रविवार, 17 जनवरी 2010

ज्योति बसु के लिए-१


                                                      

ज्योति बसु के लिए



    एक पहाड़ के भीतर 
      अचानक हुए भारी विस्फोट ने
रौंद डाले 
दिशांत तक फैले
जंगल, मैदान 
नदियाँ. झरने, 
देर तक हिलते रहे
चिड़ियों के घोंसले
कांपती रहीं
चास्लाना के भीतर
अब तक दिशा भटकी 
अधमरी आवाजें
क्या तुम महसूस कर सके थे
इतना सब
अपने जाने के वक़्त !
मेरे समय की 
भूख से उत्पन्न
एक बेसहारा रिरियाहट
लगातार घूर रही है
तुम्हारी पीछे छूट गयी चप्पलें
जिनमें तुम
हमेशा पहचान लिए जाते थे
अपनी पूरी सच्चाई के साथ
नंगे बच्चों से घिरी कुछ आकृतियाँ
अपने जूते छिपा रही हैं
कालीनों के नीचे
तुम्हारी चप्पलों पर 
हक अजमाने के लिए
भला क्यूँ भूल गए तुम
अपनी चप्पलें
यहाँ से चलते  समय? 
कल से तुम्हारे सपनो का
नक्शा तय करेंगे
कुहरे से ढकी बस्ती के
दिशाहारा भेड़िये

खड़ी  करेंगे
तुम्हारी इन्ही चप्पलों को
अपनी गवाही में.

7 टिप्‍पणियां:

  1. इस नए ब्‍लॉग के साथ आपका हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. आपसे बहुत उम्‍मीद रहेगी हमें .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  2. हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में प्रोफेशन से मिशन की ओर बढ़ता "जनोक्ति परिवार "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ ,

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  3. हिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें

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  4. यह कविता २४/१/२०१० को ''स्वतंत्र वार्त्ता'' [हैदराबाद] में भी प्रकाशित हुई है.
    अभिनंदन!

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