सोमवार, 18 जनवरी 2010

ज्योति बसु के लिए - २


    ज्योति बसु के लिए - २


 एक पेड़ का बयान
फूल से होते हुए
फल के पेट में पहुंचा
पकता रहा वहीँ
मुद्दत तक
एक दो- पहर
पेड़ का बयान
टपक कर
धूल में जा गिरा
आँखों में एक समझदार चमक लिए
बड़ी - बड़ी सफ़ेद और पीली
कीलों  की नोकों पर
टिके ऊंचे दरवाज़े
थरथराने लगे
कबूतरों पर झपटने को
तैयार बिल्लियाँ
सोचने लगीं
हमलों के नए तरीकों के बारे में
वक़्त का एक छोटा सा टुकड़ा मिल गया
पेड़ के बयान को
कबूतरों की बंद आँखों को
आवाज़ देकर
उसने सिर्फ इतना कहा
              ' यह डरने का समय नहीं है
                सोचने का समय है.'


कबूतरों की आँखों में
हरकत उभर आई है
यह बिल्लियों के लिए
अपशकुन से कम नहीं.





1 टिप्पणी:

  1. ''फेसबुक'' से......
    ==========================

    Hari Joshi and Chandan Pandey like this.

    Purnima Varman बहुत अच्छा लिखा है।
    Yesterday at 8:52pm ·


    Hari Joshi कबूतरों की आंखों में हरकत उभर आई है, यह बिल्लियों के लिए अपशकुन से कम नहीं है्.......ज्योति दा को श्रद्धासुमन।
    Yesterday at 9:35pm ·


    Gopal Sharma naman!
    Yesterday at 11:33pm ·


    Atul Kanakk naman , jyoti basu ko bhi, is kavita ke liye Dr, devraj ko bhi our ye kavita uplabdh karane ke liye apne Hrridde ko bhi
    8 hours ago ·


    Virendra Jain आज की राजनीति के हिसाब से ज्योति बसु त्रेता युग के नायक लगते हैं। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि उनकी सोच को पूरी करने हेतु की गयी कार्यवाहियों से ही दी जा सकती है। कविता में आपकी भावनायें साफ साफ व्यक्त हुयी हैं।
    3 hours ago ·

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