गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

मानव मन का साक्षी: मणिपुरी बाल साहित्य


मानव मन का साक्षी: मणिपुरी बाल साहित्य

देवराज

उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री के आधार पर वाङ्खैमयुम तोमचौ सिंह ने मणिपुरी भाषा में बाल-साहित्य लेखन की शुरुआत की थी। सन् 1959 में प्रकाशित इबेन्पोक्की वारि उनकी पहली बाल-साहित्य विषयक पुस्तक थी। सन् 1960 में उनकी दूसरी पुस्तक ग्रह यात्रा प्रकाशित हुई। इनमें से पहली पुस्तक में मणिपुरी समाज में प्रचलित लोक कथाओं का बालकों को ध्यान में रखकर पुनर्लेखन किया गया है, अर्थात ये री-टोल्ड कथाएँ हैं, जो जिज्ञासा, आकस्मिक घटना परिवर्तन, मानव और मानवेतर शक्ति के विभिन्न आश्चर्यजनक प्रभावों, पुश-पक्षियों की विस्मयकारी भूमिकाओं तथा मनोरंजन आदि तत्वों से भरपूर हैं। इबेन्पोक्की वारि का अर्थ है, दादी की कहानियाँ। लेखक ने दादी की ओर से कहानी होने का लाभ उठा कर यत्र-तत्र प्रत्यक्ष-परोक्ष उपदेश एवं शिक्षाओं का भी विधान किया है और हल्के-फुल्के रूप में गाँवों, जंगलों तथा नगर-जीवन की जानकारी देकर बालकों का ज्ञान बढ़ाने का प्रयास भी किया है।
वाङ्खैमयुम तोमचौ की दूसरी पुस्तक काल्पनिक विज्ञान कथाओं के माध्यम से बच्चों की कल्पना शक्ति का विकास करने के उद्देश्य से लिखी गई है। उन दिनों यद्यपि किसी ग्रह पर मनुष्य के कदम नहीं पड़े थे, किन्तु इस दिशा में सोवियत रूस और अमेरिका जैसे देशों के वैज्ञानिक महत्वाकांक्षी योजनाओं पर कार्य कर रहे थे। इससे प्रकृति और ब्रह्माण्ड के रहस्यों पर विजय पाने की मनुष्य की दबी हुई आकांक्षा आदिम गुफाओं और आधुनिक प्रयोगशालाओं से बाहर मौखिक और लिखित भाषा में कुलांचें भर रही थी। ग्रह यात्रा शीर्षक पुस्तक में उसी का एक रूप दिखाई देता है, जो बालकों के मनोरंजन के साथ उन्हें विज्ञान संबन्धी रुचि से भी जोड़ता है।
सन् 1961 में लालबाबू सिंह द्वारा लिखित अङाङ् सभा, (बालकों की सभा), खुंन्जा सभा (गाँव की सभा) और मतमगी मङाल (युग-प्रकाश) शीर्षक तीन बाल-पुस्तकंे प्रकाश में आईं। इन सभी में बच्चों के लिए मनोरंजक और शिक्षाप्रद कहानियाँ संकलित हैं। कुछ कहानियों में सरल शैली में मणिपुरी जन-जीवन, संस्कृति और इतिहास की जानकारी भी दी गई है। इस विषयवस्तु की दृष्टि से लाइमयुम कृष्णचन्द्र शर्मा की पुस्तक अङाड्गी लमजिड् वारि (बाल दिग्दर्शक कथाएँ) और हिजम याइमा की रचना, थौ नाफबा खरगी वारि (कुछ वीरों की कथाएँ) भी उल्लेख योग्य हैं। उसी काल में छपी ये कृतियाँ बालकों के लिए बड़ी उपयोगी जानकारी से युक्त हैं। इनके मूल में बाल-मानस को प्रारम्भ से ही अपने समाज और संस्कृति संबन्धी मूल्यों से जोड़ने का भाव भी झलकता है।
बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक के प्रारंभ में ही मणिपुरी बाल-साहित्य को प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक चेतना से संपन्न बनाने का प्रयास भी देखने को मिलता है। यह सर्वज्ञात है कि भारतीय मनीषा का सार-तत्व रामायण और महाभारत की रचना के रूप में प्रस्तुत हुआ था। इनमें इतिहास, पुराण, धर्म, संस्कृति, दर्शन, राजनीति, लोक, समाज, व्यक्ति, न्याय और सबसे बढ़कर जीवन-संघर्ष की चुनौतियों को स्वीकारने के दृढ़ संकल्पों से जुड़े मूल्य विद्यमान हैं। इन विशेषताओं के कारण ये महाग्रंथ आज तक भी विविध रूपों में सभी के प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। बालकों को जीवन के आदर्शों के साथ ही उनको यथार्थ से जोड़ने के लिए भी इनका उपयोग दीर्घ काल से किया जा रहा है। मणिपुरी भाषा में सर्वप्रथम अयेकपम श्यामसुंदर सिंह ने अङाङ्गी रामायन (बाल रामायण) और अङाङ्गी महाभारत (बाल महाभारत) के रूप में राम-कथा तथा महाभारत-कथा का बालकों के बौद्धिक विकास हेतु सरल भाषा-शैली में पुनर्लेखन किया। कुछ वर्षों बाद मणिपुर में हिंदी प्रचार आंदोलन के प्रारम्भिक कार्यकर्ताओं में से एक, तेमेल आबीर सिंह ने भी अङाङ्गी महाभारत नाम पुस्तक की रचना की। राजकुमार सनातोंबा सिंह ने महाभारत कथा को बच्चों के लिए प्रस्तुत करते समय चित्रों का प्रयोग भी किया। उनके द्वारा री-टोल्ड शैली में रचित अङाङ्गी महाभारत पुस्तक में विभिन्न प्रसंगों के चित्र भी दिए गए हैं। इसका उद्देश्य बालकों की रुचि के साथ ही उनकी कल्पना व कलात्मक रुचि का विस्तार करना भी है। निश्चित रूप से बाल-साहित्य के क्षेत्र में यह प्रयास नवीन और अधिक वैज्ञानिक कहा जा सकता है।
सन् 1965 में सगोलसेम इंद्रकुमार ने बालकों के लिए अरबगी अहिङ् (अरब की रातें) पुस्तक प्रस्तुत की। इसकी कहानियाँ अरेबियन नाइट्स की विभिन्न कथाओं के आधार पर लिखी गई हैं, अतः इनमें जिज्ञासा के साथ ही रहस्य-रोमांच भी विद्यमान है। सन् 1966 में इंद्रकुमार की एक और रचना पिनाकियो का प्रकाशन हुआ। पिनाकियो एक रोमांचकारी पात्र है, जिसे केंद्र में रखकर लेखक ने अनेक बालोपयोगी कथाओं का ताना-बाना तैयार किया है। यह प्रकाशन कथा-क्रम (स्टोरी-सिरीज) शैली में हुआ। सगोलसेम इंद्रकुमार आकाशवाणी में कार्यक्रम अधिकारी थे और बाद में उप निदेशक बने। स्वाभाविक रूप से वे भाषा के बालोपयोगी श्रवण और संप्रेषण पक्ष से अच्छी तरह परिचित थे। उनकी ये कहानियाँ आकाशवाणी के बाल कार्यक्रम में सुनाई जाती थीं। बच्चे इनसे आनंद प्राप्त करते थे।
सन् 1966 में ही तंफासना देवी (राजकुमारी तंफासना) की पंचतंत्र शीर्षक बाल पुस्तक प्रकाशित हुई। इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें विष्णु शर्मा के पंचतंत्र की पशु-पक्षियों के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने वाली कथाओं से प्रभावित कहानियाँ हैं। लेखिका ने यथास्थान और यथावश्यक रूप में घटनाओं को नया रूप दिया है तथा उनके आकार को छोटो-बड़ा किया है।
सन् 1968 में फान्जौबम गुलाप बाबू ने बाल-साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा। उनके आने से मणिपुरी बाल-साहित्य के विस्तार की भूमिका तैयार हुई। उन्होंने बालकों के लिए नोङ हौ लैहौ शीर्षक पुस्तक लिखी। इसमें सृष्टि के प्रारम्भ की कथा कही गई है। इसमें बताया गया है कि खोयुम लाइनिङ् थौ प्रथम के माध्यम से पांच तत्वों (मयाइ मङा), अतिया (आकाश), लैपाक (भूमि), मैइ (अग्नि), नुङ्शित (वायु), इशिङ् (जल) का निर्माण हुआ। इसके पश्चात् पा (सोरारेन सिदबा) और पी (लैमरैन) का अवतरण हुआ। पुस्तक में इससे आगे सृष्टि के अस्तित्व में आने की कथा है। लेखक ने इस कथा की प्रस्तुति लीला नाट्य की भाँति की है।
सन् 1968 में ही मणिपुरी बाल-साहित्य लेखन के क्षेत्र में लौबुकतोङ्बम रघुमणि शर्मा के रूप में एक ऐसे प्रतिभाशाली लेखक ने कदम रखा, जिसने विषय-वैविध्य और परिमाण, दोनों ही दृष्टियों से आज तक के इतिहास में सबसे अधिक बाल-साहित्य की रचना की। उन्होंने 1968 में बाल-साहित्य विषयक प्रथम पुस्तक का लेखन-प्रकाशन किया था। तब से अब तक प्रकाशित उनकी पुस्तकों की सूची अग्रांकित है --- भागवतकी वारि (भागवत कथा, 1968), लैबाक्की गाड़ी (मिट्टी की गाड़ी 1973), पंचतंत्रगी वारि (पंचतंत्र की कहानियाँ, 1973), तुलसी, 1974, उपनिषद की वारि (उपनिषद की कहानियाँ, 1974), अङाङ्गी पंचतंत्र (बाल पंचतंत्र, 1982), पंचतंत्रगी वारि खरा (पंचतंत्र की कुछ कहानियाँ, 1983), काङ्नबा वारि खराः प्रथम भाग (कुछ उपयोगी कहानियाँ 1987), लमजिड्, बा, 1887 (पथ प्रदर्शक), कांनबा वारि खराः दूसरा भाग, 1988 मरूप कायनबा (मित्र-वियोग 1988), केसकी फल, (मामले का फैसला, 1987), माचिल-मौपबा (भाई-बहिन, 1988), दधिचिगी त्याग (दधीचि का त्याग, 1990), अखन्नबा वारि (चुनी हुई कहानियाँ, 1992), हिंङ्चाबगी खाबोङ् (दानव की झोली, 1993), को इशाङ्बा (लम्बी दाढ़ी वाला, 1994), लाइबक (भाग्य, 1995), मणि माला-1995, तम्फा-1995, वारि मखल मथेल (तरह-तरह की चुनी हुई कहानयाँ, 1995), लिड्.जेल माङ्नबा- (साहस और एकता, 1993), फजबी- 1995, फुङा वारि खरा (कुछ लोक कथाएँ, 1996) लमनखुम्बा, (बदला, 1998)।
रघुमणि शर्मा द्वारा लिखित इन चौबीस पुस्तकों में पौराणिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक स्रोतों के साथ ही पंचतंत्र जैसी विश्व प्रसिद्ध आख्यायिका को भी आधार सामग्री के रूप में प्रयुक्त किया गया है। ये ऐसे स्रोत हैं, जिन्हें प्रत्येक भारतीय भाषा के बाल-साहित्य लेखकों ने उन्मुक्त भाव से अपनाया है, जिससे इस महादेश के सभी क्षेत्रों के बच्चे समन्वित सांस्कृतिक जानकारी से संपन्न हुए हैं। जैसे अन्य क्षेत्रों में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रसंगों को कहने की शैली विभिन्न लेखकों की अपनी रही है, वही शैली रघुमणि शर्मा की भी है। इस विपुल बाल-साहित्य की दूसरी विशेषता है, लोक-स्रोत का उपयोग। मणिपुरी भाषा में एक शब्द है, ‘‘फुङा वारि’’, जिसका सामान्य अर्थ होगा-अलाव के पास बैठ कर सुनाई जाने वाली कथा। मान्यता है कि पुराने जमाने में आज जैसे मनोरंजन के साधन न होने के कारण यह आशंका बनी रहती थी कि रात का भोजन तैयार होने के पूर्व ही बच्चे सो जाएँगे, फिर उन्हें नींद से जगा कर खिलाना कठिन होगा। इसलिए दादी-नानी उन्हें जगाए रखने के लिए मनोरंजक कहानियाँ सुनाती रहती थीं।
उस काल में यहाँ सर्दी ही अधिक पड़ती थी, अतः कहानी सुनाने का यह कार्य अलाव तापते हुए होता था। इसी से इनका नाम पड़ा फुङ् (अलाव), वारि (कहानी)। इनमें कुछ कहानियाँ पुरानी परंपरा से प्रचलित होती थीं, कुछ कहानियांे में बड़ी बूढ़ियाँ, अपनी ओर से कुछ मिला देतीं और कुछ कहानयाँ पूरी तरह उनकी अपनी कल्पना से बुनी हुई होती थीं। आजकल ये सभी लोक-कथाएँ कहलाती हैं और इनके चलते फुङ्ा वारि का अर्थ लोक-कथा माना जाने लगा है। रघुमणि शर्मा ने इसी फुङ्ा वारि शैली में अनेक बाल-पुस्तकें तैयार की हैं। उन्होंने न केवल भारत, बल्कि अन्य देशों की फुङ्ावारियों का भी पुनर्कथन (पुनर्लेखन) करके अपने वारि मखल मथेल इसी प्रकार की रचना है। ररघुमणि शर्मा ने तीसरे प्रकार की रचनाएँ पूर्णतः अपनी कल्पना के आधार पर प्रस्तुत की हैं। इनमें लेखक की प्रतिभा, बाल मनोविज्ञान की गहन जानकारी, व्यापक विषय-ज्ञान, और कथक्कड़ी का प्रभावकारी समन्वय दिखाई देता हैं। उन्होंने दो बाल-नाटक भी लिखे हैं, जिनमें से एक पंचतंत्र की कथा पर आधारित है। मरूप कायनबा नामक इस नाटक में पिंगलक, कर्तक, संजीवक, दमनक आदि पशु-पात्र हैं। दूसरा नाटक, लिङजेल मान्नबा, पूरी तरह लेखक की मौलिक कल्पना पर आधारित है तथा बालकों को एकता का रहस्य और महत्व समझाता है। अपने स्तर पर दोनों नाटक शिक्षाप्रद हैं।
रघुमणि शर्मा द्वारा रचित बाल-साहित्य में कोइशाङबा विशेष चर्चित है। इसकी कथा स्वर्ण भूमि नामक एक सुखी-संपन्न्न और चोरी जैसी बुराईयों से रहित राज्य की है। बालउपन्यास जैसी यह रचना पढ़ने में रोचक और आकर्षक है। इसमें उल्लिखित स्वर्ण भूमि मणिपुर का एक प्राचीन नाम ‘सना लैबाक’ ही है।
रघुमणि शर्मा के विषय में इस तथ्य का उद्घाटन करना भी आवश्यक है कि उन्होंने एकाधिक नामों से बाल-साहित्य की रचना की है। रघुमणि, रघुमणि शर्मा, आर0एम0शर्मा, रामनाथ देव, तुङ्गनाथ देव, तुङ्गनाथ शर्मा आदि के नाम से उनकी बाल-साहित्य की पुस्तकें उपलब्ध हैं। इस नाम-वैभिन्य के मूल में एक गंभीर और बड़ा कारण है, जीविकोपार्जन की विवशता। स्वतंत्र लेखन को अपनाने वाले रघुमणि शर्मा अपनी अद्भुत प्रतिभा के बल पर विपुल मात्रा में श्रेष्ठ कोटि का बाल-साहित्य रचने के बाद भी एक ही नाम से न तो बार-बार सरकारी पुस्तक क्रय योजना का लाभ उठा सकते थे और न पुरस्कार योजनाओं में शामिल होकर सफल हो सकते थे। इसका उपाय यही था कि वे अलग-अलग नामों से लेखन करें ताकि आजीविका की समस्या भी हल होती रहे और साहित्य-सृजन में निरंतरता भी बनी रहे। यह एक अप्रीतिकर प्रसंग है, जिससे रघुमणि शर्मा के पाठकों को पीड़ा भी पहुँच सकती है, किंतु इतिहास लिखते समय सत्य और तथ्य के प्रकाशन की विवशता के साथ ही इस वास्तविकता का उल्लेख मणिपुरी भाषा के एक बाल-साहित्य लेखक की जीवन-संघर्ष-गाथा को पाठकों के सामने लाने की दृष्टि से भी अनिवार्य है। इस रूप में उनका जीवन-संघर्ष अपने आप में एक ऐसी सक्षम कहानी है, जो साहित्य प्रेमियों को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। इससे हम कम पाठक संख्या वाले, अल्प परिचित तथा प्रोत्साहन की ठोस योजनाओं से दूर रहती आई अनेक भारतीय भाषाओं के लेखकों की व्यावहारिक समस्याओं का सीधा साक्षात्कार कर सकते हैं।
मणिपुरी बाल-साहित्य में एक अभिनव मोड़ 1969 में देखने को मिला। इस वर्ष तत्कालीन मणिपुरी रंगमंच के प्रख्यात पुरुष एच. अङौबा सिंह की पुस्तक फुङा वारि का प्रकाशन हुआ। पहले उल्लेख किया जा चुका है कि इंद्रकुमार सिंह की रचना, पिनाकियो की कहानियाँ आकाशवाणी पर प्रसारित की जाती थीं। लेकिन फुङा वारि में उस लेखक की कहानियाँ हैं, जो उन्हें स्वयं आकाशवाणी के कार्यक्रम में बालकों को सुनाया करता था। एच.अड्.ौबा सिंह आकाशवाणी के इंफाल केन्द्र पर प्रत्येक रविवार को बाल-सभा में कहानी सुनाते थे। वे स्वयं उच्च कोटि के नाट्य-निर्देशक, नाटक-लेखक और अभिनेता थे, अतः उन्होंने लोक-स्रोत से उपलब्ध कथाओं को बालकोपयोगी बनाने के लिए सर्व प्रथम उनमें नाट्य-तत्व का समावेश कराया और बाल-सभा की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए हास्य प्रधान मनोरंजन पर विशेष बल दिया। आकाशवाणी की बाल-सभा को जीवंत बनाने के लिए ऐसा करना स्वाभाविक भी था।
सन् 1971 में लाइश्रम थानिल द्वारा रचित दो बाल पुस्तकें प्रकाशित हुई- पानबा लाइरिक (सफलता की पुस्तक) और अङाङ्गी पाओताक वारि (बाल उपदेश कथाएँ)। इन दोनों पुस्तकों के नाम से ही स्पष्ट है कि लेखक के मन में कहानी से अधिक बच्चों को उपदेश देने और अच्छा नागरिक बनाने की चाह है। स्वाभाविक रूप से यहाँ कहानी पीछे है और उपदेश आगे।
सन् 1980 में पी. कोकङाङ् की पुस्तक लिङ्जल मान्नबा (मतैक्य) का प्रकाशन हुआ। इसके साथ ही उनकी दूसरी बाल-पुस्तक, अङाङ्गी लमचत (बच्चों की सीढ़ी) भी छपी। कोकङाङ् मणिपुरी भाषा के आधुनिकबोध संपन्न कवि रहे हैं, अतः उनकी बाल-कथाओं में लोक और व्यवहार के साथ ही कल्पना की भी अच्छी-खासी भूमिका देखने को मिलती है। वे बालकों को नए युग की संभावनाओं के सामने भी खड़ा करना चाहते रहे होंगे।
सन् 1981 में मणिपुरी और हिंदी, दोनों भाषाओं पर असाधारण अधिकार रखने वाले विद्वान लेखक इबोहल सिंह काङ्जम की बाल-कथा पुस्तक- नयाम्बगी खुदोन (बड़े भाई का उपहार) प्रकाश में आई। इसकी सभी कहानियाँ बालकों को उनके बड़े भाई द्वारा सुनाई जाती हैं। लेखक ने अपने स्वभाव के अनुसार स्थान-स्थान पर सामाजिक जीवन-मूल्यों को बालकों के संस्कारों में
सन् 1988 में वाई0एम0सिंह ने बालकों के लिए वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में रुचि ली और उनकी अतियादा पाइबा (आकाश की उड़ान) शीर्षक पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें बड़ी सरल भाषा में बालकों को हवाईजहाज की निर्माण-कथा सुनाई-समझाई गई है। लेखक की विशेषता है कि उसने वायुयान निर्माण के विभिन्न चरणों की जानकारी देते हुए यान, उड़ान, विमानपत्तन, आकाश आदि की विज्ञान सम्मत तथ्यात्मक जानकारी भी रोचक शैली में प्रदान की है।
सन् 1989 में एक युवा लेखिका देवला देवी ने बच्चों के लिए वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में कदम रखा और वे पूरी तरह उसी को समर्पित हो र्गइं। उनके द्वारा लिखित बाल-विज्ञान साहित्य इस प्रकार है- खङ्बदा कान्नबा- (उपयोगी जानकारी, 1989), अङाङ्गी विज्ञान (बाल-विज्ञान, 1991), खङ्जिनबदा कान्नबा खरा (कुछ जानने योग्य बातें, 1993), मतमगी विज्ञान (आधुनिक विज्ञान, 1993), अकोयबी शक्तम्बू शेइहन्दबा अमसुङ् मसिगी फल (पर्यावरण प्रदूषण और उसके प्रभाव, 1995), ऐखोयगी जगत (हमारा जगत, 1998)। इसके अतिरिक्त उनकी एक बाल-विज्ञान साहित्य की अप्रकाशित पुस्तक इनर्जी अमसुड्. ओयबगी फीभम (ऊर्जा और पर्यावरण) भी है।
देवला देवी ने अब तक बालकों के लिए सबसे अधिक वैज्ञानिक साहित्य का निर्माण किया है। इसके माध्यम से उन्होंने ब्रह्माण्ड की संरचना, सौर-जंगल, सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी का वैज्ञानिक संबंध, सूर्य एवं चंद्र ग्रहण, दिन और रात होने का वैज्ञानिक कारण, पशु-पक्षियों एवं अन्य जीवों का व्यवहार, रहन-सहन, स्वभाव, वनस्पतियों की जानकारी, तत्व, अणु, परमाणु, क्रिया-प्रतिक्रिया का सिद्धांत, वायु, गैस, वाष्पीकरण, निर्वात, भोजन, भूख और शरीर का संबन्ध, प्रोटीन, विटामिन्स और अन्य पुष्टिकारक तत्वों की भूमिका, जल का महत्व, पर्यावरण-प्रदूषण के कारण एवं पर्यावरण-चेतना जैसे महत्वपूर्ण विषयों की उपयोगी जानकारी को बालकों के लिए सुलभ बनाया है। लेखिका ने वैज्ञानिक ज्ञान की सुलभता बढ़ाने के लिए चित्रों का भी भरपूर उपयोग किया है।
सन् 1992 में मणिपुरी भाषा के कहानीकार राजकुमार मणि की पुस्तक, वारिली खीङुल्ली. (कहानी सुनो अनुसरण करो) के प्रथम भाग का प्रकाशन हुआ। इसमें छोटी-छोटी एक सौ एक कहानियाँ हैं। इसी पुस्तक के दूसरे भाग का प्रकाशन 1997 में हुआ। इसमें एक सौ बारह कहानियाँ हैं। राजकुमार मणि की इन पुस्तकों में दी गई कहानियों का आकार लघु है तथा चित्र-दृश्यों पर अधिक बल दिया गया है। कथाकार ने अपने सृजन-कौशल का प्रयोग करते हुए इन्हें कौतूहल-तत्व से परिपूर्ण भी बनाया है। इन पुस्तकों के प्रकाशन में प्रस्तुतीकरण तकनीक और सौंदर्य पर अधिक बल दिए जाने के कारण बालकों के लिए इनका आकर्षण बढ़ गया है।
मणिपुरी बाल-साहित्य के इतिहास में सन् 1999 का वर्ष सबसे महत्वपूर्ण रहा। इस वर्ष मणिपुरी भाषा के पहले बाल-काव्य का प्रकाशन हुआ। सनाकैथेलगी लाइफदिबी बाइ तोनू देवी (समृद्ध बाजार की गुड़िया: द्वारा तोनू देवी) शीर्षक से इस बाल-काव्य की रचना आधुनिक मणिपुरी कविता आंदोलन के प्रारम्भकर्ताओं में से एक, लाइश्रम समरेन्द्र ने की। तोनू देवी गुड़िया बनाने में कुशल मणिपुरी स्त्री है। वह चार खण्डों वाली एक ऐसी कहानी सुनाती है, जिसकी वह स्वयं साक्षी है। कहानी के चारों खंड भी उपखंडों में विभक्त हैं।
इस बाल-काव्य की सबसे बड़ी विशेषता है, कथा में वर्णित कथक्कड़ पात्र का पूरे घटना क्रम में शामिल रहना। दूसरी विशेषता, बच्चों और गुड़िया का विविध खेलों में भाग लेना है। इसकी तीसरी विशेषता इतिहास, परम्परा और रीति-रिवाजों की अनजाने में ही जानकारी देना है और चौथी विशेषता है, बालकोचित अति साधारण भाषा का प्रयोग। इस काव्य-पुस्तक में मणिपुरी गुड़िया तथा अन्य वर्णित घटनओं के चित्र भी दिए गए हैं। ये सारे चित्र कवि समरेन्द्र द्वारा ही बनाए गए हैं। मणिपुरी शैली की गुड़िया का वास्तविक चित्र इसी कविता के साथ देखने को मिलता है।
मणिपुरी बाल-साहित्य अपनी विकास-यात्रा को आगे बढ़ाते हुए नए-नए मार्ग तलाश रहा है। सन् 2002 में मणिपुरी बाल-साहित्य में एक ऐसी पुस्तक शामिल हुई, जिसमें तेरह भाषाओं की बालकथाओं का अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। कंुजो निङोम्बम द्वारा तैयार की गई इस पुस्तक, ख्वाइदगी फजबा वारीमचा तराहुमदोई में असमीया (अनंत देव शर्मा), बंगला (सत्यजीत राय), अंगरेजी (रस्किन बॉण्ड), गुजराती (पन्नालाल पटेल), हिन्दी (भीष्म साहनी), कन्नड (त्रिवेणी), मलयालम (कारूरनीकान्त पिल्लै), मराठी (वी0आर0भागवत), ओड़िया (शान्तनुकुमार आचार्य), पंजाबी (गुरूबख्श सिंह), तमिल (सुन्दर रामस्वामी),तेलुगु (रा0सोमराजन) और उर्दू (सिराज अनवर) की बाल कहानियों का मणिपुरी अनुवाद उपलब्ध है। हम समझ सकते हैं कि मणिपुरी भाषा के इस बाल-साहित्य लेखक ने अपनी मातृ भाषा को समृद्ध बनाने के लिए अत्यधिक परिश्रम किया है। इस प्रकार के और भी प्रयास होने चाहिए।
सन् 2004 में ङाथेम निङोल काङ्बम, ओङ्ग इबेयाइमा की लोक कथा पुस्तक, उमाइबी अमसुङ्, अतै फुङ्गावारि सिङ् का प्रकाशन हुआ इसमें लेखिका ने बालकों के मनोरंजन के लिए कथाओं का ताना-बाना तैयार किया है। इसकी एक बालकथा, वारी ङाङ्बा निङ्थौ एक ऐसे राजा की कहानी है जिसे कहानियाँ सुनने का बहुत शौक था। वह समझता था कि उसे कोई भी कहानी सुना कर उसका मन नहीं भर सकता। उसने अपने राज्य में एक शर्त प्रचारित कर दी कि जो भी व्यक्ति उसे कहानियाँ सुनाकर संतुष्ट कर देता, तो वह उस व्यक्ति के साथ अपनी पुत्री का विवाह करेगा। विवाह के लालच में एक से एक ज्ञानी-पण्डित कहानी सुनाने आता है और राजा प्रतिदिन कहानी सुनने के बाद कह देता है कि उसकी सुनाई कहानी से वह संतुष्ट नहीं है। इस पश्चात् कहानी सुनाने वाले निराश होकर चला जाता और राजा आनन्द मनाते हुए किसी दूसरे कहानी सुनाने वाले की राह देखने लगता। अन्त में एक निर्धन युवक कहानी सुनाने आता है। वह राजा से कहता है कि उसके पास एक ऐसी कहानी है, जिससे राजा का मन अवश्य ही भर जाएगा। राजा उसे वचन देता है कि यदि उसके द्वारा सुनाई गई कहानी से वह संतुष्ट हो जाता है, तो अपनी पुत्री उस युवक को सौंप देगा। युवक कहानी सुनाना शुरू करता है- ‘एक राजा था उसके पास एक कुठला था। कुठला धान से भरा हुआ था। चींटियों को इसका पता चल गया। वे एक दिन आईं और कुठले में से एक-एक धान लेकर चली गईं। इतना कह कर युवक चुप हो गया। राजा ने कहा, इसके बाद क्या हुआ? युवक बोला कि कल फिर चींटियाँ आएँगी, तब कहानी आगे बढ़ेगी। अगले दिन कहानी में चींटियाँ आईं और एक-एक दाना लेकर चली गई। राजा ने कहा कहानी आगे बढ़ाओ। युवक बोला, जब चींटियाँ सारे दाने ले जाएँगी, तभी तो पता चलेगा कि आगे क्या हुआ? राजा युवक की चालाकी समझ गया। उसने हार मान लेने में ही भलाई समझी। युवक राजकुमारी लेकर चला गया।
सन् 2006 में कोईजम शांतिबाला ने मणिपुरी बाल-साहित्य को, तल तरेत (सात रोटियाँ) शीर्षक पुस्तक के माध्यम से विकास का एक नया आयाम प्रदान किया। तल तरेत बाल नाटकों की पुस्तक है। इसमें संग्रहीत बाल नाटकों के शीर्षक हैं, तल तरेत, पातालगी निङ्थौ, चन्द्रकङ्नान, इरेमतोइबी लैमा, ड्रामा तम्बा, तेनबा अनी और चिट्ठी। इनमें से शीर्षक बाल नाटक कतन नामक आलसी और अकर्मण्य युवक की कथा प्रस्तुत करता है। वह अपनी विधवा माँ के साथ रहता है। माँ उसे काम करके कुछ कमाने के लिए कहती है, किन्तु उसके कानों पर जूँ नहीं रेंगती। हार कर एक दिन उसकी माँ सात दिन तक खाने के लिए सात रोटियाँ बनाती है और कतन को देकर प्रदेश भेज देती है। कतन चलते-चलते एक जंगल से गुजरता है। वहाँ एक सरोवर है, जिसमें सात परियाँ जल क्रीड़ा कर रही हैं। उनके खेलने से पानी गन्दा हो गया है। कतन को सरोवर के किनारे पहुँचा देख कर परियाँ उसे सरोवर का मालिक समझती हैं और डर कर छिप जाती हैं। कतन कहता है कि सरोवर में लहरे क्यों उठ़ रही हैं? परियाँ और भी डर जाती हैं। कतन को भूख लगी है। वह एक पेड़ के नीचे बैठ कर रोटियाँ खोलता है और कहता है, कौन सी पहले खाऊँ? पहली बड़ी है, तीसरी मोटी है, सातवीं छोटी है...... अच्छा सबको खा जाता हूँ। परियाँ उसी पेड़ के पीछे छिपी थीं। कतन की बात सुनकर उनके प्राण निकलने लगते हैं। वे उसके सामने आ जाती हैं और क्षमा याचना करती हैं। फिर वे उसे पानी गन्दा करने के बदले एक बकरी देती हैं। कतन बकरी लेकर खुशी-खुशी घर लौटने लगता है। इसी बीच रात हो जाती है। उसे एक निर्धन परिवार में रात काटनी पड़ती है। रात में जब कतन सो जाता है, तो निर्धन पति-पत्नी उसकी बकरी बदल देते हैं। कतन को इस बात का पता नहीं चलता। वह बदली हुई बकरी के साथ घर आ जाता है, किन्तु वह दूध नहीं देती। उसे परियों पर गुस्सा आता है। वह फिर उनके पास जाता है। इसके बाद परियाँ उसे रस्सी और कछुआ देती हैं। यह बाल नाटक मंच पर बहुत अधिक मनोरंजन करता है।
सन् 2007 में पृथ्वीगी फुङ्गावारी खरा शीर्षक पुस्तक का पुनः प्रकाशन हुआ। इसे इसकी लेखिका क्षेत्रियमयुम सुवदनी ने 1994 और 1997 में भी प्रकाशित कराया था। यहाँ इसके उल्लेख का उद्देश्य यह है कि जैसे-जैसे मणिपुरी भाषा का बाल-साहित्य आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ही अपने देश के साथ ही अन्य देशों की बाल-कथाओं को भी उसका अभिन्न अंग बनाया जा रहा है। इस पुस्तक में कोरिया, म्यांमार, फिलिपिंस, मलेशिया, इण्डोनेशिया, तिब्बत, श्रीलंका, पाकिस्तान, चीन, इटली, अफगानिस्तान आदि देशों की कहानियाँ हैं। जब यह पुस्तक पहले पहल प्रकाशित हुई थी, तो इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया था, किन्तु जब इसका प्रकाशन सन् 2007 में हुआ, तो इसने पाठकों पर अत्यधिक प्रभाव छोड़ा। क्षेत्रिमयुम सुवदनी इसके पूर्व सन् 2001 में प्रजातन्त्र चत्पा लैबाक अमगीवारी और 2002 में अवाङ् लोङ्पोक्की फुङ्गावारी शीर्ष पुस्तकों से भी मणिपुरी बाल-साहित्य को पर्याप्त समृद्धि प्रदान कर चुकी हैं।
मणिपुरी बाल-साहित्य के क्षेत्र में गोपाल शर्मा, डॉ0 जामिनी देवी, टी-एच0नोदिया, सनामतुम सिंह, इबोतोम्बी वाइखोम, वीणापाणि देवी, इबोसना खुमन, पृथ्वी मीतै, मधुमंगल आदि भी समय≤ पर पुस्तकाकार और मुक्त रूप में बाल-साहित्य की रचना करते रहे हैं।
मणिपुरी भाषा में बालकों के लिए दो कॉमिक्स भी प्रकाशित हुए हैं। इनमें से एक, हीराचंद्र ऐतिहासिक घटनाओं पर और दूसरा कबुई कैओइबा लोक साहित्य स्रोत पर आधारित है।
मणिपुरी बाल-साहित्य के इस इतिहासपरक सर्वेक्षण के साथ ही कुछ ऐसे तथ्यों पर प्रकाश डालना भी आवश्यक है, जो इस साहित्य और उसके रचनाकार, दोनों के समक्ष उपस्थित समस्याओं का संकेत करते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, साहित्य के इतिहास लेखकों द्वारा बाल-साहित्य की उपेक्षा। यह एक कष्टप्रद सच्चाई है कि मणिपुरी लेखकों ने साहित्येतिहास लेखन पर सबसे कम ध्यान दिया है। पद्मश्री कालाचांद शास्त्री और पद्मश्री खेलचंद्र सिंह ने ही मणिपुरी भाषा में साहित्य का इतिहास लिखा है, लेकिन इनमें से किसी की भी पुस्तक में इतिहास-दृष्टि का समावेश देखने को नहीं मिलता। इनमें बाल-साहित्य की जानकारी का भी सर्वथा अभाव है। राजकुमार झलजीत सिंह ने अंग्रेजी भाषा में मणिपुरी साहित्य का इतिहास लिखा है, किंतु वह प्राचीन और मध्यकाल तक की रचनाओं का ही परिचय देता है। अंग्रेजी में एक इतिहास सी0एच0मणिहार सिंह ने भी तैयार किया है। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित इस ग्रंथ में आधुनिक काल को भी चर्चा का विषय बनाया गया है, किंतु वहाँ भी बाल-साहित्य के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गई है। स्पष्ट है कि मणिपुरी भाषा के साहित्येतिहास लेखकों ने बाल-साहित्य के प्रारंभ, विकास, दशा, स्तर आदि के बारे में न कोई सर्वेक्षण किया है न कोई चिंतन। बाल-साहित्य को सृजनात्मक साहित्य की एक गहन-गंभीर शाखा के रूप में न लिए जाने के कारण बाल-साहित्य के रचनाकार नितांत उपेक्षित बने रहे हैं। सातवें दशक से मणिपुर सरकार के शिक्षा निदेशालय ने बाल-साहित्य के लिए एक पुरस्कार योजना शुरू की थी। ऐसा ही एक प्रयास एस0सी0ई0आर0टी0 ने भी किया था। इन योजनाओं का उद्देश्य लेखन के साथ ही पुस्तक प्रकाशन को भी प्रोत्साहन देना था। यह उद्देश्य निश्चित रूप से ही पूर्ण हुआ, किंतु साहित्य के इतिहास लेखकों द्वारा बाल-साहित्य को फिर भी गंभीरता से नहीं लिया गया। परिणाम सामने है, मणिपुरी बालासाहित्य का कोई वैज्ञानिक और, प्रामाणिक इतिहास आज तक नहीं लिखा जा सका। पिछले वर्षों में कुछ लेखक-संगठनों और सरकारी विभागों द्वारा बाल-साहित्य विषयक कुछ आयोजन हुए हैं, किंतु वे बाल-साहित्य और उसके लेखकों की ओर ध्यान खींचने वाले प्रभावहीन प्रयास भर थे। इतिहास से उनका कोई लेना-देना नहीं था। मणिपुरी बाल-साहित्य के समक्ष एक बड़ी समस्या उसके विकास के लिए किसी ठोस योजना का अभाव है।
एक गंभीर समस्या प्रौढ़ साहित्य के लेखकों का बाल-साहित्य रचना की ओर ध्यान न देना भी है। मणिपुरी भाषा के सैकड़ों नए-पुराने लेखकों में मात्र दो-चार ही ऐसे हैं, जिन्होंने कभी बाल-साहित्य रचा है। इतना ही नहीं, उनकी दृष्टि से बाल-साहित्य लेखकों का कोई गंभीर लेखकीय व्यक्तित्व नहीं है। यह हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में भी है, किंतु मणिपुरी भाषा में संभवतः सबसे अधिक है।
एक बात और, इस आलेख के अनुसार मणिपुरी भाषा में बाल-साहित्य का इतिहास बीसवीं शताब्दी के छठे दशक से प्रारंभ हुआ है। यह निष्कर्ष प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त पुस्तकों और तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। किंतु मौखिक स्रोतों को भी विश्वास योग्य माना जाए तो मणिपुरी भाषा की पहली बाल-साहित्य की पुस्तक सन् 1947 में प्रकाशित हुई थी। कुछ वृद्ध लोगों को उस पुस्तक की क्षीण-सी स्मृति है, किंतु वे पुस्तक और उसके लेखक, दोनों का ही नाम बताने में असमर्थ हैं। उस काल में ङसि दैनिक में बाल-साहित्य के प्रकाशन का तथ्य तो प्रामाणिक ही है, अतः उसी अवधि में किसी पुस्तक की संभावना से भी पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता। तब मणिपुरी बाल-साहित्य के इतिहास को काफी पीछे ले जाना होगा

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

दीपावली : पाँच अनुभव

दीपावली पाँच अनुभव
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प्रकाश की गतियाँ
गु़ज़रती हैं मस्तिष्क से
हवा खोल देती है
सारे दरवाज़े खिड़कियाँ
दीपों की तेजस्वी दुनिया में
उछल-कूद मचाते बच्चे
जोड़ते हैं किलकारियों के मेले
शहर और गाँव की भेदक रेखा को
सबसे बडी़ चुनौती देते हुए
निश्‍शेष नहीं हुई है अभी
मनुष्य बने रहने की संभावनाएँ॥

(दो)

प्रकाश की भंगिमाएँ
रचती हैं पुकारें
भाषा के पार
अर्थों की सीमाएँ खण्डित करते हुए
घोंसले की नींद में
सपनों की दुनिया रचते बच्चों को
भावुक होकर निहारने के बाद
टहनी पर आ बैठी चिड़िया
सबसे पहले
खोलना शुरु कर देती है
नदी के भीतर आकार लेती
अरुणाभा के अभिनव रहस्य ॥

(तीन)

प्रकाश की लहरें
टकराती हैं रात-दिन
अनंत के तटों से
तोड़ डालती हैं
प्रकाश की लहरें
अनंत के अदृश्य किनारों को
एक और अभिनव अरूप
अनंत रचने के लिए
जहाँ कहीं ठहर जाती हैं
यात्राओं की कल्पनाएँ
वहीं बदलने लगती है
सभ्यता खण्डहरों में॥

(चार)

प्रकाश की ध्वनियाँ
झाँकती हैं नक्षत्रों की आँखों में
पहचानने के लिए
अपनी परछाइयों की
उभरती विलीन होती आकृतियाँ
मन को बाँध लेता है
तितली की उडा़न में
आकाश का निमन्त्रण
जलधर की उँगली थामे
चला आता है इन्द्रधनुष
ठुमक ठुमक
बालकों  की आँखों में
शाम ढले जुगनू 
आवाज़ लगाते घूमते
प्रकाश की ध्वनियों को ॥

(पाँच)

प्रकाश के सैनिक हैं
सूर्य और चन्द्रमा
असंख्य ब्रह्‌माण्डों में
ध्वज-वाहक प्रकाश के
असंख्य सूर्य
असंख्य चन्द्रमा
पेड़ भी हैं
प्रकाश के सैनिक
और आदमी भी.
प्रकाश की सेना का
सबसे पहला सिपाही
लड़ रहा युद्‍ध
अंधेरे के विरुद्‍ध
हर समय
हर जगह ॥


प्रकाश-पर्व पर शुभकामनाएँ देवराज

सोमवार, 6 सितंबर 2010

दाने की तलाश में चिड़िया

पत्ते प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं जब जड़ों से
तब फसलें नहीं उगतीं
सवाल उबलते हैं खेत की आँखों में
बादल आते हैं गीले कपड़ों की शक्ल में
भेड़ों से बारिश का पता पूछते हुए
नदियों से डरने लगती हैं मछलियाँ
जंगल की डरावनी कहानियां सुनाने लगते हैं
रेत पर हवा के पैरों के निशान
सूखे तालाबों के संगठित आन्दोलन
फैसले करने लगते हैं बाढ़ के खिलाफ
दाने की तलाश में उड़ती चिड़िया
लड़ने लगती है युद्ध भूख के पक्ष में
विरोध की आवाज़ का गला काटने की
योजनाएं बनाने लगते हैं सियार
घास का हरापन फिर भी बचाना चाहता है अपने को
ताकि ज़िंदा रहें गीतों के बोल
बंजारों की बस्तियों में |


शनिवार, 8 मई 2010

घर

                                  
घर से लौटा हूँ
लेकिन लौटा कहाँ हूँ
घर तो मैं कभी गया  ही नहीं
खोजता ज़रूर रहा घर
अपने भीतर अपने बाहर
मगर वह कभी मिला नहीं मुझे
अकेले क्षणों में पिघलते चौराहों पर
आवाजों के ऊंचे पहाड़ पर चढ़ कर
बुलाया भी मैंने घर को
कि आओ यार
एक बार तो आ जाओ मेरे पास
मगर वह सुनता तब ना!
ऐसा  पत्थर-दिल क्यों हो जता है घर ?
दूर क्यों चला जता है घर किसी-किसी से?

मंगलवार, 16 मार्च 2010

लाइहराओबा : मणिपुरी संस्कृति :धार्मिक-अनुष्‍ठान



देवराज




"सनालैबाक" (स्वर्ण-भूमिके नाम से विश्‍व भर में विख्यात मणिपुर भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित राज्य है । बाईस हज़ार तीन सौ छप्पन वर्ग कि०मी० क्षेत्रफ़ल वाला यह राज्य संस्कृति समाज और प्रकृति-वैभव की दृष्‍टि से अपने प्राचीन नाम के अनुरूप स्वर्ण-भूमि ही है । मणिपुर में सर्वाधिक जनसंख्या मीतै (मैतैजाति के लोगों की है ।लाइहराओबा’ इसी जाति का धार्मिक-अनुष्‍ठान है। यह मीतै जाति के गहन जीवन-दर्शनउत्सवप्रियता और कलात्मक-रुचि को एक साथ प्रस्तुत करता है ।



लाइहराओबा से जुडी़ अनेक पौराणिक-कथाएँ मीतै-समाज में प्रचलित हैं । इन्हीं में से एक कथा के अनुसार नौ देवताओं (लाइपुङ्‍थौने मिलकर पृथ्वी को स्वर्ग से उतारा था । उस समय सात देवियाँ (लाइनुरा तरेतजल पर नृत्य कर रही थीं । उन्होंने विशेष नृत्य-भंगिमाओं के साथ पृथ्वी को संभाला और जल पर स्थापित कर दिया । अपने मूल रूप में पृथ्वी बहुत ऊबड़-खाबड़ थी । इसे रहने योग्य बनाने का दायित्व माइबियों (विशेष पुजारिनेंको सौंपा गया । उन्होंने इसे नृत्य-गति-नियंत्रित चरणों से समतल किया । इस प्रकार पृथ्वी का निर्माण हो जाने के बाद अतिया गुरु शिदबा’ और लैमरेन’ ने निश्‍चय किया कि वे किसी सुन्दर घाटी में नृत्य करेंगे । खोज करने पर उन्हें पर्वत-मालाओं से घिरी एक घाटी मिलीजो जल से परिपूर्ण थी । अतिया गुरु शिदबा ने घाटी को परकोटे की तरह घेरे पर्वत-माला में अपने त्रिशूल से तीन छेद कियेजिससे जल बह गया और पृथ्वी निकल आई । गुरु शिदबा और देवी लैमरेन ने अन्य सात देवियों के साथ इस पृथ्वी पर नृत्य किया । माना जाता है कि देवताओं की प्रसन्नता का यह प्रथम नृत्य था । उसी की स्मृति में लाइहराओबा नामक धार्मिक-अनुष्‍ठान संपन्न किया जाता है ।




लाइहराओबा संबन्धी दूसरी कथा के अनुसार सृष्‍टि के प्रारंभ में देवताओं ने सभा करके विचार किया कि देव


-व्यस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिये एक राजा (सलाइलेनकी आवश्‍यकता है । विचार-विमर्श के पश्‍चात नोङ्‍पोक मालङ्‍’ नामक देवता को सलाइलेन बनाने पर सहमति हुई । इसके बाद आनंदोत्सव मनाया गया । उसी की स्मृति में लाइहराओबा की परंपरा शुरु हुई ।





लाइहराओबा से जुडी़ एक और कथा भी प्रचलित है । इसका संबन्ध नोङ्‍पोक निङ्‍थौ’ नामक देवता और पान्थोइबी’ नामक देवी की प्रणय-कथा से है । ऐसा विश्‍वास किया जाता है कि इन दोनों ने तय किया कि पारस्परिक प्रेम का भोग करने के लिये वे दोनों संसारी प्राणी के रूप में जन्म लेकर एक-दूसरे को प्राप्त करेंगे और मानवी-लीला करते हुए प्रेमानंद का अनुभव करेंगे । इसके बाद नोङ्‍पोक निङ्‍थाऔ ने एक जनजातीय बालक और पन्थोइबी ने राज-कन्या के रूप में जन्म लिया । युवावस्था आने पर दोनों के मध्य प्रेम का बीज अंकुरित हो गयाकिन्तु पान्थोइबी का विवाह खाबा वंश के एक युवक के साथ कर दिया गया । ससुराल आने के बाद पान्थोइबी अपने प्रेमी से मिलने के लिये व्याकुल रहने लगी । वह कुछ ऐसे काम करने लगी कि जिनसे नाराज़ होकर उसकी सास उसे घर से निकाल दे और वह सरलता से अपने प्रेमी के पास चली जाए । कभी-कभी वह बाघ की सवारी करती थी । अंन्ततएक दिन वह जनजातीय युवक के रूप में मानव-लीला करते नोङ्‍पोक निङ्‍थौ के पास पहुँच गई । उधर खाबा अपनी पत्‍नी की खोज में निकल पडा़ । चलते-चलते वह उसी स्थान पर पहुँच गयाजहाँ नोङ्‍पोक निङ्‍थौ और पान्थोइबी थे । तब उसने जान लिया कि वे दोनों साधारण मानव न होकर देवता हैं । यह पता चलते ही खाबा और उसके परिवार वालों ने नोङ्‍पोक निङ्‍थौ की पूजा-अर्चना की तथा आनंदोत्सव मनाया । तभी से लाइहराओबा प्रारंभ हुआ ।



लाइहराओबा का संपूर्ण अनुष्‍ठान अनेक चरणों में संपन्न होता है । सबसे पहले लाइ फि सेत‌‍पा’ होता हैजिसके अंतर्गत लाइहराओबा उत्सव के पूर्व देव-स्थान की अच्छी तरह सफ़ाई होती है तथा देवताओं को नव-परिधान अर्पित किया जाता है । इसके पश्‍चात लाइ इकौबा’, अर्थात प्राण-प्रतिष्‍ठा का चरण संपन्न होता है । इसके अंतर्गत माइबा-माइबी (ओझा और वैद्‍य के मिश्रित चरित्र वाले स्त्री-पुरुषनर्तक-दलों और भक्‍तों के साथ देवता के प्राण लेकर आते हैं । ये प्राण एक घडे़ में जल या पृथ्वी से लाए जाते हैं । यह घडा़ विशिष्‍ट वेशभूषा वाली स्त्री सिर पर ढोकर लाती है । प्राणों की रक्षा के लिये परंपरानुमोदित वस्त्र धारण किए भक्‍त-जन उस स्त्री के आगे-पीछे चलते हैं । इसके पश्‍चात होइलाओबा (विशिष्‍ट गायनऔर लाइबौचोङ्‍बा (विशिष्‍ट नृत्यका अवसर आता है । एक ओर सृष्‍ट-उत्पत्ति की कथा विस्तार के साथ गाई जाती हैजबकि दूसरे के अंतर्गत नृत्याभिनय द्‍वारा देवताओं के निवास हेतु झोंपडी़ निर्मित करने का भाव दर्शाने वाला नृत्य किया जाता है । झोंपडी़ में से नोङ्‍पोक निङ्‍थौ बाहर निकलते हैं । उनके हाथ में शगोल काङ्‍जै’ का डण्‍डा (मणिपुरी पोलो में प्रयुक्‍तहोता है । उनकी पान्थोइबी से भेंट होती है और दोनों श्रृंगारिक नृत्य करते हैं । इसके साथ गायन चलता रहता है ।



लाइहराओबा अनुष्‍ठान के अवसर पर गए जाने वाले गीतों को मुख्य रूप से चार वर्गों में रखा जाता है


--- औग्रीखेनचोअनोइरोल और लाइरेम्मा पाओसा । मणिपुरी वर्ष के चार महीनों (लाङ्‍बनमेराहियाङ्‍गैपोइनुको छोड़ कर शेष आठ महीनों (शजिबुकालेनइङाइङेन,थवानवाकचिङ्‍फैरेनलमदामें यह अनुष्‍ठान कभी भी संपन्न किया जा सकता है । इसके मनाने की अवधि तीनपाँचसात या ग्यारह दिन होती है । लाइरोइ, (अर्थात‍ समापनके दिन माइबा-माइबी शोय खाङ्‍बा’ नामक पूजा करके भक्‍त-जनों की अकालरोग आदि से रक्षा की प्रार्थना करते हैं । अन्त में पेना’ नामक लोक-वाद्‍य पर नोङ्‍गरोलनामक गीत गाया जाता है ।



लाइहराओबा मीतै जाति ही नहींसंपूर्ण मणिपुर की प्राचीन संस्कृति के भव्य रूप का प्रतिनिधि अनुष्‍ठान है । विश्‍व-सभ्यता के विकास में ऐसे अनुष्‍ठानों की महती भूमिका है|




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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

सांस्कृतिक संवाद में जुटी भाषाएँ: हिंदी - मणिपुरी



 देवराज


सना लैबाक (स्वर्ण भूमि) के नाम से विख्यात मणिपुर भारत की पूर्वोत्तरी सीमा पर स्थित स्वर्गोपम प्रकृति-सौन्दर्य से भरापूरा राज्य है। बाईस हजार तीन सौ छप्पन वर्ग किमी0 क्षेत्रफल वाले इस प्रदेश का नब्बे प्रतिशत भाग पर्वतीय है। इसकी सीमाएँ म्यामार, नागालैण्ड, मिजोरम और असम से घिरी हैं तथा इसे कर्क रेखा दो भागो में विभाजित करती है। इस भूमि को समय≤ पर मैत्रबाक, कड्.लैबाक, युवापलि, चक्पा लड.बा, कत्ते, मेखलेत, मोगले आदि नामों से पुकारा जाता रहा है, किन्तु वर्तमान में इसके लिए मणिपुर नाम-संज्ञा का प्रयोग ही सबसे अधिक किया जाता है। इस राज्य को नौ जनपदों में बाँटा गया है- इम्फाल पूर्वए इम्फाल पश्चिमए विष्णपुर, थौबाल  सेनापति, उख्रुल, चुड़ाचांदपुर, तमेंड्.लोड्.,चन्देल। मणिपुर की राजधानी इम्फाल भारत के श्रेष्ठ और आधुनिक सुविधा सम्पन्न नगरों में से एक है। मणिपुर में सर्वाधिक जनसंख्या मीतै (या मैते) जाति के लोगों की है। लोकतन्त्र आने से पहले राज्य-सत्ता पर इसी जाति का अधिकार था, अतः सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक समृद्धि की दृष्टि से यही जाति सबसे विकसित भी है। जातीय-दृष्टि से यहां कबुई, ताड्.खुल, माओ, मरिड्.,कुकी, थादौ, पाइते, मार, अनाल, गड्.ते, कौम, पाओमै, हाओकिप, मोयोन आदि उनतीस जनजातियों से जुडे़ लोग निवास करते हैं। इनमें से अधिकांश ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है। इनके अतिरिक्त मणिपुर में मणिपुरी मुस्लिम (जो शताब्दियों पहले मुगल-काल में सैनिक के रुप में आए थे और यहीं के होकर रह गये) तथा बाहर से आए अनेक जातियों के लोग भी निवास करते हैं। इनमें नेपाली, पंजाबी और बिहार, राजस्थान के विभिन्न स्थानों से आकर बस गई कई जातियों के लोगों की बड़ी संख्या है।
      
मणिपुर की मुख्य और सामान्य सम्पर्क-भाषा मणिपुरी कहलाती है। मैते लोल और मीतै लोन भी इसी के नाम हैं। भाषावैज्ञानिकों के अनुसार मणिपुरी, तिब्बत-बर्मी परिवार के कुकी-चिन उप-परिवार की भाषा है। इसका विकास ईसा की प्रथम शताब्दी के लगभग चेड्.लै नामक एक स्थानीय बोली से हुआ। इस सम्बन्ध में एक अन्य मत यह है कि मंगोलिया तथा अन्य स्थानों से जो जन-समूह मणिपुर में आकर बसे थे, वे समय≤ पर आये थे। प्रब्रजन की अवधि शताब्दियों में फैली होने तथा अन्य कारणों से विभिन्न समूह स्वाभाविक रुप से भाषा-वैज्ञानिक भिन्नता लिये हुए थे। मणिपुरी भाषा का विकास इन सभी की बोलियों के मिश्रण से हुआ । कालान्तर में निकटवर्ती बोलियों व भाषाओं के सम्पर्क ने भी उसे प्रभावित किया।
    
 प्राचीन-काल में पामहैबा (महाराजा गरीबनवाज) के शासन-काल के प्रारम्भ सन् 1714 तक मणिपुरी भाषा अपनी प्राचीन लिपि (मीतै मयेक) में लिखी जाती थी, किन्तु पामहैबा के शान्तिदास गोसाई से वैष्णव मत की दीक्षा लेते ही इस लिपि का प्रयोग कम कर दिया गया और बंगला भाषा के लिये प्रयुक्त लिपि का प्रचलन प्रारम्भ हो गया । उस समय धार्मिक-कृत्यों के अवसर पर मणिपुरी भाषा का प्रयोग भी बाधिक हो गया । बाद में मणिपुरी भाषा तो सामान्य रुप से प्रयोग में आने लगी, किन्तु उसकी प्राचीन लिपि का उद्धार नही हो सका । लेखन में बंगला-लिपि का व्यवहार ही चलता रहा । मणिपुरी समाज को इससे बहुत हानि उठानी पड़ी ।
    
 भाषायी-सम्पर्क की दृष्टि से मणिपुरी भाषा प्राचीन काल से ही अनेक भाषाओं से शब्दों का आदान-प्रदान करती रही है। अपने विकास के प्रथम चरण, प्रथम शताब्दी से 1730 तक, में मणिपुरी भाषा ने देशज शब्दों के साथ ही चीनी और बर्मी भाषा से अनेक शब्द ग्रहण किए । लगातार होने वाले युद्वों में मिलने वाली जय-पराजय के क्रम में यह ग्रहणशीलता निरन्तर बनी रही। शान्तिकाल में भी भौगोलिक निकटता के कारण जनता के आवागमन के चलते भाषायी- सम्पर्क बना रहा । विकास के दूसरे चरण (सन् 1731 से 1890 तक) में मणिपुरी का अधिक संपर्क बंगला आदि से हुआ । यद्यपि यह अनुमान करना कठिन नहीं है कि रचना शैलियों की दृष्टि से मणिपुरी भाषा इस अवधि से बहुत पहले ही संस्कृत के सम्पर्क में आई होगी । मणिपुरी की औग्री, खेनचो आदि शैलियाँ प्राचीन संस्कृत की स्तोत्र-शैली से बहुत मिलती है। कथ्य की दृष्टि से भी दोनों भाषाओं में सूर्य, चन्द्र पर्वत, वर्षा और पौराणिक पात्रों से सम्बन्धित वर्णन पर्याप्त साम्य रखते हैं। इसके मूल में संभवतः प्रब्रजन की प्रक्रिया रही होगी, जिसके अन्तर्गत एक समाज के लोग सुदूर समाजों के बीच जाकर बसते और वहाँ की संस्कृति से घुलने-मिलने के क्रम में अपनी मूल संस्कृति का प्रभाव भी छोड़ते रहे है। इसके बावजूद प्राचीन-काल में भाषिक-प्रभाव अथवा शब्द-ग्रहण के प्रमाण अधिक नही मिलते। यह कार्य दूसरे चरण में संभव हुआ । तीसरे चरण (सन् 1891 से प्रारम्भ) में मणिपुरी भाषा का सम्पर्क हिन्दी और अंग्रेजी से विशेष रुप से बढ़ा। इन भाषाओं से उसने व्यापक प्रभाव ग्रहण किया । यह भी देखने में आया कि इस काल में मणिपुरी भाषा ने बंगला से एक नये प्रकार की प्रगाढ़ता स्थापित की । यह काल मणिपुरी भाषा में नवजागरण के उदय का काल था । नवजागरणकालीन लेखकों ने इस प्रगाढ़ता में नए रंग भरे। हवाइबम नवद्वीपचन्द्र ने माइकेल मधुसूदन दत्त के मेघनादवध तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि के चुने हुए अंशों का मणिपुरी अनुवाद प्रस्तुत किया । ख्वाइराक्पम चाओबा ने बंगला लेखकों- विशेषकर कालीप्रसन्न घोष से प्रभावित होकर मणिपुरी भाषा में निबन्धों व अन्य गद्य-साहित्य की रचना की। इसी प्रकार लमाबम (डा0) कमल, अशाड्.बम मीनकेतन सिंह, अराम्बम दरेन्द्रजीत, राजकुमार शीतलजीत आदि नवजागरणकाल से जुडे़ लेखकों ने बंगला से पर्याप्त मात्रा में प्रभाव ग्रहण किया । वस्तुतः बंगला ने साहित्य के माध्यम से मणिपुरी भाषा को प्रभावित करने का अभियान बहुत पहले ही प्रारम्भ कर दिया था । राजकुमार झलजीत सिंह की मान्यता है कि मुखोपाध्याय, चट्टोपाध्याय, बन्द्योपाध्याय आदि बंगाली ब्राहमण पन्द्रहवीं शताब्दी से ही मणिपुर में रह रहे हैं। इसी कारण जब गरीबनवाज के शासन-काल में वैष्णव मान्यताओं का वर्चस्व स्थापित हुआ, तो कृत्तिवास-रामायण तथा गंगादास सेन के महाभारत के (आंशिक) मणिपुरी- अनुवाद में अधिक कठिनाई नहीं हुई । इसी के साथ बंगला-लिपि का प्रयोग भी उस समय और बाद में सिक्कों, पत्रों और शिलालेखों के सन्दर्भ में किया जाने लगा । आधुनिक-शिक्षा के प्रारम्भिक युग में मणिपुरी भाषा में पाठ्य-पुस्तकों का अभाव था । इस समस्या के समाधान के लिये अंग्रेजी और बंगला पुस्तकों का सहारा लिया गया । कहा जाता है कि प्रसिद्ध मणिपुरी लेखक चाओबा अपने अध्यापन काल में बंगला पुस्तकों को पहले स्वयं पढ़ते थे, तब मणिपुरी में प
      
यहाँ एक सांस्कृतिक-सन्दर्भ का उल्लेख करना आवश्यक जान पड़ता है । डॉ. कपिला वात्स्यायन ने अपनी, पारंपरिक भारतीय रंगमंच: अनन्त धाराएँ पुस्तक में लिखा है कि सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में चैतन्य के ही वैष्णव आन्दोलन से दो धाराएँ निकलीं । एक, कीर्तन-गायन की धारा थी और दूसरी धारा थी, नाटय प्रस्तुति की, जो कृष्ण या कृष्ण और राधा के कथ्य पर आधारित होती थी । आगे चल कर मणिपुर ने भी उन दोनों को अपना लिया । इनमें से नाट्य-प्रस्तुति की धारा यात्रा अथवा जात्रा-नाटक (जात्रावली) के रुप मे प्रचलित हुई । प्रारम्भ में इसका रुप पूर्णतः धार्मिक था, किन्तु बाद में बंगाल, ओडिशा आदि के समान ही इसमें सामाजिक विषयों का प्रवेश हुआ । इसके प्रभाव का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि सन् 1925 के पूर्व मणिपुरी भाषा में मौलिक नाटक नहीं लिखे जा सके थे । उस काल में बंगाला से अनूदित नाटकों का मंचन किया जाता था और रंग-आन्दोलन पूरी तरह बंगला थियेटर के प्रभाव में था । सन् 1925 में लाइरेनलाकपम इबुंगोहल  सिंह ने ”नरसिंह“ नाटक लिख कर मणिपुरी भाषा में मौलिक नाटक-लेखन का प्रारम्भ किया। यह नाटक उसी वर्ष 30 अप्रैल को राजमहल में मंचित हुआ । इस क्षेत्र में सोरोखाइबम ललित दूसरे लेखक थे, जिन्होंने  ”सती खोड्. नाड्.“ तथा ”अरेप्पा मरुप“ शीर्षक नाटक लिख कर यह सिद्ध किया कि मणिपुरी भाषा में सरलता पूर्वक नाटक लिखे जा सकते हैं । बंगला थिएटर की जकड़न से मुक्ति की व्याकुलता भी स0 ललित में दिखाई दी । बाद में प्रसिद्ध कवि अड.ाड्.हल ने ”इबेम्मा“ और ”पोक्तबी“ जैसे सामाजिक-यथार्थ उजागर करने वाले नाटक लिख कर तथा चित्रंागदा नाट्य मन्दिर (1936) की स्थापना करके (साथ ही मणिपुर ड्रामेटिक यूनियन नामक थियेटर की स्थापना में सहयोग देकर ) मणिपुरी-रंग-आन्दोलन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
      
यह घटना दर्शाती है कि किस प्रकार भाषा, साहित्य और संस्कृति के बीच उत्पन्न सम्बन्ध संवेदनशील होते हैं। प्रारम्भ में मणिपुरी-समाज ने बंगला से आई सांस्कृतिक वायु के स्वागत में अपने समस्त वातायन और द्वार खोल दिए, किन्तु जब इस वायु ने समाज की शिराओं में प्रवहमान साहित्य, संस्कृति व कला निर्मित रक्त को बहुत अधिक प्रभावित किया, तो उसकी प्रतिक्रिया भी हुई। धार्मिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में भी और साहित्यिक क्षेत्र में भी। यह प्रतिक्रिया इतनी विस्फोटक थी कि मणिपुर में बंगला की तर्ज पर होने वाले अनुष्ठान स्कूलों से गायब हो गए और साहित्य में मणिपुरी पहचान की व्याकुलता छा गई । लेकिन इस घटना से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इस सम्पूर्ण व्याकुलता के बावजूद कभी भी मणिपुर और बंगाल या मणिपुरी-भाषा और बंगला-भाषा एक दूसरे के विरोध में खड़ी नहीं हुईं। आज भी यहाँ वैष्णव-धारा में आस्था रखने वालों की बड़ी संख्या है । रास, संकीर्तन, जात्रावली का आयोजन होता है। बंगला साहित्य का अनुवाद होता है और बंगला की ओर बड़ी आशा भरी दृष्टि से देखा जाता है । और इस व्याकुलता ने मणिपुरी समाज को जो लाभ दिया, वह यह कि वैष्णव पूर्व प्राचीन धार्मिक रुप को खोजने का प्रयास हुआ, ऐतिहासिक व पौराणिक प्रतीकों को साहित्य में स्थान मिला, मणिपुरी भाषा व प्राचीन लिपि के सम्बन्ध में जागृति आई तथा विश्व प्रसिद्ध मणिपुरी- थिऐटर प्रत्पक्ष हुआ। यह भाषायी और सास्कृतिक सम्बन्ध का ऐसा अनोखा उदाहरण है, जिसमें टकराहट और सहयोग या संघर्ष और सह-अस्तित्व एक साथ कार्यरत हैं।  उत्तर आधुनिकतावादी आसानी से देख सकते हैं कि यह सम्बन्ध किस प्रकार विश्व-सभ्यता व संस्कृति के विकास का रहस्य खोल रहा है।
      
मणिपुरी और हिन्दी के सम्पर्क का इतिहास भी आश्चर्यजनक रूप से बहुत पुराना है। ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में भारत पर हुए मुस्लिम आक्रमण के फलस्वरूप राजनैतिक-अशान्ति तथा सांस्कृतिक-संघर्ष का जो वातावरण निर्मित हुआ, उसके कारण उत्तर भारत से बड़ी संख्या में सामान्य जनता ने इधर-उधर पालयन किया । इनमें धर्म की रक्षा के लिये चिन्तित ब्राहमणों और पुरोहितों की संख्या अधिक थी । ये लोग अनेक स्थानों पर गए । उसी क्रम में मणिपुर भी आए । प्रब्रजन का यह सिलसिला बहुत समय तक चलता रहा । आज भी यह पता लगाया जा सकता है कि इनमें से कौन पहले आए थे और कौन बाद में, क्योंकि जो पहले आ गए थे, उन्होंने अपने नाम के पूर्व अरिबम (अरिबा-पुराना या प्राचीन) तथा जो बाद में आए, उन्होंने अनोैबम (अनौेबा-नया) शब्द जोड़ लिया । आगे चल कर ये वंश के नाम-प्रतीक की भाँति प्रयुक्त होने लगे। इन ब्राहमणों ने मणिपुरी भाषा सीखी तथा स्थानीय परिवेश का अंग बन गए । साथ ही उन्होंने अपनी मूल-धार्मिक-आस्थाओं व कर्म-काण्ड का पालन भी अपने घरों पर जारी रखा । स्वाभाविक रुप से घरों के भीतर होने वाले पारस्परिक-संवाद में ये अपनी मातृ-भाषा अथवा बोली का प्रयोग ही करते होगें । कभी-कभी आस-पड़ोस वालों के सामने भी इनके मुख से अपनी भाषा या बोली के शब्द निकलते होगें। इसे एक नए सांस्कृतिक सम्पर्क की शुरुआत कहा जा सकता है। आगे चल कर जब इस प्रदेश में वैष्णवी धार्मिक विचारधारा का प्रवेश हुआ, तो धार्मिक-कृत्य सम्पन्न कराने का कार्य ब्राहमणों को सौंपा गया। इससे मन्दिरों में संस्कृत का प्रवेश हुआ । साधारण जनता के समक्ष संस्कृत के स्तोत्रों और मन्त्रों की व्याख्या मणिपुरी भाषा में की जाने लगी, जिस कारण मणिपुरी जनता संस्कृत तथा उसके साथ हिन्दी के कुछ शब्द सुनने-समझने लगी।
      
धार्मिक-विकास के इतिहास के अनुसार अठारहवीं शताब्दी आते-आते मणिपुर के मन्दिरों में ब्रजबुलि के नाम से पदों का गायन होने लगा था । कहा जाता है कि ये पद मैथिल-कोकिल विद्यापति के थे । इनके ब्रजबुलि नामकरण का प्रश्न तो भाषा वैज्ञानिकों के विचार का विषय है, किन्तु इतना अनुमान अवश्य किया जा सकता है कि इसके मूल में राधा-कृष्ण की लीला-भूमि, ब्रज क्षेत्र और ब्रज-भाषा की भूमिका रही होगी । भले ही मणिपुर में वैष्णव विचारधारा का आगमन चैतन्य महाप्रभु और बंगाल से जुड़ा हो, किन्तु उसकी मूल भूमि ब्रज ही है। राधा-कृष्ण को केन्द्र बना कर विकसित रासलीला का सम्बन्ध भी मुख्यतः ब्रज से ही है। रासलीला के अवसर पर गाए जाने वाले पद संस्कृत और ब्रज-भाषा में ही होते थे। ब्रज भाषा के लिये ब्रज-बोली का प्रयोग भी सामान्य रुप से किया जाता रहा है । धार्मिक प्रभाव के कारण वैष्णवी व्यापारों में प्रयुक्त संस्कृत को छोड़ कर शेष सभी के लिये ब्रजबोली का प्रयोग चल पड़ा होगा, इसीलिये विद्यापति के जो पद बंगाल होते हुए मणिपुर पहुंचे, उन्हें भी ब्रजबोली कहने के उद्देश्य से भाषिक उच्चारणगत कारणों से, ब्रजबुलि पुकारा गया । स्मरणीय है कि राधा-कृष्ण सम्बन्धी कीर्तन पदों को ब्रजबुली, ब्रजाली आदि भी कहा जाता है। इस बात की संभावना है कि इन पदों में विद्यापति के अतिरिक्त भी कुछ अन्य कवियों के पद रहे होगें । कालान्तर में तो मणिपुर के कृष्ण-भक्त कवियों ने भी भक्ति-काव्य की रचना की । इनमें से मणिपुरी-मीरा कही जाने वाली बिंब्रावती मंजुरी द्वारा सधुक्कड़ी में कुछ पदों की रचना करने का उल्लेख प्राप्त होता है । स्वाभाविक है कि इस सबसे मणिपुरी लोगों का परिचय हिन्दी की  बोलियों से कुछ अधिक बढ़ा होगा ।
      
धार्मिक उद्देश्य से नवद्वीप, पुरी, ब्रज आदि की यात्राओं ने भी भाषा-सम्पर्क की प्रक्रिया तीव्र की। विशेषकर जो लोग मथुरा-वृन्दावन की यात्रा करते थे, वे काम चलाऊ हिन्दी सीख कर वापस लौटते थे और यहाँ आकर अन्य लोगों को बताते थे कि यदि वे अपनी यात्रा को सुखद व सहज बनाना चाहते हैं, तो उन्हें सामान्य वार्तालाप की हिन्दी सीख लेनी चाहिए । इससे हिन्दी के प्रति आकर्षण बढ़ता था । आगे चल कर यही कार्य शिक्षा के लिये काशी जैसे स्थानों पर जाने वाले मणिपुरी विद्यार्थी भी करने लगे। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों के साथ आए व्यापारियों व सैनिकों के साथ भी हिन्दी की शब्दावली मणिपुर पहुंची। इसी के बाद गांधी जी की प्रेरणा से विकसित हिन्दी प्रचार आन्दोलन की हवा इस राज्य में बही, जिसने हिन्दी और मणिपुरी भाषा के सम्बन्धों का एक नया अध्याय लिखना प्रारम्भ किया । इस अध्याय में हिन्दी भाषा का विधिवत प्रचार और साहित्यिक स्तर पर विकसित सम्बन्धों का महत्व है।
    
 ”मणिपुर का सनातन धर्म“, मणिपुर राज्य से प्रकाशित प्रथम हिन्दी पुस्तक है। आधुनिक ऋषि कहे जाने वाले पण्डित अतोमबापू शर्मा द्वारा लिखित यह पुस्तक, स्वयं उन्हीें के द्वारा 6 मार्च सन् 1951 को चुराचांद प्रिटिंग वर्क्स, इम्फाल में मुद्रित करा कर प्रकाशित की गई थी । इसमें धर्म और उसके कर्म-काण्ड से जुड़ी परम्पराओं तथा विधि-विधानों का परिचय दिया गया है। लेखक ने सृष्टि सम्बन्धी मिथकीय-चिन्तन तथा इसी प्रकार की अन्य अभिकल्पनाओं की व्याख्या भी की है। इस पुस्तक के पृष्ठ दो पर कहा गया है- इस जगत की सृष्टि के पहले जल ही जल था। इस समय लाउपूड्.थौ नाम नौ देवगणने सुर्गसे मत्ति दी थी। उन्होनें लाईनूरा नामक सात देवताओं जल के ऊपर नर्तन करती हुई रही थी । उन्होंने उस मत्ति का लेकर जल में डाल दी थी। यह एक दण्ड में एक तापु हुआ। जिस तरह आठ दण्ड में आठ तापुओं हुये, पर उन देवताओं ने उन आठ तापूपर विश्रामकर सुरापान किया । इस तरह आठ बार सुरापान करके विश्राम किया था । इससे चौंसठ दण्डों में चौंसठ तापु हो गये । उन चौंसठ तापुओं से मिलकर यह विशाल पृथ्वी हो गयी । इससे यह पार्थव दिन में चौंसठ दण्ड होते है । और एक दण्ड का नाम मणिपुरीय भाषा में पूड्. अर्थात तापु कहते है। और आठ दण्डों का नाम पूथक अर्थात सुरापान का समय कहते है।
      
पृथ्वी सृष्टि के बाद मणिपुर अर्थात पृथ्वी के नाभि स्थल में आकर सदाशिवजी ने देखा कि उदरावर्त की तरह घिरे हुये पर्वतों के बीच समुन्द्र की तरह जल समूह रहते है । तब शिवजी ने उस पर्वत त्रिशूल ने भेद निकाला । पर उस मणिपुर में शिवजी पार्वती के साथ नर्तन किया था, उस समय देवगण ने भी अपनी अपनी देवीगण के साथ शिवजी के नर्तन में आपस किया था। पर उमा-महेशुर ने उनके साथ सर्ब्बरत कदम्बमय रस क्रीडा की थी। उसको मणिपुरीय भाषा में लाइहराउबा कहते है। मणिपुरीय लोग देवो के प्रीति के लिये उस लाइहराउबा अर्थात उमा महेशुर की रासक्रीडा अभियनय करते हैं।
    
 पं0 अतोमबापू शर्मा मूलतः संस्कृत और अंग्रेजी के विद्वान थे। हिन्दी का उनका ज्ञान सामान्य ही था । हाँ, तत्कालीन परिवेश में बंगला से वे काफी परिचित थे। इस कारण उन्होंने जो हिन्दी लिखी है, उस पर बंगला का स्पष्ट प्रभाव हैं । ऊपर उद्घृत अंशो में एकाधिक स्थान पर विराम के पश्चात पर का प्रयोग हुआ है । यह बंगला का प्रयोग है, जिसका अर्थ है- बाद में या अनन्तर। लिपि लेखन में उन्होने राष्ट्र भाषा प्रचार समिति, वर्धा की तत्कालीन लिपि-नीति का अनुसरण किया है। मणिपुर में हिन्दी प्रचार आन्दोलन का प्रारम्भिक वास्तविक व्यापक कार्य इस समिति की वर्तमान प्रान्तीय शाखा (उन दिनों यह केवल शाखा कहलाती थी) ने किया था।,  अतः शर्मा जी द्वारा इस लिपि का प्रयोग स्वाभाविक था ।
      
भाषा सम्बन्धी सन्दर्भ से हट कर दो अन्य बातें हमारा ध्यान आकर्षित करती है । इनमें से एक यह है कि इस पुस्तक से पता चलता है कि सृष्टि की उत्पत्ति आदि के सम्बन्ध में जिस प्रकार विश्व के अन्य समाजों मे पौराणिक-कथाएँं प्रचलित हैं, उसी प्रकार मणिपुरी पौराणिक साहित्य में भी इनका उल्लेख है। इससे यह भी पता चलता है कि दुनिया भर में फैली इन कथाओं की मूल-प्रकृति समान ही है और इनमें प्रतीकात्मक शैली के प्रयोग द्वारा सृष्टि-विकास या फिर पृथ्वी-निर्माण की प्रक्रिया समझाई गई है। दूसरी बात यह है कि पं0 अतोमबापू शर्मा ने इस पुस्तक में मीतै समाज के जितने धार्मिक पौराणिक विधि विधानों को विचार का विषय बनाया है, उन सभी की व्याख्या हिन्दू धर्म (जिसे रुढ़ अर्थ में हिन्दूवादी व्याख्या कहा जाता है) के आधार पर की है।
    
इस प्रकार की प्रतीक व्याख्या तथा महाभारत आदि के विविध प्रमाणों के आधार पर मणिपुरी संस्कृति को विशाल हिन्दू- संस्कृति की धारा का एक अंग सिद्ध किये जाने की परम्परा रही है। जब राष्ट्रीय-एकता जैसी शब्दावली का बहुतायत से प्रयोग होना शुरु हुआ, तो ऐतिहासिक से अधिक इन्हीं पौराणिक आधारों की छाया में भारत और मणिपुर के बीच एकत्व की खोज भी की जाने लगी । एक समय वह भी आया, जब यह प्रयास अतिवाद की सीमाएँ छूने लगा और प्राचीन मीतै-संस्कृति को एक स्वतन्त्र इकाई मानने वालों मंें इसकी उतनी ही घोर प्रतिक्रिया भी हुई। उस समय पं0 अतोमबापू शर्मा वाली प्रतीक व्याख्या को ब्राहमणवाद के आक्रमण के रुप में देखा गया । संस्कृति की नवीन प्रतीकात्मक व्याख्या और उसके विरोध के मूल में कौन से कारण वास्तविक आधारभूमि वाले थे, यह निर्णय करना या इस रहस्य को खोलना यहाँ अभीष्ट नहीं है । यहाँ केवल इस और संकेत करना लक्ष्य है कि मणिपुर में प्रकाशित पहली हिन्दी पुस्तक भाषायी के साथ ही सांस्कृतिक संसार की जानकारी देने वाली थी । इससे हिन्दी के ज्ञान-भंडार में निश्चय ही वृद्धि हुई।
    
 इसके बाद भी मणिपुरी संस्कृति तथा इस क्षेत्र की धार्मिक स्थिति की जानकारी देने वाली पुस्तकों का प्रकाशन जारी रहा । सन् 1972 में मणिपुरी संस्कृति एक झाँकी (एस0 गोपेन्द्र शर्मा) का प्रकाशन हुआ। इसकी भाषा यद्पि बहुत उलझी हुई है, किन्तु इससे सामान्य सांस्कृतिक जानकारी अवश्य मिल जाती है। सन् 1988 में मणिपुरः विविध सन्दर्भ तथा मणिपुरः भाषा और संस्कृति पुस्तकों का प्रकाशन हुआ । इनमें मणिपुरी-भाषा, संस्कृति, जन-जीवन, कला और धर्म के सम्बन्ध में पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत की गई । ये दोनों ही सम्पादित पुस्तकें हैं । मणिपुर संस्कृति के सम्बन्ध में कुछ ऐसे लेखकों की पुस्तकें भी छपीं, जो मूलतः मणिपुरी भाषी नही हैं । इनमें डॉ0 रमाशंकर नागर (मणिपुर की सांस्कृतिक झलक), डॉ0 जगमल सिंह (मणिपुरी संस्कृति,मणिपुर) और डॉ0 जवाहर सिंह (मणिपुर: साहित्य और संस्कृति) के नाम उल्लेखनीय हैं। इन लोगों के अतिरिक्त सिल्चर (असम) में जन्मे और भातखण्डे हिन्दुस्तानी संगीत महाविद्यालय, लखनऊ के मणिपुरी नृत्य-विभाग के प्राध्यापक डॉ0 गुरु वनमाली सिन्हा ने भी मणिपुरी नर्तन कला पुस्तक लिखी है। इन सभी के माध्यम से मणिपुरी जीवन का परिचय हिन्दी व उसके द्वारा अन्य भाषाओं तक पहुँचा, इसलिये इन्हें सांस्कृतिक सम्बन्ध के विकास की समर्थ-कड़ी के रुप में जोड़ कर देखा जा सकता है । इधर सन् 1994 में आचार्य राधागोविन्द थोड.ाम कविराज द्वारा रचित तीन पुस्तकें-हिन्दू धर्म के मूल तत्व भाग- 1 एवं -2 तथा भारतीय संस्कृति की आधारशिला शीर्षक से प्रकाशित र्हुइं । सन् 1995 में शिवगोविन्द दास (यह थोड.ाम जी का ही नाम है) द्वारा रचित सिद्धेश्वर चालीसा भी छपा है। इसके प्रकाशन का मुख्य उद्देश्य उन मणिपुरी भाषा भाषी लोगों को हिन्दू धर्म की जानकारी देना है, जो हिन्दी पढ़ने और समझने लगे हैं।
      
हिन्दी भाषा का यह सौभाग्य है कि उसे अनेक मणिपुरी भाषी लेखकों ने अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। क्षितिज सा ध्येय (कविता- 1976, आचार्य राधागोविन्द थोड.ाम), हदय सुमनः राष्ट्रीय चेतना चिन्तन (कविता- 1996, हजारीमयुम गोकुलानन्द शर्मा), खम्बा- थोइबी (नाटक- 1963 सी-एच. निशान सिंह) वीर टिकेन्द्रजीत (नाटक- 1987 के0 याइमा शर्मा) खम्बा थोइबी (उपन्यास- 1963, एल0 कालाचांद) मणिपुर के नर-नारियों की जीवन गाथाएँ (जीवनी-1985 सम्पा.फुराइलातपम गोकुलानन्द शर्मा) मणिपुर के अमर दीप (जीवनी- 1988 आचार्य राधागोविन्द थोड.ाम) आदि कृतियाँ हिन्दी साहित्य की सम्पत्ति बन चुकी हैं । इनमें से अधिकांश पुस्तकों की विषयवस्तु मणिपुरी इतिहास, संस्कृति, लोक-जीवन और विचार दर्शन का परिचय देने वाली हैं । कविता की पुस्तकें मुक्त कल्पना, राष्ट्रीय भावना, सौन्दर्य-बोध, मानवतावाद आदि की अभिव्यक्ति करती हैं । यदि इस सूची में श्रेष्ठ मणिपुरी लोक कथाएँं (डॉ0 एस0 तोम्बा सिंह), मणिपुरी लोककथाएँ (सी-एच. निशान सिंह एवं डॉ0 जगमल सिंह), मणिपुर की लोककथाएँं (वही) नोंदोननु (सी-एच. निशान सिंह एवं एक अन्य लेखक) आदि ग्रन्थों तथा डॉ0 हीरालाल गुप्त (मणिपुर की लोक कथाएँ) और डॉ0 जगमल सिंह (तलाश, मणिपुर की विभूतियाँ) जैसे हिन्दी भाषियों द्वारा लिखी पुस्तकों को भी सम्मिलित कर लिया जाए, तो पता चलेगा कि मणिपुर का व्यापक परिचय देने वाली सामग्री हिन्दी में पहुँच चुकी है ।
      
मणिपुर में हिन्दी प्रचार और राज-भाषा के रुप में हिन्दी की स्थिति का विस्तृत परिचय देने वाली दो पुस्तकें उल्लेखनीय हैं, मणिपुर में राज भाषा की प्रगति (डॉ0 जगमल ंिसह) और मणिपुर हिन्दी परिषद, इम्फाल द्वारा प्रकाशित संकल्प और साधना । इनमें मणिपुर और हिन्दी के सम्बन्धों का इतिहास, हिन्दी की वर्तमान स्थिति, हिन्दी प्रचारकों का महत्वपूर्ण योगदान, हिन्दी साहित्य, हिन्दी पत्रकारिता आदि पक्षों पर पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है ।
    
 मणिपुरी और हिन्दी के मध्य अनुवाद कार्य का इतिहास धीरे-धीरे पाँच दशक पूरे कर लेगा । सन् 1962 में श्री अ0 छत्रध्वज शर्मा ने मणिपुरी भाषा के महान कवि लमाबम डा0 कमल के काव्य-संग्रह ”लै परेड.“ की नौ कविताओं का गद्यानुवाद किया था, जिसका प्रकाशन कविश्रीमाला शीर्षक योजना के अन्तर्गत पुस्तक रुप में किया गया था । यह प्रकाशन राष्ट्र भाषा प्रचार समिति, वर्धा ने किया था । सन् 1978 में कमल के ही उपन्यास, माधवी का अनुवाद सी- एच. निशान सिंह द्वारा सम्पन्न होकर प्रकाशित हुआ । सन् 1989 में पाचा मीतै के उपन्यास, इम्फाल अमसुड्. मागी इशिड्.नुड्. शितकी फीभम का हिन्दी अनुवाद इम्फाल और उसकी अबोहवा शीर्षक से छपा । यह अनुवाद युमनाम इबोतोम्वी द्वारा किया गया । सन् 1989 में ही इबोहल सिंह काड्.जम द्वारा अनूदित कविताओं की महत्वपूर्ण पुस्तक, आधुनिक मणिपुरी कविताएँ शीर्षक से छपी । वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में 34 मणिपुरी कवियांें की 78 कविताएँ संकलित हैं । सन् 1991 में डॉ0 सापम तोम्बा सिंह के सम्पादन में आधुनिक मणिपुरी कहानियाँ पुस्तक छपी । मणिपुरी हिन्दी अकादमी, इम्फाल की इस पुस्तक में विभिन्न व्यक्तियों द्वारा हिन्दी में अनूदित दस मणिपुरी कहानियाँ हैं । सन् 1994 में अठारह मणिपुरी कहानियोें का अनुवाद, प्रतिनिधि मणिपुरी कहानियाँ नाम से पुस्तकाकार छपा । राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के अनुवादक डॉ0 इबोहल सिंह काड्.जम हैं । सन् 1993 में डा0 कमल के काव्य-संग्रह, लै. परेड्. की सम्पूर्ण कविताओं का अनुवाद, पुष्प माला शीर्षक से प्रकाशित हुआ । यह अनुवाद डॉ0 हजारीमयुम सुवदनी देवी द्वारा किया गया। सन् 1994 में अरिबम कृष्णमोहन शर्मा निष्णात द्वारा बी0 जयन्तकुमार शर्मा के नाटक, थम्बालनु का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हुआ । सन् 1997 में सुप्रसिद्ध कवि डॉ0 नीलकान्त सिंह की काव्य पुस्तक, तीर्थ यात्रा का हिन्दी अनुवाद इसी नाम से बिड़ला फाउण्डेशन के सहयोग से हिन्दी बुक सेैण्टर, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया। इस गं्रथ का अनुवाद डॉ0 इवोहल सिंह काड्.जम ने किया है। इसी वर्ष कमलेश्वर के सम्पादन में भारतीय शिखर कथा कोश का मणिपुरी खण्ड, पुस्तकायन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया । इसमें डॉ0 इबोहल सिंह काड्.जम, अरिबम कृष्णमोहन शर्मा और डॉ0 ई0 दीनमणि सिंह द्वारा मणिपुरी से हिन्दी में अनूदित सत्ताईस कहानियाँ है। सन् 1997 में महाकवि अड.ाड्हल के सामाजिक उपन्यास, जहेरा का हिन्दी अनुवाद इसी नाम से प्रकाशित हुआ । यह अनुवाद श्री सी-एच0 निशान सिंह ने किया । सन् 1998 में खुमनथेम प्रकाश के कहानी-संग्रह, मड्.गी इशै का हिन्दी अनुवाद, सपने का गीत शीर्षक से प्रकाशित हुआ । यह अनुवाद-कार्य हाओवम आनन्दी देवी ने किया और इसका प्रकाशन अरिबम कृष्णमोहन शर्मा की स्मृति में हुआ । मणिपुरी से हिन्दी में कहानियों के अनुवाद के क्षेत्र में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य डॉ0 ई0 विजयलक्ष्मी ने किया । उनके अब तक दो अनूदित कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके है, एक: पर्वत के पार (सन् 2005) और दूसरा: धरती (सन् 2008) । उनका अनुवाद हिन्दी भाषा के मुहावरे के निकट होता है, इसीलिए उसे पढ़कर मौलिक रचना पढ़ने जैसा अनुभव होता है।
      
काव्यानुवाद के क्षेत्र में हिन्दीभाषी श्री सिद्धनाथ प्रसाद का उल्लेख अति आवश्यक है । उन्होनें मणिपुरी भाषा के आठ नवजागरणकालीन कवियों की चुनी हुई कविताओं का अनुवाद किया, जिन्हंे सन् 1995 में सुजाता प्रकाशन मेरठ द्वारा ”नवजागरणकालीन मणिपुरी कविताएँं“ शीर्षक से छापा गया । सन् 1998 मैं उनके द्वारा अनूदित दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं, ”माँ की आराधना“ (जननेता हिजम इरावत की काव्य-पुस्तक इमागी पूजा का अनुवाद) और जित देखूँ (युवा कवि लनचेनबा मीतै की काव्य पुस्तक येड्.लु येड्.ल बदा का अनुवाद) इनमें से माँ की आराधना कर प्रकाशन भी सिद्धनाथ प्रसाद जी ने अपने धन से ही कराया । साहित्य और राष्ट्र-सेवा के प्रति समर्पण के ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं ।
      
हिन्दी से मणिपुरी भाषा में भी पर्याप्त अनुवाद कार्य किया गया है। प्रेमचन्द, बच्चन, प्रसाद, भगवतीचरण वर्मा, मोहन राकेश, भीष्म साहनी, धर्मवीर भारती, नागार्जुन, बालशौरि रेड्डी, शिवानी, राजेन्द्र सिंह बेदी, जयप्रकाश भारती, जवाहर सिंह, वेद प्रताप वैदिक आदि की रचनाएँ मणिपुरी मंे उपलब्ध हैं । प्रेमचन्द की रचनाएँ तो उच्च स्तरीय मणिपुरी पाठ्यक्रम में भी स्थान पा चुकी हैं । जयशंकर प्रसाद की कामायनी का अनुवाद-कार्य पूर्ण हो चुका है । मणिपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा रामचरितमानस के अतिरिक्त नागार्जुन के कहानी संग्रह (आसमान में चन्दा तैरे) और वालशौरि रेड्डी के उपन्यास (जिन्दगी की राहें) का अनुवाद कराया गया है।
      
अनुवाद के क्षेत्र में दो पुस्तकें , मीतै चनु और फागुन की धूल भी प्रकाशित हुई हैं । इनकी विशेषता यह है कि ये एक साथ मौलिक और अनूदित सामग्री प्रदान करती हैं । इम्फाल की एक साहित्यिक संस्था, पूर्वा द्वारा सन् 1987 में प्रकाशित मीतै चनु में बारह मणिपुरीभाषी कवि संकलित हैं, जिन्होंने मूलतः हिन्दी में कविताएँ रची हैं और डॉ0 इबोहल सिंह काड्.जम द्वारा उन्हें रचनाकारों की मातृ-भाषा में अनूदित किया गया है । इसी प्रकार सन् 1990 में काड्.जम एण्टरप्राईजेज, इम्फाल द्वारा प्रकाशित फागुन की धूल में मणिपुरी खण्ड और हिन्दी-खण्ड को मिला कर कुल पच्चीस कवि संकलित हैं और मूल रचनाओं का प्रकाशन अनुवाद के साथ किया गया है।
      
भाषाओं के पारस्परिक सम्पर्क और साहित्यिक-माध्यम से जिस सांस्कृतिक समन्वय तथा वैचारिक-विकास की कल्पना की जाती है, वह अनुवाद कार्य से सुलभ होता है। मणिपुरी साहित्य के हिन्दी अनुवाद की जो जानकारी दी गई है, उसका अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि अनुवाद के रूप में केवल कुछ पुस्तकें हिन्दी में नही पहुँची हैं, बल्कि उनके माध्यम से एक पूरा समाज और उसका जीवन हिन्दी में पहुँचा हैं। हिन्दी भाषी समाज की भाँति मणिपुरी समाज भी दासता का शिकार रहा है । भले ही कम वर्षो तक, किन्तु इस समाज ने भी अग्रेंजी-साम्राज्यवाद के लम्बे नाखूनों की पीड़ादायक चुभन अनुभव की है। इससे पहले राजतन्त्र की कठोरता का अनुभव भी इस समाज को हुआ है। सामाजिक-धार्मिक दृष्टि से इस समाज ने बड़ी उथल-पुथल का सामना किया है। जिस समाज में जाति की अवधारणा नही थीं और जहाँ श्रम के प्रति ऊँच-नीचं का भाव नहीं था, वही समाज ब्राहमणवादी-व्यवस्था आने पर अनेक सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों का शिकार बन कर कष्ट सहने को भी बाध्य हुआ । स्वतन्त्र भारत में राजनैतिक मूल्यों के पतन, आर्थिक असमानता, शोषण, पिछड़ेपन, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अवसरवाद आदि को भी इस समाज ने भोगा है। अपनी युवा-पीढ़ी को बन्दूकें लेकर जंगलों की ओर जाते तथा प्रति-आतंकवाद का शिकार होते हुए भी यही समाज देखने का अभिशप्त है। इसी के साथ आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता के प्रभाव भी इस समाज के जीवन पर पड़ रहे हैं । इस पूरे अन्तर्बाह्य जीवन तथा परिवेश का चित्रण मणिपुरी साहित्य में विद्यमान है और उस साहित्य का एक बड़ा प्रतिनिधि भाग अनुवाद के माध्यम से हिन्दी में पहुँच चुका है । अब यदि कोई मणिपुर को जानना व उसके यथार्थ का अनुभव करना चाहता है, तो वह इस साहित्य का उपयोग कर सकता है । अरिबम कृष्णमोहन शर्मा द्वारा अनूदित नाटक, थम्वालनु के माध्यम से तत्कालीन राजतन्त्रात्मक-व्यवस्था के वास्तविक रुप और इसकी नायिका थम्बालनु में निरीह जनता की दशा के दर्शन किये जा सकते हैं। कमल और उनके समकालीन कवियों की कविताओं में नवजागरण की राजनैतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक-चेतना को पहचाना जा सकता है।  आधुनिक कविता में वर्तमान युग की समस्याओं, विचारणाओं और अन्तर्विरोधों को देखा जा सकता है और कहानियाँ पढ़ कर दिन-रात तनाव में जीते समाज के हृदय की धड़कनें अनुभव की जा सकती हैं। ठीक यही बात अनूदित होकर मणिपुरी भाषा में आ चुके हिन्दी साहित्य के विषय में भी है। किसी भाषा में प्रेमचन्द या प्रसाद की रचनाओं का अनुवाद हो जाना उस भाषा में सम्पूर्ण हिन्दी-समाज तथा वृहत्तर रूप में भारतीय-संस्कृति व समाज का उपस्थित हो जाना है। यदि इनके साथ कुछ अन्य युगीन साहित्यकार और आ जाएँ, तो वह उपस्थिति और सघन हो जाती है और इसका सांस्कृति अर्थ अधिक विस्तृत हो जाता है। यह जान कर विस्मयपूर्ण आश्चर्य हो सकता है कि मणिपुरी साहित्यकार मुक्तिबोध और अज्ञेय से खासे परिचित हैं । आधुनिक मणिपुरी कविता आन्दोलन के प्रारम्भकर्ताओं में से एक, एलाड्.बम नीलकान्त सिंह तो अज्ञेय को अपना काव्य-चेतना गुरू तक स्वीकार करने में नहीं हिचकते थे । दूसरी और कामायनी समझने के लिए वे मुक्तिबोध को पढ़ना आवश्यक मानते थे । यह अकेला उदाहरण ही मणिपुरी और हिन्दी के सांस्कृतिक-सम्बन्धों की अनेक पर्तें खोलने वाला है।
      
यह सम्बन्ध साहित्य-रचना की परिपाटियों और भाषा की दृष्टि से भी ध्यान देने योग्य है। मणिपुरी भाषा के लेखक, युम्लेम्बम इबोमचा ने सन् 1969 में पहली लघु-कथा लिखी थी, किन्तु वह नहीं जानते थे कि उनकी रचना कहानी हैं, या लघु-कथा । नौवंे दशक में लघु-कथा आन्दोलन की आँच हिन्दी से मणिपुरी में पहुँची, तो लोगांे का ध्यान इबोमचा की रचना की ओर गया । थोडे़ समय बाद ही कई कथाकारों के लघु-कथा-संकलन प्रकाशित हो गए। प्रो. इबांेहल सिंह काड्.जम ने लघुकथा के लिए ”वारिपिक्त्रु“ शब्द का चयन किया और इसी नाम से अपना लघु-कथा संग्रह भी प्रकाशित किया । यह उदाहरण भाषाओं के साहित्यिक रिश्तों की पड़ताल करता है और भाषायी-संस्कृति को खोजने में लगे लोगों का मार्ग-दर्शन करता है। एक अन्य उदाहरण इससे भी विस्मयजनक है। तेलुगु-हिन्दी विद्वान प्रो0 भीमसैन निर्मल ने प्रख्यात तेलुगु कवि सी0 नारायण रेड्डी की कृति, विश्वंभरा का हिन्दी अनुवाद किया है। हिन्दी के माध्यम से वह कृति मणिपुर तक पहुँची । एक युवा मणिपुरी हिन्दी लेखक डॉ0 लनचेनबा मीतै ने विश्वंभरा का अध्ययन किया और मणिपुरी भाषा में पंचपदी-शैली की अनेक कविताएँ रच डालीं । ये पंचपदियाँ येड्.लु येड्.लुबदा शीर्षक से पुस्तकाकार छपीं । बाद में श्री सिद्धनाथ प्रसाद द्वारा इनका हिन्दी अनुवाद किया गया । भाषाओं के सम्पर्क और प्रभाव का यह उदाहरण रोमांचित कर देने वाला हैं।
    
इस सम्पर्क से मणिपुरी और हिन्दी भाषा को जो प्रतीक, मुहावरे, कहावतें, विशिष्ट ध्वन्यात्मक शब्द, आलोचना सम्बन्धी पारिभाषिक शब्द, सांस्कृतिक शब्द, ललित और उपयोगी कलाओं से जुडे़ शब्द मिले है, वे संख्या में कम भले ही हो, किन्तु महत्व की दृृष्टि से कम नहीं हैं। इसी प्रकार पौराणिक सन्दर्भो के प्रयोग के क्रम में जो सामग्री दोनों भाषाओं में आ-जा रही है, वह अभिव्यक्ति के अभिनव माध्यम भी उपलब्ध करा रही है। भविष्य में इसके सुखद परिणाम सामने आएँगे । मणिपुरी से हिन्दी में अनुवाद करने वाले साहित्यकार इस दिशा में बड़ी सावधानी भरा कदम उठा रहे है। वे ऐसे शब्दों और मुहावरों को ज्यों का त्यों अनूदित सामग्री में खपाते हैं, जिनके समानार्थक शब्द हिन्दी में नहीं है और जो आसानी से हिन्दी में खपाए जा सकते हैं।  इनमें केवल पौराणिक शब्दावली ही नही आती, बल्कि अन्य अनेक क्षेत्रों से जुड़े शब्द भी आते हैं । उदाहरण के लिये शरीर के अंग, उपांग और प्रत्यंग सम्बन्धी जितने शब्द मणिपुरी में हैं, उतने हिन्दी में नही हैं, कालावधि की दृष्टि से हिन्दी और मणिपुरी महीनों के नाम पूर्ण साम्य नहीं रखते, दोनों भाषाओं में वर्णित राज-परम्पराओं में कुछ भिन्नतााएँं हैं आदि । अनुवाद करते समय इनसे सम्बन्धित शब्दों को मूल रुप में प्रयोग करके पाद-टिप्पणी मे उनका अर्थ दे दिया जाता है। इस विधि का उपयोग हिन्दी से मणिपुरी में अनुवाद करते समय भी किया जाता है। परिणास्वरुप दोनों भाषाएँ साहित्य-सम्पदा पाती हैं और दोनों समाज एक दूसरे की सांस्कृतिक-विशिष्टता से परिचित होते हैं। इस परिचय से प्रेरित होकर तुलनात्मक भाषा वैज्ञानिक शोध को भी प्रोत्साहन मिलता है। मणिपुरी और हिन्दी की व्याकरणिक कोटियों का तुलनात्मक अध्ययन (डा0 एस0 तोम्बा सिंह), हिन्दी और मणिपुरी परसंर्गो का तुलनात्मक अध्ययन (अ. कृष्णमोहन शर्मा), हिन्दी-मणिपुरी क्रिया संरचना(डॉ. इवोहल सिंह काड्.जम) आदि ग्रन्थ इसी परिचयोत्पन्न प्रेरणा के परिणाम हैं। इनमें दो भिन्न भाषा-परिवारों की सदस्य-भाषाओं के समान और व्यतिरेकी सम्बन्धों को जाँचा-परखा गया हैं, जिससे भाषायी-समझ और वैचारिक विकास में सहायता मिली है। भारत की वर्तमान भाषा-तमस्या को हल करने के सन्दर्भ में ऐसे अध्ययनों की उपादेयता असंदिग्ध है।
    
 भाषा और साहित्य, पारस्परिक-संवाद और समझ पर आधारित सांस्कृतिक -दृष्टि के विकास में जुटे हैं, हम चाहें तो  इनसे प्रेरणा लेकर अपनी भूमिका का निर्धारण कर सकते हैं।.....


-हिन्दी विभाग
मणिपुर विश्वविद्यालय
कांचीपुर, इम्फाल- 795 003 (मणिपुर)