बुधवार, 29 अप्रैल 2015

कॉकबरक कविताएँ
मूल :-   नंद्कुमार देबबर्मा
वह कहानी



वे कभी खींचा करते थे राजा का रथ
आज भी खीचते जा रहें हैं
वे सात घोड़े ही तो जानते – महसूस करते हैं
राजा का वजन –
सातों घोड़ों के पीछे राजा का ध्वज उठाए
एक और घोड़ा चलता हैं
जिसे मालूम हैं ध्वज का वजन
राजा सदा से यह जानते रहें हैं
सामने खड़ा हैं प्रतिरोध
जिनके हाथों में राइफ़ले हैं , बन्दूके हैं |
जजिया में वे देते हैं
अपनी भूख और अपना दिल ,
वे ही लिखते हैं –
मृत्यु और रक्त से गीत |
राजा के सात घोड़े बहुत पहले ही
सूंघ लेते हैं उस जगह को
जहाँ प्रतिरोध के बीज बोना वर्जित हैं |
युद्ध ख़त्म होता हैं
सातों घोड़ों को मिलती है
झुलसी हुई रोंटिया
सुनहरी झालर से सजाया जाता है
आठवें घोड़ो का मस्तक
राजा के नर्म हाथ
उसकी पीठ सहलाते हैं
घोड़े भी सुनते हैं गीत
सातवाँ घोड़ा गीत बुनता हैं |
जिसके सामने एक दिन परास्त होगा
राजा का सिरस्त्राण  |





नया साल
आश्विन का महीना हैं
समय हैं चील के नीचाई पर उड़ने का |
तिल के बीजो के अंकुरण का
समय हैं धान के पकने का
खेतों के रोने का
और पहाड़ों के हंसने का |
समय हैं पुराने और नए साल के संगम का
समय हैं अभिभावकों के वर – वधु खोजने का
उन्हें परिणय सूत्र में बंधने का ,
जॉरा हैं त्रिंग का ,
नए साल का |



सूखे के बाद वर्षा

                          ‘ इस बार ईश्वर ने दया की हैं –
कह रहे थे वे दोनों ,
उन्होंने पहने थे ,घुटनों तक ऊँचे कपडे
उनके चेहरे पर खिला था भोलापन
और शरीर से फुट रही थी
कीचड़ – मिटटी की गंध
वे खड़े थे , वही जहां सिल रही थी
बारिश , धरती की दरारे और
कर रही थी निरिक्षण
सूखे के बाद के अपने कुशल कार्य की
अब उन्हें ईश्वर की नहीं
एक मनुष्य की जरुरत हैं
जिसकी मुट्ठियों में भरे हों बीज
वे जानते हैं
सूखे के बाद की वर्षा ,
संतान के लिए माँ का अजस्त्र प्रेम हैं | 



पुकार

                                                             करता हूँ रात – दिन इंतज़ार
एक आवाज के लिए
अकेला , मैं  अकेला
जाने कब टकराएगी आवाज से आवाज
और गूंजेगी
समवेत आवाज
जो खिलाएगी जंगल में फूल
क्रांति की राह पर कदम रखने
नई पीढ़ी को सौंपने उसका
दाय – भाग
यह एक आवाज इन्तजार करवाएगी
और कितना .............





संघर्ष की राह

वहीं छोड़ आया था
तेज तीखी आवाज
दबा आया था
पत्थरों के तले
चक्कर लगाती हुई उसके चारों ओर
निकल जाति हैं नदी
पास ही खिला है खुमपुई
लौटता हूँ पुन:
पत्थर हटाने , बात रखने के लिए
अब भी मन को प्रेरित करने के लिए
इंतज़ार में हैं बादल
बुला लाते हैं नवाई को
चाँदनी छिटकाती रात
सुनाती है समूह में कथा
लेकिन
अब कहाँ मिलती है पवित्र ओस
दोस्तों , जंगल अभी भी प्रतीक्षारत है |



नदी किनारे घर

फिर बटोंरुगा सुखे पत्ते
वहीं से जहाँ कुंकॉक के गीत भी
जहरीले हो गए है
मैं नहीं तो कई और
इस समय भी जिसे है
जीवन से गोपन प्रेम
मुझे मालुम है, ऐसे अनगिनत
साथी होंगे खड़े
ह्वागहों – मेकांग के किनारे
जो गा रहे होंगे
कुहासे की चादर चीर
भोर के स्वागत में गीत
लड्न्तराई के गायरींग के
खुल जाएँगे पूर्वी दरवाजे
प्रवेश करेंगी नाना क्रुतुएँ
फूलों की बहार लिए
क्यों न हो
मेरा घर भी नदी किनारे
जिनमें रखी होंगी मेरी संतान के लिए
गोपन कथाएँ
कवि भी तो मनुष्य है
उसकी भी मृत्यु होगी
हत्या भी हो सकती है उसकी
यदि ऐसा हुआ तो
ह्वांगहो , मेकांग , गोमती के समवेत
रुदन से टूट जाएँगे तटबंध
लोगों के पद चिन्ह रेत पर
अमर रह जाएँगें |  

अनुवाद – डॉ. मिलन जमातिया

बुधवार, 22 अप्रैल 2015




                          मणिपुर में हिन्दी लेखन
                                    देवराज



       ‘मणिपुरका सनातन धर्म’ मणिपुर में हिन्दी लेखन परम्परा की पहली पुस्तक है| यह आधुनिक ऋषि कहे जाने वाले पं. अतोम्बापू शर्मा द्वारा लिखी गई और 06 मार्च, सन् 1951 को उन्हीं के द्वारा प्रकाशित की गई|  इसकी अंग्रेज़ी में लिखी गई भूमिका से पता चलता है कि मथुरा में एक धार्मिक सम्मलेन में मणिपुर का प्रतिनिधित्व करने के लिए तत्कालीन मणिपुर-महाराजा ने अतोम्बापू शर्मा को मनोनीत किया था| उस समय वे नवद्वीप प्रवास में थे| उनके मन में विचार आया कि सम्मलेन में भाग लेने वाले धर्म प्रेमी लोगों को मणिपुर में हिन्दू धर्म की स्थिति का परिचय देने के लिए एक पुस्तक लिखी जाए| तब उन्होंने नवद्वीप प्रवास-काल में ही इस पुस्तक की रचना की| मणिपुरका सनातन धर्म में प्रस्तुत सामग्री के विषय में बताने के पूर्व यह जानकारी देना उपयोगी होगा कि हिन्दू धर्म की वैष्णवी उप-धाराओं (रामानंदी और गौडीय वैष्णवी) के मणिपुरी समाज के साथ शताब्दियों के संपर्क के तीन मुख्य प्रभाव देखने में आए| एक यह कि इन दोनों के कर्मकांडीय ढाँचे में वहाँ की अनेक पारम्परीण रीतियों और विश्वासों का समावेश हो गया| दूसरा यह कि वैष्णवी कर्मकांड में संगीत, नृत्य आदि के रूप में ललित कलाओं का जो व्यवहार प्रचलित था, उसे मणिपुरी समाज ने प्रभावित करके नया रूप दे दिया| उदाहरण के लिए मथुरा-वृन्दावन का ‘राधा-कृष्ण रास’ मणिपुर में अपनी लोकनृत्य की प्रकृति को पूरी तरह त्याग कर शास्त्रीय-नृत्य बन चुका है और उससे जुडी गुरुओं की एक पूरी परम्परा खड़ी हो गई है| इसका तीसरा प्रभाव यह हुआ कि वैष्णवी धारा में पूरी तरह डूबे हुए धर्म-चिंतकों ने मणिपुरी समाज के मूल धार्मिक और पौराणिक विश्वासों की व्याख्या हिन्दू धर्म के मिथकों के अनुरूप करने का प्रयास किया| इसके सबसे सटीक उदाहरण अतोम्बापू शर्मा हैं| उनकी मणिपुरका सनातन धर्म पुस्तक से दो उदाहरण देखे जा सकते हैं--- इस जगत की सृष्टि पहले जल ही जल था| इस समय लाइ पुङ्थौ नामक नौ देवगण ने स्वर्ग से मत्ति दी थी| तब लाइनुरा नामक एक सात देवताओं जल के ऊपर नर्तन करती रही थीं| उन्होंने उस मत्ति लेकर जल में डाल दी थी| यह एक दण्ड में एक तापु हुआ| इस तरह आठ दंडों में आठ तापुएँ हुए, पर उन देवताओं ने उन आठ तापूपर विश्राम कर सुरापान किया......(पृ. 21) |इससे सृष्टि की उत्पत्ति के सम्बंध में मणिपुरी पौराणिक विश्वास का संकेत मिलता है| अब एक दूसरा उदाहरण इसी पुस्तक से देखें---मणिपुरी लोग इस प्रकार पूर्ब्ब तरफ एक पर्व्बकाल से पार्व्बती परमेश्वर की उपासना कर रहे हैं| उन लोगों देबलीला में सदाशिब को चिब, शिव महादेव इत्यादि नाम से कहते हैं| पार्वती को तम्बा अर्थात् अम्बा लाइरेम्मा इत्यादि नाम से कहते हैं| नरलीला में सदाशिव को नोंपोक निंथौ अर्थात् पूर्बेश्वर नाम से और पार्व्बती को नोंपाक पानाथोइबी अर्थात् पूर्व्बेश्वरी कहते हैं..(पृ. 14-15)| यह स्पष्ट रूप से मणिपुरी पौराणिक मिथकों और देवी-देवताओं की हिन्दू मिथकों और देवी-देवताओं के सन्दर्भ में की गई व्याख्या है| इस विचार बिंदु से अलग हट कर पुस्तक की भाषा संरचना पर ध्यान दें, तो मणिपुर में हिन्दी लेखन परम्परा की एकदम शुरुआत में प्रयुक्त भाषा का अध्ययन शोध का एक रोचक विषय हो सकता है| पं. अतोम्बापू शर्मा मूलत: संस्कृत और अंग्रेज़ी के विद्वान थे| हिन्दी का उनका ज्ञान सामान्य ही था| हाँ, तत्कालीन परिवेश में वे काफी परिचित हो गए थे| इस कारण उन्होंने इस पुस्तक में जो हिन्दी लिखी है, उस पर बंगला भाषा का अतिशय प्रभाव है| पहले उद्धरण में, आठ तापुए हुए, पर उन देवताओं का प्रयोग हुआ है| यहाँ ‘पर’ का अर्थ हिन्दी का ‘परन्तु’ या ‘लेकिन’ न होकर बंगला का ‘बाद में’ या ‘अनंतर’ है| इसी प्रकार अतोम्बापू शर्मा ने लिपि लेखन में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की तत्कालीन लिपि नीति का अनुसरण किया है| ये तथ्य हमें शोध के अनेक अवसर प्रदान करते हैं|     
       धर्म और संस्कृति केंद्रित लेखन में आगे चल ‘मणिपुरी संस्कृति : एक झाँकी’, ‘मणिपुर : एक सांस्कृतिक झलक’, हिन्दू धर्म के मूल तत्व’, ‘भारतीय संस्कृति की आधारशिला’, ‘सिद्धेश्वर चालीसा’ पुस्तकें प्रकाशित हुईं| संस्कृति संबंधी कुछ सामग्री दो संपादित पुस्तकों, ‘मणिपुर : विविध सन्दर्भ’ तथा ‘मणिपुर : भाषा और संस्कृति’ में भी उपलब्ध है| इन सभी में मणिपुर के परम्परागत त्योहारों, धार्मिक नृत्य गीतों, लोकोत्सवों, प्राचीन खेलों, पौराणिक (पुया) ग्रंथों और हिन्दू धर्म की प्रचलित व्याख्या दी गई है और कुछ में लेखकों ने उत्साह के आवेश में इतिहास, भाषा, साहित्य, दर्शनीय स्थलों आदि की सामान्य जानकारी भी दी है| यह कहना सही होगा कि संस्कृति जैसे विषय पर यह बहुत सतही लेखन है और अभी भी मणिपुरी संस्कृति पर एक शोधपरक कृति की प्रतीक्षा बनी हुई है| नृत्य के सम्बन्ध में अवश्य ही गुरु बनमाली सिंह की पुस्तक ‘मणिपुरी नर्तन कला’ एक अच्छा प्रयास है| इस पुस्तक के उन्नीस अध्यायों में मणिपुरी नृत्य का इतिहास, रासलीला, संकीर्तन, लाइहराओबा, मणिपुरी नृत्य की तकनीक, रवीन्द्रनाथ और मणिपुरी नृत्य, मणिपुर के प्रमुख नृत्य गुरु, मणिपुरी संगीत आदि की इतनी जानकारी अवश्य दी गई है कि उसे पढ़ कर पाठक अपने को समृद्ध कर सकता है|
       मणिपुर की हिन्दी लेखन परम्परा में दूसरी कृति ‘खम्बा-थोइबी’ शीर्षक उपन्यास है| लोइतोङ्बम कालाचाँद सिंह द्वारा लिखित यह उपन्यास सन् 1963 में प्रकाशित हुआ| इसका कथानक खम्बा-थोइबी नामक विश्व प्रसिद्द लोकगाथा से ग्रहण किया गया है, जिसे उपन्यासकार ने ग्यारह परिच्छेदों में प्रस्तुत किया है| कुछ परिच्छेदों के अंतर्गत एकाधिक उप-शीर्षकों की आयोजना की गई है, जैसे पहला परिच्छेद (स्थान, गाय चराना, खम्ब का अज्ञातवास), दूसरा परिच्छेद (कांग खेलना, जाल से मछ्हली पकडना, होकी का खेल, मुकना (मणिपुरी कुश्ती), फूल तोडना, कपड़ा उधार लेना), जबकि कुछ के अंतर्गत एक-एक उप-शीर्षक ही रखा गया है, जैसे पाँचवाँ परिच्छेद (दौड़ दौडाना), छठा परिच्छेद (बैल पकडना), नौवाँ परिच्छेद (देश निकाला) आदि| मूल ग्यारह परिच्छेदों के अतिरिक्त अंत में ‘परिचय परिच्छेद‘ दिया गया है, जिसके अंतर्गत तीन उप-शीर्षक हैं (उपसंहार (अवतार), पुरेनब की मृत्यु, प्रेम परीक्षा)| उपन्यास के कथानक और मूल लोकगाथा के कथानक में वर्णन-शैली और दृश्य-परिकल्पना को छोड़ कर कोई अंतर दिखाई नहीं देता| इसके बावजूद इससे मणिपुर की प्राचीन सामाजिक-संरचना, लोक-संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है| एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस उपन्यास-रचना  के मूल में राष्ट्रभाषा में खम्बा-थोइबी की कथा को प्रस्तुत करके उसे लोकप्रिय बनाने की भावना है| लेखक ने प्रारम्भ में कहा है—मणिपुर में ‘खम्बा-थोइबी’ की कहानी बड़े चाव से सुनी तथा पढ़ी जाती है| xxxxxxx इससे इस कहानी की लोकप्रियता प्रमाणित हो गई है| किन्तु दुःख की बात है कि मणिपुर में अभी तक ऐसी पुस्तक न प्रकाशित हुई, जिसमें इस कहानी का पूर्ण रूप से वर्णन किया हो| राष्ट्रभाषा हिन्दी में अब तक इस लोकप्रिय कहानी को पूर्ण रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं किया है| इस अभाव को कुछ अंशों तक दूर करने की उद्देश्य से ‘खम्बा-थोइबी’ नामक यह पुस्तक लिखी गई, जो उपन्यास के रूप में प्रस्तुत है (दो शब्द)| इस उपन्यास की दूसरी विशेषता यह है कि लेखक ने हिन्दी पाठकों की सुविधा के लिए कथानक के भाषिक-गठन में प्रयुक्त मणिपुरी सामाजिक-सांस्कृतिक शब्दावली को पाद टिप्पणियों में स्पष्ट कर दिया है, जैसे--- षणजेल्लोइ (ग्वालों का सरदार), अङोम निङ्थौ (अङोम नामक वर्ण का राजा), चौराप (अदालत), इपु (दादा), तयुम (प्यारा दास), सलाइ (एक प्रकार का वंश विभाग) आदि| इसके बाद हिन्दी में अभी तक और कोई उपन्यास नहीं लिखा गया|
       सन् 1963 में ‘खम्बा-थोइबी’ नाम से ही चिङाबम निशान निङ्तम्बा का लिखा नाटक प्रकाशित हुआ| नागरी लिपि प्रचार सभा द्वारा प्रकाशित यह नाटक मणिपुर में हिन्दी लेखन परम्परा को आगे बढाने वाली एक ही वर्ष में (एक ही नाम से दो विधाओं- उपन्यास और नाटक के रूप में) छपी दो पुस्तकों में से एक है| इसका कथानक भी खम्बा-थोइबी लोकगाथा से लिया गया है और उसके मूल ढाँचे में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता| लेखक का रंगमंच से कोई परिचय न होने का प्रभाव नाटक पर पहली बार में ही अनुभव हो जाता है| इसके बावजूद उस काल में हिन्दी-सेवा की दृष्टि से यह एक सराहनीय प्रयास था| लेखक ने कुछ दशकों बाद इस नाटक के प्रथम अंक के कुछ दृश्यों का पुनर्लेखन किया और शेष अंकों में अनेक जगह नए संवाद जोड़े| इसका संशोधित संस्करण नागरी लिपि प्रचार सभा द्वारा ही 2001 में प्रकाशित हुआ| नाटक लेखन के क्षेत्र में दूसरा नाटक ‘वीर टिकेंद्रजीत’ के. याइमा शर्मा ने लिखा, जो सन् 1987 में शर्मा बुक एजेंसी, पावना बाज़ार, इम्फाल द्वारा प्रकाशित किया गया| इसका कथानक पाँच अंकों में विभाजित है, जिसका निर्माण अंग्रेजों और मणिपुर के बीच अप्रैल सन् 1891 में हुए ‘खोङ्जोम युद्ध’ तथा उसके बाद 13 अगस्त को थाङाल जनरल के साथ-साथ वीर टीकेंद्रजीत सिंह को फाँसी पर चढ़ा दिए जाने संबंधी ऐतिहासिक घटनाओं की पृष्ठभूमि पर किया गया है| नाटककार का लक्ष्य मणिपुर के इतिहास की एक सबसे महत्वपूर्ण घटना और एक ऐतिहासक वीर के जीवन को प्रकाश में लाना है, जिसमें वह सफल रहा है|
       हिन्दी कविताओं का पहला संग्रह ‘क्षितिज सा ध्येय’ है, जिसका प्रकाशन सन् 1976 में हुआ| कवि आचार्य राधागोविंद थोङाम ने इस काव्य-संग्रह के प्रकाशन की प्रेरणा का श्रेय रोमानिया के हिन्दी विद्वान, मिकोलाई ज्वेर्या को दिया है और इसका समर्पण भी उन्हें ही किया है| काव्य-संग्रह का नामकरण इसकी पहली कविता के आधार पर किया गया है| इस संग्रह की एक कविता की पंक्तियों--- देश में कोटि लोग रहते हैं/मगर देश का अहसास नहीं होता/ इतना ज़रूर है/ जनमते, बढ़ते और मरते हैं/ मगर देश से उन्हें कोई सरोकार नहीं होता (पृ. 01) से कवि के काव्य-स्वभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है| कविता की अन्य पुस्तकें ‘मीतै चनु’ (1987), ‘फागुन की धूल’ (1990), ‘हृदय सुमन : राष्ट्रीय चेतना चिंतन’ (1996) और ‘प्रयास’ (1999) शीर्षक से प्रकाशित हुईं| इन काव्य-संग्रहों में मीतै चनु का सम्बन्ध मणिपुर में ‘हिन्दीतरभाषी हिन्दी कवि सम्मलेन परम्परा’ से है| 26 जनवरी, सन् 1987 को मणिपुर हिन्दी परिषद, इम्फाल के सभागार में इस आलेख के लेखक द्वारा इबोहल सिंह काङ्जम के सहयोग से ‘हिन्दीतरभाषी हिन्दी कवि सम्मलेन परम्परा’ का पहला आयोजन किया गया था, जिसमें बारह मणिपुरी भाषी हिन्दी रचनाकारों--- सिजगुरुमयुम नीलावीर शास्त्री, एलाङ्बम दीनमणि सिंह, इबोहल सिंह काङ्जम, राधागोविंद थोङाम, कोंङ्ब्रालात्पम याइमा शर्मा, अनौबम विनोदचंद्र शर्मा, एल. लोकेन्द्र शर्मा, एम. इबोमचा सिंह, ए. कुमार शर्मा, एस. लनचेनबा मीतै, आर.के. लोकेंद्रजीत और एच. सुबदनी देवी ने पहले से तय विषयवस्तु, ‘राष्ट्रीय चेतना के विविध पक्षों’ पर केंद्रित अपनी दो-दो कविताएँ प्रस्तुत की थीं| उन्हीं कविताओं को हिन्दी अनुवाद सहित ‘मीतै चनु’ नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित किया गया| फागुन की धूल  की पृष्ठभूमि में भी इसी प्रकार की एक घटना है| संकलन के संपादक के अनुसार फागुन की धूल की रचनाएँ एक कवि सम्मलेन के मंच से पढ़ी गई रचनाएँ हैं| यह कवि सम्मलेन मणिपुर हिन्दी परिषद, इम्फाल द्वारा 10 मार्च, 1990 (होली की पूर्व संध्या) को आयोजित किया गया था| यह मणिपुर में प्रथम द्वि-भाषी (मणिपुरी-हिन्दी) कवि सम्मलेन था (अपनी बात)| इसमें पच्चीस कवियों ने भागीदारी की थी और हिन्दी कविताओं को मणिपुरी अनुवाद तथा मणिपुरी कविताओं को हिन्दी अनुवाद के साथ प्रस्तुत किया गया था| वही समस्त काव्य-सामग्री फागुन की धूल शीर्षक से काव्य-संकलन के रूप में प्रकाशित हुई| हृदय सुमन : राष्ट्रीय चेतना चिंतन में कवि हजारीमयुम गोकुलानंद शर्मा की बावन कविताएँ संकलित हैं, जिनमें से अधिकांश की विषयवस्तु राष्ट्रीय एकता की चिन्ता और राष्ट्र-सेवा की भावना है| प्रयास में पन्द्रह युवा कवियों की रचनाएँ संकलित हैं तथा इन सभी कवियों का सम्बन्ध मणिपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से है| यह संकलन मणिपुर के युवा हिन्दी कवियों की रचनाओं को प्रकाश में लाने के सोचे-समझे उद्देश्य से ही प्रकाशित किया गया था, जिसे संपादक द्वारा भूमिका में स्पष्ट किया गया है|
       मणिपुर की हिन्दी लेखन परम्परा में शोध-समीक्षा का प्रारम्भ अरिबम कृष्णमोहन शर्मा की पुस्तक, ‘हिन्दी और मणिपुरी परसर्गों का तुलनात्मक अध्ययन’ से हुआ| इसे सन् 1972 में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा द्वारा प्रकाशित किया गया था| इसके पश्चात ‘व्याकरणिक कोटियों का अध्ययन’ (1984), ‘मणिपुरी साहित्य में कवि चाउबा की देन (1987) ‘मणिपुर : विविध सन्दर्भ’ (1988), मणिपुर : भाषा और संस्कृति’ (1988) ‘हिन्दी-मणिपुरी क्रिया संरचना’ (1989), ‘हिन्दी-मणिपुरी की समान शब्दावली’ (2000), ‘प्रयोजनमूलक हिन्दी’ (2002), ‘हरिकृष्ण प्रेमी के एकांकी नाटकों एवं कविताओं का एक अध्ययन’ (2004), ‘मोहन राकेश के नाटकों का अनुशीलन’ (2004), ‘मोहन राकेश के नाटक : एक समाजशास्त्रीय अध्ययन’ (2005), ‘साक्षात्कार : चिंतन-अनुचिंतन’ (2005),  ‘मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में’ (2006), ‘समकालीन हिन्दी उपन्यास : समय से साक्षात्कार’ (2006), ‘मणिपुरी भाषा और साहित्य’ (2007), ‘हिन्दी साक्षात्कार का विकासात्मक इतिहास, (2007), ‘उपन्यासों के सरोकार’  (2012), ‘मणिपुर : हिन्दी के विमर्श’ (2012), ‘उपन्यास में जगह तलाशती स्त्री’ (2014) आदि का प्रकाशन हुआ| इन ग्रंथों में उपलब्ध अध्ययन के विभिन्न पक्ष हैं, जैसे-- मणिपुरी भाषा के विकास का इतिहासपरक अध्ययन, उसके भाषा वैज्ञानिक और व्याकरणिक पक्षों का विश्लेषण, हिन्दी-मणिपुरी भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन, हिन्दी तथा मणिपुरी साहित्य की विविध विधाओं के साहित्य का अध्ययन, मणिपुरी साहित्य के इतिहास का विवेचन, हिन्दी और मणिपुरी भाषा के विशिष्ट रचनाकारों के साहित्य का मूल्यांकन आदि| इबोहल सिंह काङ्जम ने अपने हिन्दी-मणिपुरी क्रिया संरचना ग्रन्थ में मणिपुरी भाषा के विकास का इतिहास प्रस्तुत करते हुए लिखा है-- मणिपुरी भाषा के विकास का मूल आधार स्थानीय बोली, ‘चेङ्लै’ है| इस विकास का प्रारम्भ ईसा की प्रथम शताब्दी के आसपास माना जाता है| इसका प्रमाण मणिपुरी की पुरानी हस्त लिखित रचनाएँ हैं| तब से अब तक मणिपुरी का उत्तरोत्तर विकास होता रहा तथा इसमें काफी परिवर्तन दिखाई पडने लगा| इस विकासक्रम को उपलब्ध साहित्य के आधार पर तीन मुख्य कालों में विभाजित किया जा सकता है—(1) प्राचीन काल (प्रथम शताब्दी ई. से 1730 ई. तक), (2) मध्य काल (1730 ई. से 1890ई. तक), (3) आधुनिक काल (1890 ई. से अब तक) (पृ. 30-31)| मणिपुरी भाषा के विकास की यह अवधारणा सभी मणिपुरी भाषावैज्ञानिकों को (और भाषाविज्ञान के स्कूलों को भी) मान्य है, अत: हिन्दी में इसकी उपलब्धता के महत्त्व को समझा जा सकता है|
 साहित्य केंद्रित शोध और समीक्षा के क्षेत्र में  वरिष्ठ लेखकों के साथ ही कुछ युवा लेखकों ने उल्लेखनीय कार्य किए हैं| इतिहासकार और शोधकर्ता के रूप में ख्याति अर्जित कर चुके वरिष्ठ लेखक राजकुमार झलजीत सिंह ने ‘कवि चाओबा :जीवन और साहित्य’ पुस्तक में चाओबा की रचनात्मक पृष्ठभूमि और इतिहास का सम्बन्ध जोडते हुए कहा है—27 अप्रैल, सन् 1891 को अंग्रेजों ने मणिपुर के राजमहल पर अधिकार कर लिया| उस दिन से मणिपुर विदेशियों के अधीन हो गया| ऐतिहासक दृष्टि से मणिपुर के लिए यह दो युगों का संधि-काल कहा जा सकता है| लगभग दो हज़ार वर्ष तक स्वाधीन रहने वाला मणिपुर अंग्रेजों को प्रति वर्ष पचास हज़ार रुपए कर के रूप में अदा करने लगा| उस काल में 5o,ooo रुपए की कीमत बहुत अधिक थी| इसके ऊपर से अंग्रेजों ने युद्ध में व्यय हुए दो लाख रुपए की भरपाई भी मणिपुर से ही करवाई| इस सब का परिणाम मणिपुर में राजनैतक, आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र में बहुत बड़े परिवर्तन के रूप में सामने आया| इन्हीं दो युगों के संधि-स्थल पर अमर कवि ख्वाइराकपम चाओबा ने जन्म लिया (पृ. 81)| इससे दो महत्वपूर्ण संकेत ग्रहण किए जा सकते हैं, एक यह कि मणिपुरी साहित्य के नवजागरण और उसके सभी आठ रचनाकारों (चिङाखम मयूरध्वज सिंह, हिजम अङाङ्हल सिंह, ख्वाइराकपम चाओबा सिंह, हवाईबम नवद्वीप चन्द्र सिंह, लमबम कमल सिंह, अशाङ्बम मीनाकेतन सिंह, अराम्बम दरेंद्रजीत सिंह, राजकुमार शीतलजीत सिंह) को समझने का मुख्य द्वार यही पृष्ठभूमि है और दूसरा यह कि हिन्दी तथा मणिपुरी साहित्य के नवजागरण परस्पर गहरे जुड़े हुए हैं|
 इतनी ही बारीकी से युवा समीक्षक एलाङ्बम विजय लक्ष्मी ने अपनी पुस्तक ‘समकालीन हिन्दी उपन्यास : समय से साक्षात्कार’ में श्रीप्रकाश मिश्र के उपन्यास, ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ के मूल्यांकन के बहाने पूर्वोत्तर के उग्रवाद के बराबर जीवित रहते चले आने के पीछे छिपे कारणों का खुलासा किया है| वे बेबाक ढंग से कहती हैं—जब भी उग्रवादी संगठनों के साथ कोई समझौता होता है, तो शासन-सत्ता उसे अपने पक्ष में लाने की कोशिश करती है| इससे अलग हट कर एक दूसरा यथार्थ शान्ति समझौते के प्रदर्शन, घोषणा और आयोजन से जुडा हुआ है| प्राय: वे शर्तें जनता को कभी पता नहीं चलतीं, जो बंद कमरों में समझौते की मेज पर तय होती हैं| जनता को केवल यह पता चलता है कि एक समझौता हुआ है, जिसे दोनों पक्षों ने स्वीकार किया है और जिसके बने कालीन पर शान्ति आने वाली है|.... इसी के साथ जिन उग्रवादी संगठनों को समझौते की मेज पर बड़े-बड़े आश्वासन दिए जाते हैं, उनके भी कार्यकर्ताओं को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता| उनके भविष्य की भी कोई ठोस योजना क्रियान्वित नहीं की जाती| परिणाम यह होता है कि शान्ति समझौता होने के तुरंत बाद अशांति के बादल उमडने की आशंकाएँ दिखाई देने लगती हैं (पृ. 224)|
शोध और समीक्षा के क्षेत्र में बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक के चुने हुए दस उपन्यासों को आधार बना कर स्त्री विमर्श और स्त्री के यथार्थ की पडताल करने का उल्लेखनीय कार्य सिनाम तोन्दोन  सिंह ने किया है| ‘उपन्यास में जगह तलाशती स्त्री’ शीर्षक इस समीक्षा ग्रन्थ की एक विशेषता यह है कि इसमें ‘स्त्री की भाषा’ की बुनावट का बहुत सूक्ष्म व्यावहारिक अध्ययन और उसके संरचनागत स्वरुप को प्रभावित करने वाले कारकों का सटीक विश्लेषण किया गया है|
समीक्षकों ने एक महत्वपूर्ण कार्य प्रतिष्ठित मणिपुरी लेखकों के उन निबन्धों को हिन्दी में लाने का भी किया है, जिनमें आलोचना और काव्यशास्त्र संबंधी चिंतन विद्यमान है| नवजागरणकालीन लेखक ख्वाइराक्पम चाओबा के निबंध, ‘कवि और काव्य’ का हिन्दी अनुवाद इसका उदाहरण है| ‘कवि चाओबा : जीवन और साहित्य’ पुस्तक में प्रकाशित अपने इस निबंध में चाओबा काव्य की कसौटी निर्धारित करते हुए कहते हैं---जो शब्द के आघात से शुष्क मन के किसी कोने में आनंद की नव उमंग न उठा सकता हो, मन पर स्वच्छ, सुन्दर तथा आकर्षित करने वाला प्रतिबिम्ब अंकित न कर पाता हो, मन-वीणा की मधुर ताल को झंकृत कर उसमें नया स्वर और विस्मयकारी ध्वनि न फूँक सकता हो, उसे काव्य नहीं माना जा सकता|
       दिसंबर 1985 में फुराइलात्पम गोकुलानंद शर्मा के संपादन में प्रकाशित, ‘मणिपुर के वीर नर-नारियों की जीवन गाथाएँ’ पुस्तक से जीवनी साहित्य लेखन की शुरुआत हुई| इसमें इतिहास, राजनीति, समाज और संस्कृति को प्रभावित करने वाले वीर टीकेन्द्रजीत सिंह, पावना ब्रजवासी, महारानी लिन्थोइङम्बी, याइरिपोक थम्बालानु सहित मणिपुर के पन्द्रह ऐतिहासक चरित्र शामिल हैं| इसके पश्चात ‘मणिपुर के अमरदीप’ (1986),’संकल्प और साधना’ (1998) और ‘मणिपुर के वीर नर-नारियों के जीवन की कहानियाँ’ (2003) का प्रकाशन हुआ| इनमें से मणिपुर के अमरदीप में अधिकांश वही चरित्र हैं, जो जीवनी साहित्य की पहली पुस्तक में थे| उधर मणिपुर के वीर नर-नारियों के जीवन की कहानियाँ और मणिपुर के वीर नर-नारियों की जीवन गाथाएँ पुस्तकों की सामग्री में कहीं-कहीं भाषा परिवर्तन के अलावा कोई अंतर नहीं है| संकल्प और साधना पूरी तरह मणिपुर के हिन्दी सेवियों की जीवन-यात्रा को दर्शाती है| इसमें इकतीस हिन्दी साधकों का जीवन तथा उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक साधना का परिचय दिया गया है|
       मणिपुर के हिन्दी लेखन में लोक-साहित्य का संग्रह और उसकी पुस्तकाकार प्रस्तुति भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है| मणिपुरी हिन्दी अकादमी, इम्फाल ने सन् 1984 में सापम तोम्बा सिंह द्वारा संग्रहीत आठ मणिपुरी लोककथाओं की पुस्तक, ‘श्रेष्ठ मणिपुरी लोककथाएं’ नाम से प्रकाशित की थी| यह हिन्दी में मणिपुरी लोक-साहित्य की पहली पुस्तक है| सन् 1989 में इसका दूसरा संस्करण भी छपा| ‘मणिपुर की लोक कथाएँ’ (1986), ‘मणिपुरी लोककथाएँ’ (1987), ‘मणिपुर की लोककथाएँ-भाग-2‘ (1990), ‘मणिपुर की लोक कथाएँ' (1991), ‘नोंदोनानु’ (1991), ‘मणिपुरी लोककथा संसार’ (1999) अभी तक प्रकाशित अन्य लोककथा संग्रह हैं| इनके माध्यम से मणिपुरी लोक-जीवन, लोक-परम्पराओं, लोक-विश्वासों, लोक स्वीकृत नैतिकता, लोक-व्यवहार और पारम्परीण ज्ञान-संपदा से परिचित हुआ जा सकता है| मणिपुरी लोककथा संसार की एक विशेष उपलब्धि यह है कि इसकी भूमिका में पूर्व प्रकाशित लोक कथाओं के विवरण के साथ ही इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है कि धार्मिक कारणों से लोक कथाओं की बुनावट में बदलाव आ रहा है और हमारी उपेक्षा के चलते यह संपदा नष्ट होने के संकट से जूझ रही है, अत: समय रहते सावधान होने की आवश्यकता है| लोक-साहित्य संबंधी शोध को ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक में मीतै जाति सहित मणिपुर की--- मानविकी विज्ञान की दृष्टि से मूल, नौ जन जातियों से जुडी पाँच-पाँच लोक कथाएँ प्रस्तुत की गई हैं| मणिपुरी लोकगाथाओं का परिचय देने वाली एक पुस्तक सन् 2000 में हिन्दी लेखक मंच, मणिपुर द्वारा प्रकाशित की गई| इसमें लनचेनबा मीतै ने बीस मणिपुरी लोकगाथाओं का कथानक गद्य में देने के साथ ही कुछ लोकगाथाओं के कथानक के बीच-बीच में उनके गाथा-रूप के उद्धरण भी समायोजित किए हैं| इन लोकगाथाओं में ऐतिहासक घटनाओं पर आधारित गाथाओं (महाराजा चंद्रकीर्ति से जुडी जिला दरबार की घटना पर आधारित) के साथ ही एक लोकगाथा, ‘रामायण की कथा’ भी है, जिसमें सीता बनवास और लव-कुश जन्म संबंधी कथा-प्रसंग का वर्णन है| इससे ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे जातीय महाकाव्यों से मणिपुरी लोक-समाज के सांस्कृतिक जुड़ाव का पता चलता है| इस ग्रन्थ के प्रस्तुतकर्ता, लनचेनबा मीतै ने भूमिका में लोकगाथाओं के बारे में बहुत महत्वपूर्ण बातें कही हैं, जैसे—मणिपुर सांस्कृतिक दृष्टि से हज़ारों वर्ष की जीवन धारा को अपने हृदय में प्रवहमान रखे हुए है| यदि इस पवित्र धारा में स्नान करने का अवसर मिले, तो पता चलेगा कि इसका जल बड़ा विलक्षण है| उसमें मानव-मन और प्रकृति के सम्बन्ध, मानव और दैवी शक्तियों के सम्बन्ध, मानव और मानवेतर प्राणियों के मित्रता-शठता भरे व्यवहार, प्रेम, आशा, निराशा, वीरता, साहस, जय, पराजय, संघर्ष आदि की लहरें अठखेलियाँ कर रही हैं| उसमें लोक-मानस का सौंदर्य विद्यमान है (पृ. viii)|
      मणिपुर के हिन्दी लेखन में अगर कोश विज्ञान संबंधी ग्रंथों को भी शामिल किया जाए, तो ‘मणिपुरी-हिन्दी शब्दकोश’ नाम से पहला कोश सन् 1958 में पं. राधामोहन शर्मा और एल. नारायण शर्मा ने संपादित करके प्रकाशित किया| इसके साथ ही ‘दि हिन्दी-मणिपुरी इंगलिश डिक्शनरी’ (1962) और ‘मणिपुरी-हिन्दी शब्दकोश’ (1963) अस्तित्व में आए तथा कुछ अन्य लघु प्रयास (जैसे, स्टैण्डर्ड पाकेट डिक्शनरी हिन्दी-मणिपुरी/1970) किए गए, जिन्होंने हिन्दी सीखने और अनुवाद करने में सहायक का काम किया| अंत में एक ग्रंथावली की सूचना भी, जो ‘कमल : सम्पूर्ण रचनाएँ’ नाम से सन् 2006 में प्रकाशित हुई| इसका परिचय हिन्दी-मणिपुरी आदान-प्रदान के प्रसंग में विशेष रूप से उपलब्ध है|
      मणिपुर में हिन्दी लेखन को बढ़ावा देने में वहाँ से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं की भी ऐतिहासक भूमिका है| इनमें आधुनिक, हिन्दी शिक्षक दीप, नागरिक पंथ, चिन्तक, पूर्वी वाणी, पर्वती वाणी, सम्मलेन गजट, जगदम्बी, प्रयास, चयोल पाउ, लोकताक एक्सप्रेस (इन सभी का प्रकाशन बंद हो चुका है) और महिप पत्रिका, युमशकैश, कुंदो परेङ, भारती, मणिपुरी चयोल पाउ, लटचम (आलेख लिखे जाने तक ये निरंतर प्रकाशित हो रही हैं) आदि का नामोल्लेख किया जा सकता है| इनके सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक अलग से लिखे जाने की आवश्यकता है| 
                              
   सन्दर्भ : आलेख में सूचित पुस्तकें (अकारादि क्रम से)
1-     उपन्यास में जगह तलाशती स्त्री, सिनाम तोन्दोन सिंह, प्र. सं 2014, राही प्रकाशन, दिल्ली|  
2-     उपन्यासों के सरोकार, एलाङ्बम विजय लक्ष्मी, प्र. सं. 2012, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली|
3-     कवि चाओबा : जीवन और साहित्य, संपा. देवराज, प्र. सं 1997, साहित्य विभाग, मणिपुर हिन्दी परिषद, इम्फाल |
4-     क्षितिज सा ध्येय, राधागोविंद थोङाम, संस्करण-1976, आनंद कृष्ण साहित्य कला संगम, उरिपोक, इम्फाल|
5-     खम्बा-थोइबी, कालाचाँद सिंह, प्र.सं. 1963, ओ.के. स्टोर, इम्फाल |
6-     खम्बा-थोइबी, सी-एच. निशान निङ्तम्बा, प्र.सं. 1963, नागरी लिपि प्रचार सभा, इम्फाल|
7-     नोंदोननु, सी-एच. निशान निङ्तम्बा और देवराज, सं 1991, नुमितथोइ प्रकाशन, क्वाकैथेल, इम्फाल |  
8-     प्रयास, संपा. देवराज, सं. 1999, हिन्दी परिषद, हिन्दी विभाग, मणिपुर विश्व विद्यालय, इम्फाल |     
9-      6-प्रयोजनमूलक हिन्दी, ह. सुबदनी देवी, प्र. सं.2002, वांखै राष्ट्रभाषा महाविद्यालय, इम्फाल |
10-  फागुन की धूल, संपा. देवराज, सं.1990, काङ्जम एंटरप्राइजेज, इम्फाल |
11-  भारतीय संस्कृति की आधारशिला, राधागोविंद कविराज, प्र.सं. 1994, लोकमंगल प्रकाशन, म्फाल |
12-  मणिपुर : एक सांस्कृतिक झलक’, रमाशंकर नागर, सं. 1985, लेखक द्वारा स्वयं |
    12- मणिपुर : भाषा और संस्कृति, संपा. देवराज, प्र. सं 1988, हिन्दी परिषद, हिन्दी विभाग, मणिपुर  विश्व विद्यालय, इम्फाल |
    13- मणिपुर : विविध सन्दर्भ, संपा. देवराज, प्र. सं 1988, हिन्दी परिषद, हिन्दी विभाग, मणिपुर  विश्व विद्यालय, इम्फाल |
    14- मणिपुर : हिन्दी के विमर्श, एलाङ्बम विजय लक्ष्मी, प्र. सं 2012, यश पब्लिकेशंस, दिल्ली|      
15- मणिपुरका सनातन धर्म, अतोम्बापू शर्मा, 1951, चुड़ाचांद प्रिंटिंग वर्क्स, इम्फाल, मणिपुर |
16- मणिपुर की लोक कथाएँ, हीरालाल गुप्त, सं. 1986, लोकमंगल प्रकाशन, उरिपोक, इम्फाल |
   17- मणिपुर की लोक कथाएँ, भाग-2, हीरालाल गुप्त, सं. 1990, गुप्ता प्रकाशन, तेली पट्टी, इम्फाल |
   18- मणिपुर की लोक कथाएँ, सी-एच. निशान निङ्तम्बा और जगमल सिंह, सं. 1991, नुमितथोइ प्रकाशन, क्वाकैथेल, इम्फाल |                
   19- मणिपुर के अमर दीप, राधागोविंद थोङाम, सं. 1986, मणिपुर हिन्दी परिषद, इम्फाल |
   20- मणिपुर के वीर नर-नारियों की जीवन कहानियाँ, संपा. फु. गोकुलानंद शर्मा, सं 2003, मणिपुरी  हिन्दी शिक्षक संघ, इम्फाल |
    21- मणिपुर के वीर नर-नारियों की जीवन गाथाएँ, संपा. फु. गोकुलानंद शर्मा, प्र. सं 1985, मणिपुरी  हिन्दी शिक्षक संघ, इम्फाल |
    22- महिप ‘परिचय,’ देवराज, प्र. सं 1998, पत्रिका विभाग, मणिपुर हिन्दी परिषद, इम्फाल|
   23 मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में, देवराज, प्र. सं. 2006, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली|
   24- मणिपुरी भाषा और साहित्य, प्र. सं 2007, हिन्दी परिषद, हिन्दी विभाग, मणिपुर  विश्व विद्यालय, इम्फाल|
   25- मणिपुरी लोक कथाएँ, निशान निङ्तम्बा और जगमल सिंह, सं 1987, नुमितथोइ प्रकाशन, क्वाकैथेल, इम्फाल |
   26- मणिपुरी लोक कथा संसार, देवराज, सं. 1999, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली|
   27- मणिपुरी लोक गाथाएँ, लनचेनबा मीतै, प्र. सं 2000, हिन्दी लेखक मंच, मणिपुर, इम्फाल |
   28- मणिपुरी संस्कृति : एक झाँकी, एस. गोपेन्द्र शर्मा, प्र. सं. 1972, तेरा कैथेल सापम लैरक, इम्फाल |
   29- मणिपुरी साहित्य में कवि चाओबा की देन, हीरालाल गुप्त, सं 1987, लोकमंगल प्रकाशन, उरिपोक, इम्फाल |
   30- मीतै चनु, देवराज एवं इबोहल सिंह काङ्जम, प्र. सं. 1987, पूर्वा, इम्फाल |
   31- मोहन राकेश के नाटक : एक समाजशास्त्रीय अध्ययन, राजकुमार मोबी सिंह, प्र. सं. 2005, आर. के. प्रकाशन, इम्फाल |
    32- मोहन राकेश के नाटकों का अनुशीलन, राजकुमार मोबी सिंह, प्र. सं. 2004, आर. के. प्रकाशन, इम्फाल |   
    33- वीर टिकेंद्रजीत, के. याइमा शर्मा, प्र. सं. 1987, शर्मा बुक एजेंसी, पाओना बाज़ार, इम्फाल |
    34-  व्याकरणिक कोटियों का अध्ययन, सापम तोम्बा सिंह, प्र. सं. 1984, ज्ञान भारती, दिल्ली |
    35- श्रेष्ठ मणिपुरी लोक कथाएँ, सापम तोम्बा सिंह, सं 1984, मणिपुरी हिन्दी अकादमी, इम्फाल |
    36- संकल्प और साधना, देवराज, प्र. सं 1996, पत्रिका विभाग, मणिपुर हिन्दी परिषद, इम्फाल |
    37- समकालीन हिन्दी उपन्यास : समय से साक्षात्कार, एलाङ्बम विजय लक्ष्मी, प्र. सं 2006, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली |
     38- साक्षात्कार : चिंतन-अनुचिंतन, सुरेन्द्र सिंह, प्र. सं 2005, थौनाओजम एंटर प्राइजेज, इम्फाल |    
    39- हरिकृष्ण प्रेमी के एकांकी नाटकों एवं कविताओं का एक अध्ययन, एम. अचौबी सिंह, प्र. सं 2004, पूर्वांचल सत्साहित्य प्रकाशन संस्थान, इम्फाल |
     40- हिन्दी और मणिपुरी परसर्गों का तुलनात्मक अध्ययन, अरिबम कृष्णमोहन शर्मा, प्र. सं 1972, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा |
     41- हिन्दी और मणिपुरी की समान शब्दावली (व्यतिरेकी अध्ययन), सि. ब्रजेश्वर शर्मा, प्र. सं. 2000, एस. कुलचन्द्र शर्मा एण्ड संस प्रकाशन, इम्फाल |
     42- हिन्दी-मणिपुरी क्रिया संरचना, इबोहल सिंह काङ्जम, प्र. सं 1989, प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली |
    43- हिन्दी साक्षात्कार का विकासात्मक इतिहास, सुरेन्द्र सिंह, सं 2007, थौनाओजम एंटर प्राइजेज, इम्फाल |     
    44- हिन्दू धर्म के मूल तत्व, राधागोविंद कविराज, प्र. सं 1994, लोकमंगल प्रकाशन, उरिपोक, इम्फाल |
 45- हृदय सुमन : राष्ट्रीय चेतना चिंतन, ह. गोकुलानंद शर्मा, प्र. सं. 1999,  , वांखै राष्ट्रभाषा  महाविद्यालय, इम्फाल |
     46- मणिपुरी नर्तन कला, गुरु बनमाली सिंह, प्रकाशक- एस. गोपेन्द्र शर्मा, प्रधानाचार्य : राष्ट्रभाषा शीघ्र लिपि कालेज, इम्फाल| (इस ग्रन्थ का प्रकाशन वर्ष उपलब्ध न होने के कारण इसे अंत में स्थान दिया गया है)|            

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