीं है। प्राचीन काल में हिंदी के पक्ष में वातावरण बनाने में इन प्रब्रजित लोगों ने महत्वपूर्ण कार्य किया। इसका कारण यह है कि संस्कृत और हिंदी जानने वाले इन ब्राह्मणों ने अपने को मणिपुरी समाज के अनुकूल बनाकर अपना परम्परागत जीवन कर्म, पौरोहित्य प्रारम्भ कर दिया। ये धार्मिक कृत्य में बीच-बीच में हिंदी का प्रयोग करते थे। मंदिर में भोग चढ़ाने, धार्मिक-भोज और कीर्तन के अवसर पर पुरोहित प्रायः संस्कृत के शब्द भी बोलते थे। वैष्णव धर्म के श्रद्धालु-जन उचित रूप में इन्हें समझ लेते थे। इस प्रकार मणिपुर के जीवन में हिंदी का महत्व बढ़ता गया।

प्राचीन काल से ही अपने बल पर और राजाओं से छात्रवृत्ति प्राप्त करके मणिपुर के बाह्मण बालक संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने नवद्वीप व काशी जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक स्थानों में जाया करते थे। इनमें से काशी के, हिंदी के वातावरण से घिरे होने के कारण संस्कृत के साथ हिंदी का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर लेना इनके लिए बड़ा सहज था। इनमें से अनेक पौरोहित्य कर्म के साथ सक्रिय रूप से हिंदी के प्रचार में जुट जाते थे। कुछ आकर हिंदी का व्यवस्थित शिक्षण भी प्रारम्भ कर देते थे। इनके पूजा-पाट में भी संस्कृत और मणिपुरी के साथ हिंदी का पर्याप्त अंश होना स्वाभाविक था। मणिपुर में ब्राह्मणों के घर में मंदिर और उसके सामने बड़ा सा चौकोर बैठका बनवाने की प्राचीन परम्परा आज भी मिलती है। भगवान के दर्शन के बाद भक्त लोग इसमें इकट्ठे होते थे और एक निश्चित समय पर पुजारी इन्हें उपदेश करते थे। इस उपदेश की मुख्य भाषा मणिपुरी होती थी और बीच-बीच में प्रसंग पड़ने पर हिंदी का प्रयोग होता था। कीर्तन का माध्यम "ब्रजबुलि" की भाषा था ही, इससे हिंदी मणिपुर में बढ़ी। इस प्रकार प्राचीन काल में हिंदी, धर्म तथा संस्कृत भाषा के साथ इस क्षेत्र में आई।

आधुनिक-काल में भारतीय पुनर्जागरण का परिणाम सामाजिक और राष्ट्रीय-जागरण के रूप में सामते आया। महर्षि दयानन्द, महर्षि अरविन्द, राजा राममोहन राय आदि ने सम्पूर्ण भारतीय जीवन को झकझोर दिया। यह अनुभव किया जाने लगा कि रूढ़ सामाजिक-मूल्यों के अस्वीकार के बिना भारतीय समाज को नहीं बचाया जा सकता। इसी प्रकार राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित किया गया। ‘भारतीय जनता के समस्त दुखों का मूल दासता है’ इस सोच ने आधुनिक भारत के निर्माण में क्रांतिकारी सहयोग दिया। हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में खोजनेवाला भी यही नारा था। अंगरेज़ों से इस देश को मुक्त कराने के लिए, भारत की सम्पूर्ण जनता को जगा कर यह बताना आवश्यक था कि अंगरेज़ इस देश के लिए अभिशाप हैं और जितनी जल्दी हो सके, उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होकर खड़े होना अनिवार्य है। इस महान कार्य के लिए भाषाओं की खोज के क्रम में हिंदी का नाम सामने आया। हिंदी ही समस्त भाषाओं में ऐसी थी, जो अधिकांश भारतीय जनता द्वारा बोली और समझी जाती थी। फिर भाषा वैज्ञानिक कारणों से इसे आसानी से सीखा जा सकता था। इसने व्यापार की भाषा के रूप में विशाल क्षेत्र में अपनी पैठ बना ली थी। साथ ही धर्म, इतिहास और संस्कृति के व्यापक भारतीय मानकों को इस भाषा ने बहुत पहले से इस देश के व्यापक क्षेत्र तक पहुँचाना शुरू कर दिया था। इन सब कारणों से एक मत से हिंदी को सामान्य सम्पर्क की भाषा के रूप में मान्यता मिली। आगे चलकर हिंदी को स्वतंत्रता-संघर्ष की मुख्य भाषा बनने का अवसर मिला तथा जनता यह समझने लगी कि भारत के स्वतंत्र होते ही हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित किया जाएगा। इसके साथ ही महात्मा गाँधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने जो आशाएँ जगाईं, उनसे लगने लगा कि हिंदी स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा होगी, जो अंतर्राष्ट्रीय जीवन में भारत को प्रतिष्ठा दिलाएगी, जिसके माध्यम से लोगों को अभिव्यक्ति-क्षमता के साथ-साथ रोज़गार भी मिलेंगे और जो समग्र भारत को एकता के सूत्र में बांधेगी। जनता की इस आशा ने हिंदी-भाषी और हिंदीतर भाषी- दोनों प्रकार के प्रांतों में हिंदी के प्रचार को बल दिया। ज्यों-ज्यों स्वतंत्रता निकट आती गई, वह प्रचार-बल बढ़ता गया। हिंदी के प्रचार के लिए विभिन्न संस्थाएँ सामने आईं। उन्होंने हिंदीतर-भाषी क्षेत्रों में हिंदी के प्रचार-प्रसार का कार्य हाथ में ले लिया। उधर हिंदीतर भाषी क्षेत्रों के जो लोग शिक्षा आदि के लिए हिंदी भाषी क्षेत्रों में जाते थे वे अपने साथ राष्ट्रीय जागरण व हिंदी-प्रेम लेकर अपने-अपने क्षेत्रों में लौटे तथा हिंदी प्रचार कार्य के समर्पित कार्यकर्ता बने। मणिपुर भी इस लहर से अछूता नहीं रहा। परिणामस्वरूप इस राज्य में हिंदी-प्रचार आंदोलन का बीज अंकुरित हुआ।

श्री ललितामाधव शर्मा, श्री बंकबिहारी शर्मा, श्री थोकचोम मधु सिंह, पं. राधामोहन शर्मा एवं श्री कुंजबिहारी सिंह कैशाम को मणिपुर क्षेत्र के हिंदी प्रचार का आदि-स्तम्भ माना जाना चाहिए। इन महानुभावों ने स्वतंत्रता, राष्ट्रीय एकता, सामान्य संपर्क की संभावना, आखिल भारतीय स्तर पर समस्त भारतीय नागरिकों के एक समान सोच, विश्वमंच पर भारत की प्रतिष्ठा की आकांक्षा आदि से प्रेरणा ग्रहण करके मणिपुर के इम्फाल नगर को मुख्यालय बनाया और सारे राज्य में हिंदी-प्रचार का कार्य किया। उस काल में इस क्षेत्र में हिंदी और भारतीय संस्कृति का प्रचार देश-द्रोह माना जाता था। अंगरेज़ सरकार जानती थी कि यदि हिंदी भाषा को फलने-फूलने दिया तो भारत की जनता अपने प्राचीन गौरव के बोध से भर उठेगी, जो उसके भविष्य के लिए अभिशाप सिद्ध होगा। अंगरेज़ यह भी जानते थे कि हिंदी और भारतीय संस्कृति का चोली-दामन का साथ है। हिंदी, मात्र भाषा की शिक्षा का माध्यम नहीं है, वरन उसमें राष्ट्रीय और सामाजिक-संस्कार तथा चारित्रिक-शिक्षा के साथ-साथ स्वाधीनता का ज्ञान कराया जाता है। इससे भाषा और देश-भक्ति, दोनों का बोध साथ-साथ प्राप्त होता है। यह बात ईसाइयत और अंगरेज़ी के प्रचार में प्रत्यक्ष बाधा थी। अतः अंगरेज़ सरकार ने भाषा और धर्म के प्रचार को देशद्रोह करार दिया। प्रचार के लिए बाहर से आनेवालों को हतोत्साहित किया और जो स्थानीय लोग प्रचार-कार्य करना चाहते थे, उन्हें तरह-तरह से डरा-धमका कर इस देश-सेवा से रोकने का प्रयास किया। श्री बंकबिहारी जी ने निकट संबन्धी श्री भागवतदेव शर्मा [जो उन्हीं की प्रेरणा से हिंदी प्रचार में लग गए थे] ने जब राष्ट्रभाषा प्रचार का कार्य शुरु किया तब मणिपुर के तत्कालीन पोलिटिकल एजेन्ट ने उन्हें बुलाकर कहा कि ‘हिंदुस्तान कोई राष्ट्र नहीं है, फिर तुम लोग क्यों राष्ट्रभाषा, राष्ट्रभाषा चिल्लाते हो। यहाँ की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, न तुम किसी राष्ट्रभाषा का प्रचार कर सकते हो।’ इतना ही नहीं उसने इस कार्य के लिए ‘सैडिसस’ शब्द का प्रयोग किया। इससे उस समय की कठिनाइयों का कुछ अंदाज़ लगाया जा सकता है।

किंतु, इन लोगों ने अंगरेज़ सरकार द्वारा पैदा की गई कठिनाइयों को चुनौती के रूप में स्वीकार किया। पहले घर पर ही बच्चों को हिंदी पढ़ाना शुरू किया फिर घर-घर जाकर लोगों को हिंदी और स्वतंत्रता के मह्त्व को समझाना। इस प्रकार बहुत धैर्य के साथ हिंदी के प्रति सामान्य लोगों का रुझान पैदा किया और हिंदी के पठन-पाठन के लिए विद्यालय खोला। इस प्रकार मणिपुर में हिंदी प्रचार के आधुनिक इतिहास की आधारशिला रखी गई।

हिंदी प्रचार के इस प्रारंभिक-काल में तीन नाम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं-- श्री भागवतदेव शर्मा, श्री अरिबम पं. राधामोहन शर्मा और श्री द्विजमणिदेव शर्मा। इनमें से पं. राधामोहन शर्मा को थोकचोम मधु सिंह के साथ मिल कर हिंदी प्रचार के प्रारम्भिक काल में अनेक संकटों का सामना करते हुए हिंदी-विद्यालय शुरू करने और हिंदी का अध्ययन करने का गौरव प्राप्त है। श्री द्विजमणिदेव शर्मा ने मणिपुर के राजा के शिक्षा-सलाहकार के रूप में हिंदी कि सेवा की। इन्हीं के प्रयास से कुछ वर्षों बाद पहली बार हिंदी के कार्य के लिए राजकीय सहायता मिली।

मणिपुर का सबसे पहला विद्यालय थोकचोम मधु सिंह के घर में प्रारम्भ किया गया। श्री थो. मधुसिंह केवल इकतीस वर्ष जीवित रहे, किंतु इस अल्प-अवधि में ही उन्होंने अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यों से मणिपुरी समाज को नई दिशा देने का भरपूर प्रयास किया। उस समय हिंदी की दबी-छुपी प्रतियोगिता बंगला भाषा के साथ भी थी। अंगरेज़ों के साथ काम करनेवाले बंगला भाषी अधिकारी चाहते थे कि यदि अंगरेज़ी हटानी है तो उसके स्थान पर बंगला का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। थो. मधु सिंह ने इस समस्या से निबटने का एक तरीका निकाला। उन्होंने वैचारिक आदान-प्रदान के लिए इम्फाल में ‘डिबेटिंग-क्लब’ की स्थापना की। उस क्लब में कई बार ‘हिंदी की आवश्यकता’ विषय पर वाद-विवाद का आयोजन किया और हिंदी का पक्ष स्वयं प्रस्तुत किया। अपने ज़ोरदार तर्कों के बल पर वे यह सिद्ध करने में सफल रहे कि मणिपुर की जनता के लिए हिंदी पढ़ना-पढ़ाना सबसे उपयोगी और आवश्यक है। इस प्रकार वाद-विवाद से जो विचार बने, उन्हें मूर्त रूप देने के लिए थो. मधु सिंह ने अपने संबंधी श्री कुंजबिहारी सिंह कैशाम और पं. राधामोहन शर्मा के सहयोग से अपने ही घर पर ‘हिंदी विद्यालय’ की स्थापना की। ये तीनों सज्जन इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ाते थे। स्मरणीय है कि उस काल में श्री बंकबिहारी शर्मा भी अपने कांङपोकपी निवासी मित्र पं. जनार्दन शर्मा के सहयोग से घर पर ही मंदिर के सामने के बैठके में लोगों को हिंदी पढ़ाना शुरू कर चुके थे।

कुछ समय बाद श्री कुंजबिहारी सिंह कैशाम ने मोइराङखोम और तेरा कैथेल में हिंदी स्कूल प्रारम्भ किए। उन्होंने आगे चल कर ‘राष्ट्रलिपि स्कूल’ की स्थापना भी की, जो अब मणिपुर सरकार के नियंत्रण में चल रहा है।
मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल

हिंदी की व्यवस्थित शिक्षा देने के लिए १९३३ में इम्फाल के व्यापारी-समाज के विशेष प्रयास से सेठ भैरोदान मोहता [बिकानेरवासी] के नाम पर ‘भैरोदान हिंदी स्कूल’ की स्थापना हुई। इसकी मुहूर्त पूजा पं. राधामोहन शर्मा ने की और समाज के आग्रह पर वे इसी विद्यालय में हिंदी का अध्यपन भी करने लगे। मणिपुर में हिंदी शिक्षण की समस्त सुविधाओं से युक्त यह पहला विद्यालय था, जिसमें अध्यापकों को नियमित वेतन भुगतान पर नियुक्त किया गया। श्री टी. बिशेश्वर शास्त्री के प्रयास से १९५१ में इसका सरकारीकरण हुआ।

संस्थागत हिंदी-प्रचार आंदोलन की दृष्टि से मणिपुर में हिंदी-प्रचार का कार्य १९२७-२८ में ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग’ द्वारा प्रारम्भ हुआ। पहले से ही मणिपुर के जो कार्यकर्ता राष्ट्रीय चेतना से युक्त हो चुके थे, उन्होंने सम्मेलन के कार्य को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। अंगरेज़ सरकार के अनेक विरोधों के बावजूद सम्मेलन ने इस क्षेत्र में परीक्षा केंद्र चलाया तथा हिंदी के प्रचार का कार्य किया। ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा’ के अंतर्गत मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ की स्थापना १९३९-४० में हुई। यह उल्लेखनीय तथ्य है कि प्रारम्भ में अंगरेज़ सरकार ने ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द पर आपत्ति करते हुए इस नाम से कार्य करने की मनाही कर दी थी। इस पर, मूल उद्देश्य को मह्त्व प्रदान करते हुए हिंदी प्रचारकों ने इसका नाम ‘मणिपुर हिंदी प्रचार समिति’ रखकर कार्य करना शुरू किया और जैसे ही अनुकूल अवसर मिला, पुनः ‘मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ नाम रख लिया। इस संस्था द्वारा ५१ राष्ट्रभाषा विद्यालय, १३ राष्ट्रभाषा महाविद्यालय तथा ५० से अधिक परीक्षा केंद्र प्रारम्भ किए गए। १९५९ में इम्फाल जेल में भी एक परीक्षा केंद्र शुरू किया गया, जिससे बंदी लोग हिंदी सीख कर परीक्षा दे सकें।

‘मणिपुर हिंदी प्रचार सभा’, ‘नागरी लिपि प्रचार सभा’, ‘नागा हिंदी विद्यापीठ’, ‘मणिपुर ट्राइबल्स हिंदी सेवा समिति’ आदि अन्य संस्थाएँ हैं, जिन्होंने इस राज्य में हिंदी-आदोलन की जड़ें मज़बूत करने का कार्य किया। ‘अखिल मणिपुर हिंदी शिक्षक संघ’ और ‘मणिपुरी हिंदी शिक्षा संघ’ आदि भी हिंदी का वातावरण तैयार करने का प्रयास करते हैं। केंद्रीय हिंदी शिक्षण योजना [गृह मंत्रालय के नियंत्रण में संचालित कर्मचारी हिंदी शिक्षण योजना], हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान, हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण महाविद्यालय, आकाशवाणी की हिंदी शिक्षण एवं हिंदी कार्यक्रम योजना आदि को भी यदि सम्मिलित किया जाए, तो इस राज्य में हिंदी की अच्छी तस्वीर उभरती है। मणिपुर विश्वविद्यालय में एक समृद्ध हिंदी-विभाग कार्य कर रहा है। यह १९७९ में तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू विश्विविद्यालय विस्तार केंद्र के नियंत्रण में प्रारम्भ हुआ था। इसमें स्नातक कक्षाओं के अध्यापन के साथ ही उच्च स्तरीय शोध कार्य भी किया-कराया जाता है।

मणिपुर राज्य में हिंदी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन भी होता है। ‘युमशकैश’ और ‘महिप पत्रिका’ यहाँ से प्रकाशित होनेवाली नियमित - मासिक एवं त्रैमासिक - पत्रिकाएँ हैं। इसके साथ ही ‘कुन्दोपरेङ्‌’ नामक पत्रिका अनियतकालीन रूप में प्रकाशित होती हैं। स्कूल-कालेज से लेकर विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिकाओं में भी सम्बंधी सामग्री का स्वतंत्र विभाग होता है। ये प्रयास हिंदी-प्रचार के इतिहास में उल्लेखनीय मह्त्व रखते हैं।

मणिपुर राज्य में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार प्रसार में जुटी ‘मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल’ अन्य सभी संस्थाओं से विशिष्ट है। कारण यह, कि इस संस्था ने हिंदी भाषा के प्रचार अथवा परीक्षा संचालन तक ही अपना कार्यक्षेत्र सीमित न रख कर हिंदी एवं मणिपुरी भाषाओं के भाषायी एवं साहित्यिक विकास का स्मरणीय प्रयास किया है। 

स्रोत : भूमिका भाग, ''संकल्प और साधना'' [‘मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल’ और उसके प्रमुख आधार स्तंभों का मूल्यांकन]/ देवराज/मूल्य : ८० रुपए/ प्रकाशक : पत्रिका विभाग, मणिपुर हिंदी परिषद, विधानसभा मार्ग, इम्फाल - ७९५ ००१ [मणिपुर]


[द्रष्टव्य : कलम  / मणिपुर हिंदी परिषद-१ / मणिपुर हिंदी परिषद-२ /मणिपुर हिंदी परिषद-३]

बृहस्पतिवार, 9 दिसम्बर 2010

मानव मन का साक्षी: मणिपुरी बाल साहित्य


मानव मन का साक्षी: मणिपुरी बाल साहित्य

देवराज

उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री के आधार पर वाङ्खैमयुम तोमचौ सिंह ने मणिपुरी भाषा में बाल-साहित्य लेखन की शुरुआत की थी। सन् 1959 में प्रकाशित इबेन्पोक्की वारि उनकी पहली बाल-साहित्य विषयक पुस्तक थी। सन् 1960 में उनकी दूसरी पुस्तक ग्रह यात्रा प्रकाशित हुई। इनमें से पहली पुस्तक में मणिपुरी समाज में प्रचलित लोक कथाओं का बालकों को ध्यान में रखकर पुनर्लेखन किया गया है, अर्थात ये री-टोल्ड कथाएँ हैं, जो जिज्ञासा, आकस्मिक घटना परिवर्तन, मानव और मानवेतर शक्ति के विभिन्न आश्चर्यजनक प्रभावों, पुश-पक्षियों की विस्मयकारी भूमिकाओं तथा मनोरंजन आदि तत्वों से भरपूर हैं। इबेन्पोक्की वारि का अर्थ है, दादी की कहानियाँ। लेखक ने दादी की ओर से कहानी होने का लाभ उठा कर यत्र-तत्र प्रत्यक्ष-परोक्ष उपदेश एवं शिक्षाओं का भी विधान किया है और हल्के-फुल्के रूप में गाँवों, जंगलों तथा नगर-जीवन की जानकारी देकर बालकों का ज्ञान बढ़ाने का प्रयास भी किया है।
वाङ्खैमयुम तोमचौ की दूसरी पुस्तक काल्पनिक विज्ञान कथाओं के माध्यम से बच्चों की कल्पना शक्ति का विकास करने के उद्देश्य से लिखी गई है। उन दिनों यद्यपि किसी ग्रह पर मनुष्य के कदम नहीं पड़े थे, किन्तु इस दिशा में सोवियत रूस और अमेरिका जैसे देशों के वैज्ञानिक महत्वाकांक्षी योजनाओं पर कार्य कर रहे थे। इससे प्रकृति और ब्रह्माण्ड के रहस्यों पर विजय पाने की मनुष्य की दबी हुई आकांक्षा आदिम गुफाओं और आधुनिक प्रयोगशालाओं से बाहर मौखिक और लिखित भाषा में कुलांचें भर रही थी। ग्रह यात्रा शीर्षक पुस्तक में उसी का एक रूप दिखाई देता है, जो बालकों के मनोरंजन के साथ उन्हें विज्ञान संबन्धी रुचि से भी जोड़ता है।
सन् 1961 में लालबाबू सिंह द्वारा लिखित अङाङ् सभा, (बालकों की सभा), खुंन्जा सभा (गाँव की सभा) और मतमगी मङाल (युग-प्रकाश) शीर्षक तीन बाल-पुस्तकंे प्रकाश में आईं। इन सभी में बच्चों के लिए मनोरंजक और शिक्षाप्रद कहानियाँ संकलित हैं। कुछ कहानियों में सरल शैली में मणिपुरी जन-जीवन, संस्कृति और इतिहास की जानकारी भी दी गई है। इस विषयवस्तु की दृष्टि से लाइमयुम कृष्णचन्द्र शर्मा की पुस्तक अङाड्गी लमजिड् वारि (बाल दिग्दर्शक कथाएँ) और हिजम याइमा की रचना, थौ नाफबा खरगी वारि (कुछ वीरों की कथाएँ) भी उल्लेख योग्य हैं। उसी काल में छपी ये कृतियाँ बालकों के लिए बड़ी उपयोगी जानकारी से युक्त हैं। इनके मूल में बाल-मानस को प्रारम्भ से ही अपने समाज और संस्कृति संबन्धी मूल्यों से जोड़ने का भाव भी झलकता है।
बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक के प्रारंभ में ही मणिपुरी बाल-साहित्य को प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक चेतना से संपन्न बनाने का प्रयास भी देखने को मिलता है। यह सर्वज्ञात है कि भारतीय मनीषा का सार-तत्व रामायण और महाभारत की रचना के रूप में प्रस्तुत हुआ था। इनमें इतिहास, पुराण, धर्म, संस्कृति, दर्शन, राजनीति, लोक, समाज, व्यक्ति, न्याय और सबसे बढ़कर जीवन-संघर्ष की चुनौतियों को स्वीकारने के दृढ़ संकल्पों से जुड़े मूल्य विद्यमान हैं। इन विशेषताओं के कारण ये महाग्रंथ आज तक भी विविध रूपों में सभी के प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। बालकों को जीवन के आदर्शों के साथ ही उनको यथार्थ से जोड़ने के लिए भी इनका उपयोग दीर्घ काल से किया जा रहा है। मणिपुरी भाषा में सर्वप्रथम अयेकपम श्यामसुंदर सिंह ने अङाङ्गी रामायन (बाल रामायण) और अङाङ्गी महाभारत (बाल महाभारत) के रूप में राम-कथा तथा महाभारत-कथा का बालकों के बौद्धिक विकास हेतु सरल भाषा-शैली में पुनर्लेखन किया। कुछ वर्षों बाद मणिपुर में हिंदी प्रचार आंदोलन के प्रारम्भिक कार्यकर्ताओं में से एक, तेमेल आबीर सिंह ने भी अङाङ्गी महाभारत नाम पुस्तक की रचना की। राजकुमार सनातोंबा सिंह ने महाभारत कथा को बच्चों के लिए प्रस्तुत करते समय चित्रों का प्रयोग भी किया। उनके द्वारा री-टोल्ड शैली में रचित अङाङ्गी महाभारत पुस्तक में विभिन्न प्रसंगों के चित्र भी दिए गए हैं। इसका उद्देश्य बालकों की रुचि के साथ ही उनकी कल्पना व कलात्मक रुचि का विस्तार करना भी है। निश्चित रूप से बाल-साहित्य के क्षेत्र में यह प्रयास नवीन और अधिक वैज्ञानिक कहा जा सकता है।
सन् 1965 में सगोलसेम इंद्रकुमार ने बालकों के लिए अरबगी अहिङ् (अरब की रातें) पुस्तक प्रस्तुत की। इसकी कहानियाँ अरेबियन नाइट्स की विभिन्न कथाओं के आधार पर लिखी गई हैं, अतः इनमें जिज्ञासा के साथ ही रहस्य-रोमांच भी विद्यमान है। सन् 1966 में इंद्रकुमार की एक और रचना पिनाकियो का प्रकाशन हुआ। पिनाकियो एक रोमांचकारी पात्र है, जिसे केंद्र में रखकर लेखक ने अनेक बालोपयोगी कथाओं का ताना-बाना तैयार किया है। यह प्रकाशन कथा-क्रम (स्टोरी-सिरीज) शैली में हुआ। सगोलसेम इंद्रकुमार आकाशवाणी में कार्यक्रम अधिकारी थे और बाद में उप निदेशक बने। स्वाभाविक रूप से वे भाषा के बालोपयोगी श्रवण और संप्रेषण पक्ष से अच्छी तरह परिचित थे। उनकी ये कहानियाँ आकाशवाणी के बाल कार्यक्रम में सुनाई जाती थीं। बच्चे इनसे आनंद प्राप्त करते थे।
सन् 1966 में ही तंफासना देवी (राजकुमारी तंफासना) की पंचतंत्र शीर्षक बाल पुस्तक प्रकाशित हुई। इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें विष्णु शर्मा के पंचतंत्र की पशु-पक्षियों के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने वाली कथाओं से प्रभावित कहानियाँ हैं। लेखिका ने यथास्थान और यथावश्यक रूप में घटनाओं को नया रूप दिया है तथा उनके आकार को छोटो-बड़ा किया है।
सन् 1968 में फान्जौबम गुलाप बाबू ने बाल-साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा। उनके आने से मणिपुरी बाल-साहित्य के विस्तार की भूमिका तैयार हुई। उन्होंने बालकों के लिए नोङ हौ लैहौ शीर्षक पुस्तक लिखी। इसमें सृष्टि के प्रारम्भ की कथा कही गई है। इसमें बताया गया है कि खोयुम लाइनिङ् थौ प्रथम के माध्यम से पांच तत्वों (मयाइ मङा), अतिया (आकाश), लैपाक (भूमि), मैइ (अग्नि), नुङ्शित (वायु), इशिङ् (जल) का निर्माण हुआ। इसके पश्चात् पा (सोरारेन सिदबा) और पी (लैमरैन) का अवतरण हुआ। पुस्तक में इससे आगे सृष्टि के अस्तित्व में आने की कथा है। लेखक ने इस कथा की प्रस्तुति लीला नाट्य की भाँति की है।
सन् 1968 में ही मणिपुरी बाल-साहित्य लेखन के क्षेत्र में लौबुकतोङ्बम रघुमणि शर्मा के रूप में एक ऐसे प्रतिभाशाली लेखक ने कदम रखा, जिसने विषय-वैविध्य और परिमाण, दोनों ही दृष्टियों से आज तक के इतिहास में सबसे अधिक बाल-साहित्य की रचना की। उन्होंने 1968 में बाल-साहित्य विषयक प्रथम पुस्तक का लेखन-प्रकाशन किया था। तब से अब तक प्रकाशित उनकी पुस्तकों की सूची अग्रांकित है --- भागवतकी वारि (भागवत कथा, 1968), लैबाक्की गाड़ी (मिट्टी की गाड़ी 1973), पंचतंत्रगी वारि (पंचतंत्र की कहानियाँ, 1973), तुलसी, 1974, उपनिषद की वारि (उपनिषद की कहानियाँ, 1974), अङाङ्गी पंचतंत्र (बाल पंचतंत्र, 1982), पंचतंत्रगी वारि खरा (पंचतंत्र की कुछ कहानियाँ, 1983), काङ्नबा वारि खराः प्रथम भाग (कुछ उपयोगी कहानियाँ 1987), लमजिड्, बा, 1887 (पथ प्रदर्शक), कांनबा वारि खराः दूसरा भाग, 1988 मरूप कायनबा (मित्र-वियोग 1988), केसकी फल, (मामले का फैसला, 1987), माचिल-मौपबा (भाई-बहिन, 1988), दधिचिगी त्याग (दधीचि का त्याग, 1990), अखन्नबा वारि (चुनी हुई कहानियाँ, 1992), हिंङ्चाबगी खाबोङ् (दानव की झोली, 1993), को इशाङ्बा (लम्बी दाढ़ी वाला, 1994), लाइबक (भाग्य, 1995), मणि माला-1995, तम्फा-1995, वारि मखल मथेल (तरह-तरह की चुनी हुई कहानयाँ, 1995), लिड्.जेल माङ्नबा- (साहस और एकता, 1993), फजबी- 1995, फुङा वारि खरा (कुछ लोक कथाएँ, 1996) लमनखुम्बा, (बदला, 1998)।
रघुमणि शर्मा द्वारा लिखित इन चौबीस पुस्तकों में पौराणिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक स्रोतों के साथ ही पंचतंत्र जैसी विश्व प्रसिद्ध आख्यायिका को भी आधार सामग्री के रूप में प्रयुक्त किया गया है। ये ऐसे स्रोत हैं, जिन्हें प्रत्येक भारतीय भाषा के बाल-साहित्य लेखकों ने उन्मुक्त भाव से अपनाया है, जिससे इस महादेश के सभी क्षेत्रों के बच्चे समन्वित सांस्कृतिक जानकारी से संपन्न हुए हैं। जैसे अन्य क्षेत्रों में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रसंगों को कहने की शैली विभिन्न लेखकों की अपनी रही है, वही शैली रघुमणि शर्मा की भी है। इस विपुल बाल-साहित्य की दूसरी विशेषता है, लोक-स्रोत का उपयोग। मणिपुरी भाषा में एक शब्द है, ‘‘फुङा वारि’’, जिसका सामान्य अर्थ होगा-अलाव के पास बैठ कर सुनाई जाने वाली कथा। मान्यता है कि पुराने जमाने में आज जैसे मनोरंजन के साधन न होने के कारण यह आशंका बनी रहती थी कि रात का भोजन तैयार होने के पूर्व ही बच्चे सो जाएँगे, फिर उन्हें नींद से जगा कर खिलाना कठिन होगा। इसलिए दादी-नानी उन्हें जगाए रखने के लिए मनोरंजक कहानियाँ सुनाती रहती थीं।
उस काल में यहाँ सर्दी ही अधिक पड़ती थी, अतः कहानी सुनाने का यह कार्य अलाव तापते हुए होता था। इसी से इनका नाम पड़ा फुङ् (अलाव), वारि (कहानी)। इनमें कुछ कहानियाँ पुरानी परंपरा से प्रचलित होती थीं, कुछ कहानियांे में बड़ी बूढ़ियाँ, अपनी ओर से कुछ मिला देतीं और कुछ कहानयाँ पूरी तरह उनकी अपनी कल्पना से बुनी हुई होती थीं। आजकल ये सभी लोक-कथाएँ कहलाती हैं और इनके चलते फुङ्ा वारि का अर्थ लोक-कथा माना जाने लगा है। रघुमणि शर्मा ने इसी फुङ्ा वारि शैली में अनेक बाल-पुस्तकें तैयार की हैं। उन्होंने न केवल भारत, बल्कि अन्य देशों की फुङ्ावारियों का भी पुनर्कथन (पुनर्लेखन) करके अपने वारि मखल मथेल इसी प्रकार की रचना है। ररघुमणि शर्मा ने तीसरे प्रकार की रचनाएँ पूर्णतः अपनी कल्पना के आधार पर प्रस्तुत की हैं। इनमें लेखक की प्रतिभा, बाल मनोविज्ञान की गहन जानकारी, व्यापक विषय-ज्ञान, और कथक्कड़ी का प्रभावकारी समन्वय दिखाई देता हैं। उन्होंने दो बाल-नाटक भी लिखे हैं, जिनमें से एक पंचतंत्र की कथा पर आधारित है। मरूप कायनबा नामक इस नाटक में पिंगलक, कर्तक, संजीवक, दमनक आदि पशु-पात्र हैं। दूसरा नाटक, लिङजेल मान्नबा, पूरी तरह लेखक की मौलिक कल्पना पर आधारित है तथा बालकों को एकता का रहस्य और महत्व समझाता है। अपने स्तर पर दोनों नाटक शिक्षाप्रद हैं।
रघुमणि शर्मा द्वारा रचित बाल-साहित्य में कोइशाङबा विशेष चर्चित है। इसकी कथा स्वर्ण भूमि नामक एक सुखी-संपन्न्न और चोरी जैसी बुराईयों से रहित राज्य की है। बालउपन्यास जैसी यह रचना पढ़ने में रोचक और आकर्षक है। इसमें उल्लिखित स्वर्ण भूमि मणिपुर का एक प्राचीन नाम ‘सना लैबाक’ ही है।
रघुमणि शर्मा के विषय में इस तथ्य का उद्घाटन करना भी आवश्यक है कि उन्होंने एकाधिक नामों से बाल-साहित्य की रचना की है। रघुमणि, रघुमणि शर्मा, आर0एम0शर्मा, रामनाथ देव, तुङ्गनाथ देव, तुङ्गनाथ शर्मा आदि के नाम से उनकी बाल-साहित्य की पुस्तकें उपलब्ध हैं। इस नाम-वैभिन्य के मूल में एक गंभीर और बड़ा कारण है, जीविकोपार्जन की विवशता। स्वतंत्र लेखन को अपनाने वाले रघुमणि शर्मा अपनी अद्भुत प्रतिभा के बल पर विपुल मात्रा में श्रेष्ठ कोटि का बाल-साहित्य रचने के बाद भी एक ही नाम से न तो बार-बार सरकारी पुस्तक क्रय योजना का लाभ उठा सकते थे और न पुरस्कार योजनाओं में शामिल होकर सफल हो सकते थे। इसका उपाय यही था कि वे अलग-अलग नामों से लेखन करें ताकि आजीविका की समस्या भी हल होती रहे और साहित्य-सृजन में निरंतरता भी बनी रहे। यह एक अप्रीतिकर प्रसंग है, जिससे रघुमणि शर्मा के पाठकों को पीड़ा भी पहुँच सकती है, किंतु इतिहास लिखते समय सत्य और तथ्य के प्रकाशन की विवशता के साथ ही इस वास्तविकता का उल्लेख मणिपुरी भाषा के एक बाल-साहित्य लेखक की जीवन-संघर्ष-गाथा को पाठकों के सामने लाने की दृष्टि से भी अनिवार्य है। इस रूप में उनका जीवन-संघर्ष अपने आप में एक ऐसी सक्षम कहानी है, जो साहित्य प्रेमियों को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। इससे हम कम पाठक संख्या वाले, अल्प परिचित तथा प्रोत्साहन की ठोस योजनाओं से दूर रहती आई अनेक भारतीय भाषाओं के लेखकों की व्यावहारिक समस्याओं का सीधा साक्षात्कार कर सकते हैं।
मणिपुरी बाल-साहित्य में एक अभिनव मोड़ 1969 में देखने को मिला। इस वर्ष तत्कालीन मणिपुरी रंगमंच के प्रख्यात पुरुष एच. अङौबा सिंह की पुस्तक फुङा वारि का प्रकाशन हुआ। पहले उल्लेख किया जा चुका है कि इंद्रकुमार सिंह की रचना, पिनाकियो की कहानियाँ आकाशवाणी पर प्रसारित की जाती थीं। लेकिन फुङा वारि में उस लेखक की कहानियाँ हैं, जो उन्हें स्वयं आकाशवाणी के कार्यक्रम में बालकों को सुनाया करता था। एच.अड्.ौबा सिंह आकाशवाणी के इंफाल केन्द्र पर प्रत्येक रविवार को बाल-सभा में कहानी सुनाते थे। वे स्वयं उच्च कोटि के नाट्य-निर्देशक, नाटक-लेखक और अभिनेता थे, अतः उन्होंने लोक-स्रोत से उपलब्ध कथाओं को बालकोपयोगी बनाने के लिए सर्व प्रथम उनमें नाट्य-तत्व का समावेश कराया और बाल-सभा की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए हास्य प्रधान मनोरंजन पर विशेष बल दिया। आकाशवाणी की बाल-सभा को जीवंत बनाने के लिए ऐसा करना स्वाभाविक भी था।
सन् 1971 में लाइश्रम थानिल द्वारा रचित दो बाल पुस्तकें प्रकाशित हुई- पानबा लाइरिक (सफलता की पुस्तक) और अङाङ्गी पाओताक वारि (बाल उपदेश कथाएँ)। इन दोनों पुस्तकों के नाम से ही स्पष्ट है कि लेखक के मन में कहानी से अधिक बच्चों को उपदेश देने और अच्छा नागरिक बनाने की चाह है। स्वाभाविक रूप से यहाँ कहानी पीछे है और उपदेश आगे।
सन् 1980 में पी. कोकङाङ् की पुस्तक लिङ्जल मान्नबा (मतैक्य) का प्रकाशन हुआ। इसके साथ ही उनकी दूसरी बाल-पुस्तक, अङाङ्गी लमचत (बच्चों की सीढ़ी) भी छपी। कोकङाङ् मणिपुरी भाषा के आधुनिकबोध संपन्न कवि रहे हैं, अतः उनकी बाल-कथाओं में लोक और व्यवहार के साथ ही कल्पना की भी अच्छी-खासी भूमिका देखने को मिलती है। वे बालकों को नए युग की संभावनाओं के सामने भी खड़ा करना चाहते रहे होंगे।
सन् 1981 में मणिपुरी और हिंदी, दोनों भाषाओं पर असाधारण अधिकार रखने वाले विद्वान लेखक इबोहल सिंह काङ्जम की बाल-कथा पुस्तक- नयाम्बगी खुदोन (बड़े भाई का उपहार) प्रकाश में आई। इसकी सभी कहानियाँ बालकों को उनके बड़े भाई द्वारा सुनाई जाती हैं। लेखक ने अपने स्वभाव के अनुसार स्थान-स्थान पर सामाजिक जीवन-मूल्यों को बालकों के संस्कारों में
सन् 1988 में वाई0एम0सिंह ने बालकों के लिए वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में रुचि ली और उनकी अतियादा पाइबा (आकाश की उड़ान) शीर्षक पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें बड़ी सरल भाषा में बालकों को हवाईजहाज की निर्माण-कथा सुनाई-समझाई गई है। लेखक की विशेषता है कि उसने वायुयान निर्माण के विभिन्न चरणों की जानकारी देते हुए यान, उड़ान, विमानपत्तन, आकाश आदि की विज्ञान सम्मत तथ्यात्मक जानकारी भी रोचक शैली में प्रदान की है।
सन् 1989 में एक युवा लेखिका देवला देवी ने बच्चों के लिए वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में कदम रखा और वे पूरी तरह उसी को समर्पित हो र्गइं। उनके द्वारा लिखित बाल-विज्ञान साहित्य इस प्रकार है- खङ्बदा कान्नबा- (उपयोगी जानकारी, 1989), अङाङ्गी विज्ञान (बाल-विज्ञान, 1991), खङ्जिनबदा कान्नबा खरा (कुछ जानने योग्य बातें, 1993), मतमगी विज्ञान (आधुनिक विज्ञान, 1993), अकोयबी शक्तम्बू शेइहन्दबा अमसुङ् मसिगी फल (पर्यावरण प्रदूषण और उसके प्रभाव, 1995), ऐखोयगी जगत (हमारा जगत, 1998)। इसके अतिरिक्त उनकी एक बाल-विज्ञान साहित्य की अप्रकाशित पुस्तक इनर्जी अमसुड्. ओयबगी फीभम (ऊर्जा और पर्यावरण) भी है।
देवला देवी ने अब तक बालकों के लिए सबसे अधिक वैज्ञानिक साहित्य का निर्माण किया है। इसके माध्यम से उन्होंने ब्रह्माण्ड की संरचना, सौर-जंगल, सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी का वैज्ञानिक संबंध, सूर्य एवं चंद्र ग्रहण, दिन और रात होने का वैज्ञानिक कारण, पशु-पक्षियों एवं अन्य जीवों का व्यवहार, रहन-सहन, स्वभाव, वनस्पतियों की जानकारी, तत्व, अणु, परमाणु, क्रिया-प्रतिक्रिया का सिद्धांत, वायु, गैस, वाष्पीकरण, निर्वात, भोजन, भूख और शरीर का संबन्ध, प्रोटीन, विटामिन्स और अन्य पुष्टिकारक तत्वों की भूमिका, जल का महत्व, पर्यावरण-प्रदूषण के कारण एवं पर्यावरण-चेतना जैसे महत्वपूर्ण विषयों की उपयोगी जानकारी को बालकों के लिए सुलभ बनाया है। लेखिका ने वैज्ञानिक ज्ञान की सुलभता बढ़ाने के लिए चित्रों का भी भरपूर उपयोग किया है।
सन् 1992 में मणिपुरी भाषा के कहानीकार राजकुमार मणि की पुस्तक, वारिली खीङुल्ली. (कहानी सुनो अनुसरण करो) के प्रथम भाग का प्रकाशन हुआ। इसमें छोटी-छोटी एक सौ एक कहानियाँ हैं। इसी पुस्तक के दूसरे भाग का प्रकाशन 1997 में हुआ। इसमें एक सौ बारह कहानियाँ हैं। राजकुमार मणि की इन पुस्तकों में दी गई कहानियों का आकार लघु है तथा चित्र-दृश्यों पर अधिक बल दिया गया है। कथाकार ने अपने सृजन-कौशल का प्रयोग करते हुए इन्हें कौतूहल-तत्व से परिपूर्ण भी बनाया है। इन पुस्तकों के प्रकाशन में प्रस्तुतीकरण तकनीक और सौंदर्य पर अधिक बल दिए जाने के कारण बालकों के लिए इनका आकर्षण बढ़ गया है।
मणिपुरी बाल-साहित्य के इतिहास में सन् 1999 का वर्ष सबसे महत्वपूर्ण रहा। इस वर्ष मणिपुरी भाषा के पहले बाल-काव्य का प्रकाशन हुआ। सनाकैथेलगी लाइफदिबी बाइ तोनू देवी (समृद्ध बाजार की गुड़िया: द्वारा तोनू देवी) शीर्षक से इस बाल-काव्य की रचना आधुनिक मणिपुरी कविता आंदोलन के प्रारम्भकर्ताओं में से एक, लाइश्रम समरेन्द्र ने की। तोनू देवी गुड़िया बनाने में कुशल मणिपुरी स्त्री है। वह चार खण्डों वाली एक ऐसी कहानी सुनाती है, जिसकी वह स्वयं साक्षी है। कहानी के चारों खंड भी उपखंडों में विभक्त हैं।
इस बाल-काव्य की सबसे बड़ी विशेषता है, कथा में वर्णित कथक्कड़ पात्र का पूरे घटना क्रम में शामिल रहना। दूसरी विशेषता, बच्चों और गुड़िया का विविध खेलों में भाग लेना है। इसकी तीसरी विशेषता इतिहास, परम्परा और रीति-रिवाजों की अनजाने में ही जानकारी देना है और चौथी विशेषता है, बालकोचित अति साधारण भाषा का प्रयोग। इस काव्य-पुस्तक में मणिपुरी गुड़िया तथा अन्य वर्णित घटनओं के चित्र भी दिए गए हैं। ये सारे चित्र कवि समरेन्द्र द्वारा ही बनाए गए हैं। मणिपुरी शैली की गुड़िया का वास्तविक चित्र इसी कविता के साथ देखने को मिलता है।
मणिपुरी बाल-साहित्य अपनी विकास-यात्रा को आगे बढ़ाते हुए नए-नए मार्ग तलाश रहा है। सन् 2002 में मणिपुरी बाल-साहित्य में एक ऐसी पुस्तक शामिल हुई, जिसमें तेरह भाषाओं की बालकथाओं का अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। कंुजो निङोम्बम द्वारा तैयार की गई इस पुस्तक, ख्वाइदगी फजबा वारीमचा तराहुमदोई में असमीया (अनंत देव शर्मा), बंगला (सत्यजीत राय), अंगरेजी (रस्किन बॉण्ड), गुजराती (पन्नालाल पटेल), हिन्दी (भीष्म साहनी), कन्नड (त्रिवेणी), मलयालम (कारूरनीकान्त पिल्लै), मराठी (वी0आर0भागवत), ओड़िया (शान्तनुकुमार आचार्य), पंजाबी (गुरूबख्श सिंह), तमिल (सुन्दर रामस्वामी),तेलुगु (रा0सोमराजन) और उर्दू (सिराज अनवर) की बाल कहानियों का मणिपुरी अनुवाद उपलब्ध है। हम समझ सकते हैं कि मणिपुरी भाषा के इस बाल-साहित्य लेखक ने अपनी मातृ भाषा को समृद्ध बनाने के लिए अत्यधिक परिश्रम किया है। इस प्रकार के और भी प्रयास होने चाहिए।
सन् 2004 में ङाथेम निङोल काङ्बम, ओङ्ग इबेयाइमा की लोक कथा पुस्तक, उमाइबी अमसुङ्, अतै फुङ्गावारि सिङ् का प्रकाशन हुआ इसमें लेखिका ने बालकों के मनोरंजन के लिए कथाओं का ताना-बाना तैयार किया है। इसकी एक बालकथा, वारी ङाङ्बा निङ्थौ एक ऐसे राजा की कहानी है जिसे कहानियाँ सुनने का बहुत शौक था। वह समझता था कि उसे कोई भी कहानी सुना कर उसका मन नहीं भर सकता। उसने अपने राज्य में एक शर्त प्रचारित कर दी कि जो भी व्यक्ति उसे कहानियाँ सुनाकर संतुष्ट कर देता, तो वह उस व्यक्ति के साथ अपनी पुत्री का विवाह करेगा। विवाह के लालच में एक से एक ज्ञानी-पण्डित कहानी सुनाने आता है और राजा प्रतिदिन कहानी सुनने के बाद कह देता है कि उसकी सुनाई कहानी से वह संतुष्ट नहीं है। इस पश्चात् कहानी सुनाने वाले निराश होकर चला जाता और राजा आनन्द मनाते हुए किसी दूसरे कहानी सुनाने वाले की राह देखने लगता। अन्त में एक निर्धन युवक कहानी सुनाने आता है। वह राजा से कहता है कि उसके पास एक ऐसी कहानी है, जिससे राजा का मन अवश्य ही भर जाएगा। राजा उसे वचन देता है कि यदि उसके द्वारा सुनाई गई कहानी से वह संतुष्ट हो जाता है, तो अपनी पुत्री उस युवक को सौंप देगा। युवक कहानी सुनाना शुरू करता है- ‘एक राजा था उसके पास एक कुठला था। कुठला धान से भरा हुआ था। चींटियों को इसका पता चल गया। वे एक दिन आईं और कुठले में से एक-एक धान लेकर चली गईं। इतना कह कर युवक चुप हो गया। राजा ने कहा, इसके बाद क्या हुआ? युवक बोला कि कल फिर चींटियाँ आएँगी, तब कहानी आगे बढ़ेगी। अगले दिन कहानी में चींटियाँ आईं और एक-एक दाना लेकर चली गई। राजा ने कहा कहानी आगे बढ़ाओ। युवक बोला, जब चींटियाँ सारे दाने ले जाएँगी, तभी तो पता चलेगा कि आगे क्या हुआ? राजा युवक की चालाकी समझ गया। उसने हार मान लेने में ही भलाई समझी। युवक राजकुमारी लेकर चला गया।
सन् 2006 में कोईजम शांतिबाला ने मणिपुरी बाल-साहित्य को, तल तरेत (सात रोटियाँ) शीर्षक पुस्तक के माध्यम से विकास का एक नया आयाम प्रदान किया। तल तरेत बाल नाटकों की पुस्तक है। इसमें संग्रहीत बाल नाटकों के शीर्षक हैं, तल तरेत, पातालगी निङ्थौ, चन्द्रकङ्नान, इरेमतोइबी लैमा, ड्रामा तम्बा, तेनबा अनी और चिट्ठी। इनमें से शीर्षक बाल नाटक कतन नामक आलसी और अकर्मण्य युवक की कथा प्रस्तुत करता है। वह अपनी विधवा माँ के साथ रहता है। माँ उसे काम करके कुछ कमाने के लिए कहती है, किन्तु उसके कानों पर जूँ नहीं रेंगती। हार कर एक दिन उसकी माँ सात दिन तक खाने के लिए सात रोटियाँ बनाती है और कतन को देकर प्रदेश भेज देती है। कतन चलते-चलते एक जंगल से गुजरता है। वहाँ एक सरोवर है, जिसमें सात परियाँ जल क्रीड़ा कर रही हैं। उनके खेलने से पानी गन्दा हो गया है। कतन को सरोवर के किनारे पहुँचा देख कर परियाँ उसे सरोवर का मालिक समझती हैं और डर कर छिप जाती हैं। कतन कहता है कि सरोवर में लहरे क्यों उठ़ रही हैं? परियाँ और भी डर जाती हैं। कतन को भूख लगी है। वह एक पेड़ के नीचे बैठ कर रोटियाँ खोलता है और कहता है, कौन सी पहले खाऊँ? पहली बड़ी है, तीसरी मोटी है, सातवीं छोटी है...... अच्छा सबको खा जाता हूँ। परियाँ उसी पेड़ के पीछे छिपी थीं। कतन की बात सुनकर उनके प्राण निकलने लगते हैं। वे उसके सामने आ जाती हैं और क्षमा याचना करती हैं। फिर वे उसे पानी गन्दा करने के बदले एक बकरी देती हैं। कतन बकरी लेकर खुशी-खुशी घर लौटने लगता है। इसी बीच रात हो जाती है। उसे एक निर्धन परिवार में रात काटनी पड़ती है। रात में जब कतन सो जाता है, तो निर्धन पति-पत्नी उसकी बकरी बदल देते हैं। कतन को इस बात का पता नहीं चलता। वह बदली हुई बकरी के साथ घर आ जाता है, किन्तु वह दूध नहीं देती। उसे परियों पर गुस्सा आता है। वह फिर उनके पास जाता है। इसके बाद परियाँ उसे रस्सी और कछुआ देती हैं। यह बाल नाटक मंच पर बहुत अधिक मनोरंजन करता है।
सन् 2007 में पृथ्वीगी फुङ्गावारी खरा शीर्षक पुस्तक का पुनः प्रकाशन हुआ। इसे इसकी लेखिका क्षेत्रियमयुम सुवदनी ने 1994 और 1997 में भी प्रकाशित कराया था। यहाँ इसके उल्लेख का उद्देश्य यह है कि जैसे-जैसे मणिपुरी भाषा का बाल-साहित्य आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ही अपने देश के साथ ही अन्य देशों की बाल-कथाओं को भी उसका अभिन्न अंग बनाया जा रहा है। इस पुस्तक में कोरिया, म्यांमार, फिलिपिंस, मलेशिया, इण्डोनेशिया, तिब्बत, श्रीलंका, पाकिस्तान, चीन, इटली, अफगानिस्तान आदि देशों की कहानियाँ हैं। जब यह पुस्तक पहले पहल प्रकाशित हुई थी, तो इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया था, किन्तु जब इसका प्रकाशन सन् 2007 में हुआ, तो इसने पाठकों पर अत्यधिक प्रभाव छोड़ा। क्षेत्रिमयुम सुवदनी इसके पूर्व सन् 2001 में प्रजातन्त्र चत्पा लैबाक अमगीवारी और 2002 में अवाङ् लोङ्पोक्की फुङ्गावारी शीर्ष पुस्तकों से भी मणिपुरी बाल-साहित्य को पर्याप्त समृद्धि प्रदान कर चुकी हैं।
मणिपुरी बाल-साहित्य के क्षेत्र में गोपाल शर्मा, डॉ0 जामिनी देवी, टी-एच0नोदिया, सनामतुम सिंह, इबोतोम्बी वाइखोम, वीणापाणि देवी, इबोसना खुमन, पृथ्वी मीतै, मधुमंगल आदि भी समय≤ पर पुस्तकाकार और मुक्त रूप में बाल-साहित्य की रचना करते रहे हैं।
मणिपुरी भाषा में बालकों के लिए दो कॉमिक्स भी प्रकाशित हुए हैं। इनमें से एक, हीराचंद्र ऐतिहासिक घटनाओं पर और दूसरा कबुई कैओइबा लोक साहित्य स्रोत पर आधारित है।
मणिपुरी बाल-साहित्य के इस इतिहासपरक सर्वेक्षण के साथ ही कुछ ऐसे तथ्यों पर प्रकाश डालना भी आवश्यक है, जो इस साहित्य और उसके रचनाकार, दोनों के समक्ष उपस्थित समस्याओं का संकेत करते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, साहित्य के इतिहास लेखकों द्वारा बाल-साहित्य की उपेक्षा। यह एक कष्टप्रद सच्चाई है कि मणिपुरी लेखकों ने साहित्येतिहास लेखन पर सबसे कम ध्यान दिया है। पद्मश्री कालाचांद शास्त्री और पद्मश्री खेलचंद्र सिंह ने ही मणिपुरी भाषा में साहित्य का इतिहास लिखा है, लेकिन इनमें से किसी की भी पुस्तक में इतिहास-दृष्टि का समावेश देखने को नहीं मिलता। इनमें बाल-साहित्य की जानकारी का भी सर्वथा अभाव है। राजकुमार झलजीत सिंह ने अंग्रेजी भाषा में मणिपुरी साहित्य का इतिहास लिखा है, किंतु वह प्राचीन और मध्यकाल तक की रचनाओं का ही परिचय देता है। अंग्रेजी में एक इतिहास सी0एच0मणिहार सिंह ने भी तैयार किया है। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित इस ग्रंथ में आधुनिक काल को भी चर्चा का विषय बनाया गया है, किंतु वहाँ भी बाल-साहित्य के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गई है। स्पष्ट है कि मणिपुरी भाषा के साहित्येतिहास लेखकों ने बाल-साहित्य के प्रारंभ, विकास, दशा, स्तर आदि के बारे में न कोई सर्वेक्षण किया है न कोई चिंतन। बाल-साहित्य को सृजनात्मक साहित्य की एक गहन-गंभीर शाखा के रूप में न लिए जाने के कारण बाल-साहित्य के रचनाकार नितांत उपेक्षित बने रहे हैं। सातवें दशक से मणिपुर सरकार के शिक्षा निदेशालय ने बाल-साहित्य के लिए एक पुरस्कार योजना शुरू की थी। ऐसा ही एक प्रयास एस0सी0ई0आर0टी0 ने भी किया था। इन योजनाओं का उद्देश्य लेखन के साथ ही पुस्तक प्रकाशन को भी प्रोत्साहन देना था। यह उद्देश्य निश्चित रूप से ही पूर्ण हुआ, किंतु साहित्य के इतिहास लेखकों द्वारा बाल-साहित्य को फिर भी गंभीरता से नहीं लिया गया। परिणाम सामने है, मणिपुरी बालासाहित्य का कोई वैज्ञानिक और, प्रामाणिक इतिहास आज तक नहीं लिखा जा सका। पिछले वर्षों में कुछ लेखक-संगठनों और सरकारी विभागों द्वारा बाल-साहित्य विषयक कुछ आयोजन हुए हैं, किंतु वे बाल-साहित्य और उसके लेखकों की ओर ध्यान खींचने वाले प्रभावहीन प्रयास भर थे। इतिहास से उनका कोई लेना-देना नहीं था। मणिपुरी बाल-साहित्य के समक्ष एक बड़ी समस्या उसके विकास के लिए किसी ठोस योजना का अभाव है।
एक गंभीर समस्या प्रौढ़ साहित्य के लेखकों का बाल-साहित्य रचना की ओर ध्यान न देना भी है। मणिपुरी भाषा के सैकड़ों नए-पुराने लेखकों में मात्र दो-चार ही ऐसे हैं, जिन्होंने कभी बाल-साहित्य रचा है। इतना ही नहीं, उनकी दृष्टि से बाल-साहित्य लेखकों का कोई गंभीर लेखकीय व्यक्तित्व नहीं है। यह हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में भी है, किंतु मणिपुरी भाषा में संभवतः सबसे अधिक है।
एक बात और, इस आलेख के अनुसार मणिपुरी भाषा में बाल-साहित्य का इतिहास बीसवीं शताब्दी के छठे दशक से प्रारंभ हुआ है। यह निष्कर्ष प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त पुस्तकों और तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। किंतु मौखिक स्रोतों को भी विश्वास योग्य माना जाए तो मणिपुरी भाषा की पहली बाल-साहित्य की पुस्तक सन् 1947 में प्रकाशित हुई थी। कुछ वृद्ध लोगों को उस पुस्तक की क्षीण-सी स्मृति है, किंतु वे पुस्तक और उसके लेखक, दोनों का ही नाम बताने में असमर्थ हैं। उस काल में ङसि दैनिक में बाल-साहित्य के प्रकाशन का तथ्य तो प्रामाणिक ही है, अतः उसी अवधि में किसी पुस्तक की संभावना से भी पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता। तब मणिपुरी बाल-साहित्य के इतिहास को काफी पीछे ले जाना होगा

शुक्रवार, 5 नवम्बर 2010

दीपावली : पाँच अनुभव

दीपावली पाँच अनुभव
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प्रकाश की गतियाँ
गु़ज़रती हैं मस्तिष्क से
हवा खोल देती है
सारे दरवाज़े खिड़कियाँ
दीपों की तेजस्वी दुनिया में
उछल-कूद मचाते बच्चे
जोड़ते हैं किलकारियों के मेले
शहर और गाँव की भेदक रेखा को
सबसे बडी़ चुनौती देते हुए
निश्‍शेष नहीं हुई है अभी
मनुष्य बने रहने की संभावनाएँ॥

(दो)

प्रकाश की भंगिमाएँ
रचती हैं पुकारें
भाषा के पार
अर्थों की सीमाएँ खण्डित करते हुए
घोंसले की नींद में
सपनों की दुनिया रचते बच्चों को
भावुक होकर निहारने के बाद
टहनी पर आ बैठी चिड़िया
सबसे पहले
खोलना शुरु कर देती है
नदी के भीतर आकार लेती
अरुणाभा के अभिनव रहस्य ॥

(तीन)

प्रकाश की लहरें
टकराती हैं रात-दिन
अनंत के तटों से
तोड़ डालती हैं
प्रकाश की लहरें
अनंत के अदृश्य किनारों को
एक और अभिनव अरूप
अनंत रचने के लिए
जहाँ कहीं ठहर जाती हैं
यात्राओं की कल्पनाएँ
वहीं बदलने लगती है
सभ्यता खण्डहरों में॥

(चार)

प्रकाश की ध्वनियाँ
झाँकती हैं नक्षत्रों की आँखों में
पहचानने के लिए
अपनी परछाइयों की
उभरती विलीन होती आकृतियाँ
मन को बाँध लेता है
तितली की उडा़न में
आकाश का निमन्त्रण
जलधर की उँगली थामे
चला आता है इन्द्रधनुष
ठुमक ठुमक
बालकों  की आँखों में
शाम ढले जुगनू 
आवाज़ लगाते घूमते
प्रकाश की ध्वनियों को ॥

(पाँच)

प्रकाश के सैनिक हैं
सूर्य और चन्द्रमा
असंख्य ब्रह्‌माण्डों में
ध्वज-वाहक प्रकाश के
असंख्य सूर्य
असंख्य चन्द्रमा
पेड़ भी हैं
प्रकाश के सैनिक
और आदमी भी.
प्रकाश की सेना का
सबसे पहला सिपाही
लड़ रहा युद्‍ध
अंधेरे के विरुद्‍ध
हर समय
हर जगह ॥


प्रकाश-पर्व पर शुभकामनाएँ देवराज

सोमवार, 6 सितम्बर 2010

दाने की तलाश में चिड़िया

पत्ते प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं जब जड़ों से
तब फसलें नहीं उगतीं
सवाल उबलते हैं खेत की आँखों में
बादल आते हैं गीले कपड़ों की शक्ल में
भेड़ों से बारिश का पता पूछते हुए
नदियों से डरने लगती हैं मछलियाँ
जंगल की डरावनी कहानियां सुनाने लगते हैं
रेत पर हवा के पैरों के निशान
सूखे तालाबों के संगठित आन्दोलन
फैसले करने लगते हैं बाढ़ के खिलाफ
दाने की तलाश में उड़ती चिड़िया
लड़ने लगती है युद्ध भूख के पक्ष में
विरोध की आवाज़ का गला काटने की
योजनाएं बनाने लगते हैं सियार
घास का हरापन फिर भी बचाना चाहता है अपने को
ताकि ज़िंदा रहें गीतों के बोल
बंजारों की बस्तियों में |


शनिवार, 8 मई 2010

घर

                                  
घर से लौटा हूँ
लेकिन लौटा कहाँ हूँ
घर तो मैं कभी गया  ही नहीं
खोजता ज़रूर रहा घर
अपने भीतर अपने बाहर
मगर वह कभी मिला नहीं मुझे
अकेले क्षणों में पिघलते चौराहों पर
आवाजों के ऊंचे पहाड़ पर चढ़ कर
बुलाया भी मैंने घर को
कि आओ यार
एक बार तो आ जाओ मेरे पास
मगर वह सुनता तब ना!
ऐसा  पत्थर-दिल क्यों हो जता है घर ?
दूर क्यों चला जता है घर किसी-किसी से?

मंगलवार, 16 मार्च 2010

लाइहराओबा : मणिपुरी संस्कृति :धार्मिक-अनुष्‍ठान



देवराज




"सनालैबाक" (स्वर्ण-भूमिके नाम से विश्‍व भर में विख्यात मणिपुर भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित राज्य है । बाईस हज़ार तीन सौ छप्पन वर्ग कि०मी० क्षेत्रफ़ल वाला यह राज्य संस्कृति समाज और प्रकृति-वैभव की दृष्‍टि से अपने प्राचीन नाम के अनुरूप स्वर्ण-भूमि ही है । मणिपुर में सर्वाधिक जनसंख्या मीतै (मैतैजाति के लोगों की है ।लाइहराओबा’ इसी जाति का धार्मिक-अनुष्‍ठान है। यह मीतै जाति के गहन जीवन-दर्शनउत्सवप्रियता और कलात्मक-रुचि को एक साथ प्रस्तुत करता है ।



लाइहराओबा से जुडी़ अनेक पौराणिक-कथाएँ मीतै-समाज में प्रचलित हैं । इन्हीं में से एक कथा के अनुसार नौ देवताओं (लाइपुङ्‍थौने मिलकर पृथ्वी को स्वर्ग से उतारा था । उस समय सात देवियाँ (लाइनुरा तरेतजल पर नृत्य कर रही थीं । उन्होंने विशेष नृत्य-भंगिमाओं के साथ पृथ्वी को संभाला और जल पर स्थापित कर दिया । अपने मूल रूप में पृथ्वी बहुत ऊबड़-खाबड़ थी । इसे रहने योग्य बनाने का दायित्व माइबियों (विशेष पुजारिनेंको सौंपा गया । उन्होंने इसे नृत्य-गति-नियंत्रित चरणों से समतल किया । इस प्रकार पृथ्वी का निर्माण हो जाने के बाद अतिया गुरु शिदबा’ और लैमरेन’ ने निश्‍चय किया कि वे किसी सुन्दर घाटी में नृत्य करेंगे । खोज करने पर उन्हें पर्वत-मालाओं से घिरी एक घाटी मिलीजो जल से परिपूर्ण थी । अतिया गुरु शिदबा ने घाटी को परकोटे की तरह घेरे पर्वत-माला में अपने त्रिशूल से तीन छेद कियेजिससे जल बह गया और पृथ्वी निकल आई । गुरु शिदबा और देवी लैमरेन ने अन्य सात देवियों के साथ इस पृथ्वी पर नृत्य किया । माना जाता है कि देवताओं की प्रसन्नता का यह प्रथम नृत्य था । उसी की स्मृति में लाइहराओबा नामक धार्मिक-अनुष्‍ठान संपन्न किया जाता है ।




लाइहराओबा संबन्धी दूसरी कथा के अनुसार सृष्‍टि के प्रारंभ में देवताओं ने सभा करके विचार किया कि देव


-व्यस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिये एक राजा (सलाइलेनकी आवश्‍यकता है । विचार-विमर्श के पश्‍चात नोङ्‍पोक मालङ्‍’ नामक देवता को सलाइलेन बनाने पर सहमति हुई । इसके बाद आनंदोत्सव मनाया गया । उसी की स्मृति में लाइहराओबा की परंपरा शुरु हुई ।





लाइहराओबा से जुडी़ एक और कथा भी प्रचलित है । इसका संबन्ध नोङ्‍पोक निङ्‍थौ’ नामक देवता और पान्थोइबी’ नामक देवी की प्रणय-कथा से है । ऐसा विश्‍वास किया जाता है कि इन दोनों ने तय किया कि पारस्परिक प्रेम का भोग करने के लिये वे दोनों संसारी प्राणी के रूप में जन्म लेकर एक-दूसरे को प्राप्त करेंगे और मानवी-लीला करते हुए प्रेमानंद का अनुभव करेंगे । इसके बाद नोङ्‍पोक निङ्‍थाऔ ने एक जनजातीय बालक और पन्थोइबी ने राज-कन्या के रूप में जन्म लिया । युवावस्था आने पर दोनों के मध्य प्रेम का बीज अंकुरित हो गयाकिन्तु पान्थोइबी का विवाह खाबा वंश के एक युवक के साथ कर दिया गया । ससुराल आने के बाद पान्थोइबी अपने प्रेमी से मिलने के लिये व्याकुल रहने लगी । वह कुछ ऐसे काम करने लगी कि जिनसे नाराज़ होकर उसकी सास उसे घर से निकाल दे और वह सरलता से अपने प्रेमी के पास चली जाए । कभी-कभी वह बाघ की सवारी करती थी । अंन्ततएक दिन वह जनजातीय युवक के रूप में मानव-लीला करते नोङ्‍पोक निङ्‍थौ के पास पहुँच गई । उधर खाबा अपनी पत्‍नी की खोज में निकल पडा़ । चलते-चलते वह उसी स्थान पर पहुँच गयाजहाँ नोङ्‍पोक निङ्‍थौ और पान्थोइबी थे । तब उसने जान लिया कि वे दोनों साधारण मानव न होकर देवता हैं । यह पता चलते ही खाबा और उसके परिवार वालों ने नोङ्‍पोक निङ्‍थौ की पूजा-अर्चना की तथा आनंदोत्सव मनाया । तभी से लाइहराओबा प्रारंभ हुआ ।



लाइहराओबा का संपूर्ण अनुष्‍ठान अनेक चरणों में संपन्न होता है । सबसे पहले लाइ फि सेत‌‍पा’ होता हैजिसके अंतर्गत लाइहराओबा उत्सव के पूर्व देव-स्थान की अच्छी तरह सफ़ाई होती है तथा देवताओं को नव-परिधान अर्पित किया जाता है । इसके पश्‍चात लाइ इकौबा’, अर्थात प्राण-प्रतिष्‍ठा का चरण संपन्न होता है । इसके अंतर्गत माइबा-माइबी (ओझा और वैद्‍य के मिश्रित चरित्र वाले स्त्री-पुरुषनर्तक-दलों और भक्‍तों के साथ देवता के प्राण लेकर आते हैं । ये प्राण एक घडे़ में जल या पृथ्वी से लाए जाते हैं । यह घडा़ विशिष्‍ट वेशभूषा वाली स्त्री सिर पर ढोकर लाती है । प्राणों की रक्षा के लिये परंपरानुमोदित वस्त्र धारण किए भक्‍त-जन उस स्त्री के आगे-पीछे चलते हैं । इसके पश्‍चात होइलाओबा (विशिष्‍ट गायनऔर लाइबौचोङ्‍बा (विशिष्‍ट नृत्यका अवसर आता है । एक ओर सृष्‍ट-उत्पत्ति की कथा विस्तार के साथ गाई जाती हैजबकि दूसरे के अंतर्गत नृत्याभिनय द्‍वारा देवताओं के निवास हेतु झोंपडी़ निर्मित करने का भाव दर्शाने वाला नृत्य किया जाता है । झोंपडी़ में से नोङ्‍पोक निङ्‍थौ बाहर निकलते हैं । उनके हाथ में शगोल काङ्‍जै’ का डण्‍डा (मणिपुरी पोलो में प्रयुक्‍तहोता है । उनकी पान्थोइबी से भेंट होती है और दोनों श्रृंगारिक नृत्य करते हैं । इसके साथ गायन चलता रहता है ।



लाइहराओबा अनुष्‍ठान के अवसर पर गए जाने वाले गीतों को मुख्य रूप से चार वर्गों में रखा जाता है


--- औग्रीखेनचोअनोइरोल और लाइरेम्मा पाओसा । मणिपुरी वर्ष के चार महीनों (लाङ्‍बनमेराहियाङ्‍गैपोइनुको छोड़ कर शेष आठ महीनों (शजिबुकालेनइङाइङेन,थवानवाकचिङ्‍फैरेनलमदामें यह अनुष्‍ठान कभी भी संपन्न किया जा सकता है । इसके मनाने की अवधि तीनपाँचसात या ग्यारह दिन होती है । लाइरोइ, (अर्थात‍ समापनके दिन माइबा-माइबी शोय खाङ्‍बा’ नामक पूजा करके भक्‍त-जनों की अकालरोग आदि से रक्षा की प्रार्थना करते हैं । अन्त में पेना’ नामक लोक-वाद्‍य पर नोङ्‍गरोलनामक गीत गाया जाता है ।



लाइहराओबा मीतै जाति ही नहींसंपूर्ण मणिपुर की प्राचीन संस्कृति के भव्य रूप का प्रतिनिधि अनुष्‍ठान है । विश्‍व-सभ्यता के विकास में ऐसे अनुष्‍ठानों की महती भूमिका है|




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