बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

मणिपुर में हिंदी

देवराज:

18वीं शताब्दी में वैष्णव- पदावली (ब्रजबुलि- पदों के नाम से) मणिपुर के मंदिरों में गाई जाने लगी थी. इसे चैतन्य महाप्रभु के शिष्य वैष्णव धर्म के सन्देश के साथ लेकर मणिपुर पहुंचे थे. इन भक्तों की चार विशेषताएं थीं. एक- राधा-कृष्ण की सरस व मोहक लीलाओं को संगीतमय बनाकर आकर्षक रूप में प्रस्तुत करना, दो- बिना किसी विरोध को जन्म दिए स्थानीय जनता के मन में भक्ति व प्रेम की ज्योति जगाना, तीन- मणिपुर के लौकिक वातावरण को स्वीकार करके भक्ति को पढ़े - बेपढ़े सबके लिए सुलभ बनाना और चार- समूह- गान की परम्परा. धीरे-धीरे वैष्णव मत का प्रचार-प्रसार बढ़ने लगा. गाँव- गाँव, घर- घर मंदिर बनाए जाने लगे और कीर्तन की ध्वनि गूंजने लगी. मणिपुर के राजा वैष्णव मत में दीक्षित हुए. इससे राधा-कृष्ण और उनके माध्यम से भारत की वैष्णवी - सांस्कृतिक धारा इस राज्य में बहने लगी.

इस धार्मिक - सांस्कृतिक जागरण का विशेष पहलू है, तीर्थ यात्राओं की परम्परा. राधा और कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाले लोग मथुरा - वृन्दावन के उन क्षेत्रों के दर्शन करना अपना परम सौभाग्य मानते थे, जहां राधा- कृष्ण ने अपनी लीलाएँ संपन्न की थीं. जो साधन संपन्न थे, वे कभी- कभी प्रति वर्ष इस यात्रा में भाग लेते थे. इसके अतिरिक्त यथा-समय हरद्वार, काशी, प्रयाग, गया, नवद्वीप आदि की यात्राओं का क्रम चलता रहता था. मणिपुर के राजाओं व संपन्न जन-साधारण द्वारा इनमें से कुछ तीर्थ- स्थानों पर बनवाए गए मंदिरों व रास-मंडलों को आज भी देखा जा सकता है.

तीर्थ- यात्राओं का यह आयोजन मणिपुर के निवासियों को भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति और ब्रज भाषा तथा हिंदी की अन्य बोलियों के संपर्क में लाता था. ये लोग जब अपने घरों को लौटते थे, तो उन्हें हिंदी के इन रूपों का परिचय प्राप्त हो चुका होता था और उनके मन में वृहत्तर भारत का चित्र भी स्थापित हो चुका होता था. वे यह भी समझ चुके होते थे कि मणिपुर के बाहर मणिपुरी भाषा में काम चलाना कठिन है, इसके लिए व्यापक संपर्क की भाषा जानना आवश्यक है. यात्रा की सुविधा और संपर्क की सरलता के लिए धर्म प्रधान मणिपुरी लोग अनजाने ही हिंदी को अपनी निज की भाषा स्वीकार कर लेते थे. इस प्रकार पहले पहल हिंदी ने मणिपुर में अपना स्थान बनाया.

भारतवर्ष पर मुसलामानों के आक्रमण के साथ ही प्रब्रजन एकाएक बढ़ना शुरू हुआ. मुसलामानों ने लूटपाट, राज्य-स्थापना और शक्ति के बल पर इस्लाम के प्रचार को उद्देश्य बनाकर भारत पर आक्रमण किए 11वीं शताब्दी के काल में धर्म- परिवर्तन का क्रम चल पड़ा था. इसके तीन परिणाम सामने आए. कुछ लोग क़त्ल कर दिए गए, कुछ ने प्राणों की रक्षा हेतु धर्म बदलना स्वीकार कर लिया और कुछ ने इधर - उधर भाग कर अपने धर्म की रक्षा का प्रयास किया. मणिपुर के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी ऐसे ब्राह्मण परिवारों के वंशज हैं, जिनके पूर्वज अपना धर्म बचाने के लिए इधर चले आए थे. इनमें से काफी ब्राह्मण मिथिला के हैं. गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि से भी इस क्रम में अनेक ब्राह्मण आ गए थे. अन्याय से बचने के लिए ये ब्राह्मण अन्य पूर्वोत्तर राज्यों की भाँति मणिपुर में यत्र-तत्र जहाँ भी अनुकूल परिवेश मिलता था, बस जाते थे. जैसे-जैसे समय बीतता जाता था, ये लोग अपने को स्थानीय परिस्थितियों में ढाल लेते थे और यहाँ की भाषा सीख लेते थे. आज तो मणिपुर के सभी ब्राह्मण अपने नाम के पीछे शर्मा लिखते हैं, किन्तु यदि इनसे इनके गोत्र पूछे जाएँ, तो इनके मूल निवास-स्थान का पता लगाना कठिन नहीं है. पुराने ज़माने में हिंदी के पक्ष में वातावरण बनाने में इन प्रब्रजित ब्राह्मणों ने महत्वपूर्ण कार्य किया. इसका कारण यह है कि संस्कृत और हिंदी जानने वाले इन लोगों ने अपने को मणिपुरी समाज के अनुकूल बनाकर अपना परम्परागत जीवन-कर्म, पौरोहित्य प्रारम्भ कर दिया. ये धार्मिक-कृत्यों के दौरान हिंदी का प्रयोग भी करते थे और मंदिर में भोग चढ़ाने, धार्मिक-भोज और कीर्तन के अवसर पर पुरोहित संस्कृत के शब्द भी बोलते थे. वैष्णव धर्म के श्रद्धालु-जन उचित रूप में दोनों भाषाओं के शब्द समझ लेते थे. इस प्रकार मणिपुर के जीवन में धीरे- धीरे हिंदी का महत्व बढ़ा.

राजतंत्र के ज़माने में राजाओं से छात्रवृत्ति प्राप्त करके मणिपुर के ब्राह्मण बालक संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने नवद्वीप व काशी आदि धार्मिक-सांस्कृतिक स्थानों पर जाया करते थे. इनमें से काशी के, हिंदी के वातावरण से घिरे होने के कारण, संस्कृत के साथ-साथ हिंदी का व्यावाहारिक ज्ञान प्राप्त कर लेना इनके लिए बड़ा सहज था. इन्हीं में से अनेक पौरोहित्य- कर्म के साथ-साथ सक्रिय रूप से हिंदी के प्रचार में भी जुट जाते थे. कुछ तो हिंदी भाषा का व्यवस्थित शिक्षण भी प्रारंभ कर देते थे. इनके पूजा- पाठ में भी संस्कृत और मणिपुरी के साथ हिंदी का पर्याप्त अंश होना स्वाभाविक था. मणिपुर राज्य में ब्राह्मणों में आवास-परिसर में मंदिर और उसके सामने बड़ा सा मंडप बनवाने की प्राचीन परम्परा आज भी मिलती है. भगवान के दर्शन के बाद भक्त लोग इसमें इकट्ठे होते थे और एक निश्चित समय पर पुजारी इन्हें उपदेश करते थे. इस उपदेश की मुख्य भाषा मणिपुरी होती थी और बीच-बीच में प्रसंग पड़ने पर हिंदी का प्रयोग होता था. कीर्तन का माध्यम ब्रजबुलि (या ब्रजालि) था ही, इससे हिंदी मणिपुर में बढ़ी. इस प्रकार प्रारम्भ में हिंदी भाषा धर्म तथा संस्कृत भाषा के साथ मणिपुर पहुँचीं.

आधुनिक काल में भारतीय नव-जागरण का प्रभाव सामाजिक और राष्ट्रीय- जागरण के रूप में सामने आया. महर्षि दयानंद, महर्षि अरविन्द, राजा राममोहन राय आदि ने सम्पूर्ण भारतीय जीवन को झकझोर दिया और यह अनुभव किया जाने लगा कि रूढ़ सामाजिक मूल्यों के अस्वीकार के बिना भारतीय समाज को नहीं बचाया जा सकता. इसी प्रकार राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित किया गया. 'भारतीय जनता के समस्त दुखों का मूल दासता है.', इस विचार ने आधुनिक भारत के निर्माण में क्रांतिकारी सहयोग किया. हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में खोजने वाली भी यही धारणा थी. अंग्रेजों से इस देश को मुक्त कराने के लिए भारत की सम्पूर्ण जनता को यह बताकर जगाना आवश्यक था कि उपनिवेशवादी अंग्रेज़ इस देश के लिए अभिशाप हैं और जितनी जल्दी हो सके, उनकी सत्ता को उखाड़ने हेतु एक जुट होकर खड़े होना अनिवार्य है. जन- जागरण के महान कार्य के लिए भाषाओँ की खोज के क्रम में हिंदी की ओर अधिकाँश लोगों का ध्यान गया. यद्यपि देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग राष्ट्रीय भाषाएँ उपनिवेशवाद के विरोध का वातावरण बना रहीं थीं, किन्तु उन सब में हिंदी एक ऐसी भाषा थी, जो उस काल में भी सबसे अधिक भारतीय लोगों द्वारा बोली और समझी जाती थी. भाषा वैज्ञानिक कारणों से और लिपि की वैज्ञानिकता के कारण इसे आसानी से सीखा जा सकता था. इसने व्यापार संबंधी कारणों से भी भारत के विशाल क्षेत्र में अपनी पैठ बना ली थी. इस सबसे अलग धर्म, इतिहास और संस्कृति के व्यापक भारतीय मानकों को इस भाषा ने बहुत पहले से ही इस देश के व्यापक क्षेत्र तक पहुचाना शुरू कर दिया था. इन सब कारणों से हिंदी को अखिल भारतीय स्तर पर सामान्य संपर्क की ही हिंदी को राभाषा के रूप में मान्यता मिली. आगे चलकर हिंदी भाषा को स्वतंत्रता-संघर्ष की मुख्य भाषा बनने का अवसर मिला तथा साधारण जनता यह समझने लगी कि भारत के स्वतंत्र होते ष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया जाएगा. महात्मा गाँधी, राजगोपालाचार्य, सुभाष चन्द्र बोस, लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलई आदि राष्ट्रीय नेताओं ने जो आशाएं जगाईं, उनसे लगने लगा कि हिंदी स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा होगी, वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को प्रतिष्ठा दिलाएगी, समग्र भारत की जनता को एकता के सूत्र में बांधेगी और समय आने पर रोज़गार की भाषा भी बन जाएगी. जनता की आशा ने भारत के हिंदीतरभाषी प्रान्तों में हिंदी प्रचार-आन्दोलन की सशक्त पृष्ठभूमि तैयार की और हिन्दीभाषी प्रान्तों में भी इस भाषा के प्रति जागृति को जन्म दिया. हिंदी के प्रचार के लिए विभिन्न संस्थाएं सामने आयीं, जैसे हिंदी साहित्य- सम्मलेन, प्रयाग; दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,मद्रास; राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा; राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटी आदि. मणिपुर राज्य भी इस लहर से अछूता नहीं रहा. वहां भी हिंदी प्रचार- आन्दोलन ने दस्तक दी.

श्री ललितामाधव शर्मा, श्री बंकबिहारी शर्मा, श्री थोकचोम मधु सिंह, पं. राधामोहन शर्मा एवं श्री कुंजबिहारी सिंह कैशाम को मणिपुर के हिंदी प्रचार आन्दोलन का आदि-स्तम्भ माना जाना चाहिए. इन महानुभावों ने स्वतंत्रता, राष्ट्रीय एकता, सामान्य संपर्क की संभावना, अखिल भारतीय स्तर पर समस्त भारतीय नागरिकों में एक सामान जागृति, विश्व मंच पर भारत और भारतीयता की पहचान की प्रतिष्ठा की आकांक्षा आदि से प्रेरणा ग्रहण करके मणिपुर के इम्फाल नगर को मुख्यालय बनाया और सारे राज्य में हिंदी-प्रचार का कार्य किया. उस काल में इस क्षेत्र में हिंदी और भारतीय संस्कृति का प्रचार देशद्रोह माना जाता था. विदेशी शासक यह समझते थे कि यदि हिंदी भाषा को फलने-फूलने दिया, तो यह उनके दीर्घकालीन हितों के विरुद्ध जाएगा. हिंदी प्रचार का अर्थ एक भाषा मात्र का प्रचार नहीं था, बल्कि वह स्वाधीनता आन्दोलन के एक मज़बूत हथियार का निर्माण भी था.यही कारण था कि तत्कालीन शासक हिंदी प्रचार को बढ़ावा नहीं देते थे. श्री बंकबिहारी शर्मा ने मुझे एक बार बताया था कि जब वे अपने एक निकट संबंधी, श्री भागवतदेव शर्मा के साथ हिंदी प्रचार कर रहे थे तो मणिपुर के तत्कालीन पॉलिटिकल एजेंट ने उन्हें बुलाकर कहा, हिन्दुस्तान कोई राष्ट्र नहीं है, फिर तुम लोग क्यों राष्ट्र भाषा- राष्ट्र भाषा चिल्लाते हो? इतना ही नहीं, उसने उन्हें सैडीशनिस्ट तक कह डाला था. इससे उस काल की हिंदी- प्रचार संबंधी कठिनाइयों का कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है. इसके बावजूद इन लोगों ने अपने मार्ग की कठिनाइयों को चुनौती के रूप में स्वीकार किया. कुछ लोगों ने पहले घर पर ही हिंदी सिखाने की व्यवस्था की और घर-घर जाकर लोगों को हिंदी तथा स्वतंत्रता का महत्व समझाया. इसका उद्देश्य सामान्य लोगों में हिंदी के प्रति रुझान पैदा करना था. उस काल में पं. द्विजमणिदेव शर्मा मणिपुर के राजा के शिक्षा-सलाहकार थे. जब उन्हें हिंदी का महत्व समझ में आया, तो उनके प्रयास से हिंदी-प्रचार कार्य में राजकीय सहायता प्राप्त हुई.

मणिपुर में हिंदी का सबसे पहला विद्यालय थोकचोम मधु सिंह के घर में प्रारम्भ किया गया. श्री मधु सिंह केवल इकत्तीस वर्ष जीवित रहे, किन्तु अपने जीवन की इस अल्प अवधि में ही उन्होंने सामाजिक, सांस्कृतिक और शिक्षा समबन्धी गतिविधियों से मणिपुरी समाज को नयी दिशा देने का भरपूर प्रयास किया. उस काल में हिंदी की दबी-छुपी प्रतियोगिता बंगला भाषा के साथ भी थी. अंग्रेजों के साथ काम करने वाले बंगलाभाषी अधिकारी चाहते थे कि यदि कभी अंग्रेज़ी हटे, तो उसका स्थान बंगला भाषा को मिलना चाहिए. थोकचोम मधु सिंह ने इस समस्या से निपटने का एक तरीका निकला. उन्होंने वैचारिक आदान-प्रदान के लिए इम्फाल में 'डिबेटिंग- क्लब' की स्थापना की. उस क्लब में वे अवसर-अवसर पर 'हिंदी की आवश्यकता' विषय पर वाद-विवाद का आयोजन करने लगे. उसमें हिंदी के समर्थन का पक्ष वे स्वयं रखते थे. इन आयोजनों में वे अपने ज़ोरदार तर्कों के बल पर यह सिद्ध करने में सफल रहे कि मणिपुर की जनता के लिए हिंदी सीखना और उसका प्रचार-प्रसार करना आवश्यक भी है, उपयोगी भी. इसी के पश्चात उन्होंने कुंजबिहारी सिंह कैशाम और पं. राधामोहन शर्मा के सहयोग से अपने घर पर 'हिंदी विद्यालय' की स्थापना की. तीनों हिंदी सेवी इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ाते थे. उसी काल में श्री बंकबिहारी शर्मा ने अपने कांग्पोक्पी निवासी मित्र पं. जनार्दन शर्मा के सहयोग से घर पर ही मंदिर के सामने के बैठके में हिंदी पढ़ाना शुरू किया. स्मरणीय है कि उन्ही दिनों इम्फाल नगर में हाथी-चौक के पीछे चेराप कोर्ट के पास एक हिंदी विद्यालय खोला गया था. इसमें पं.राधामोहन शर्मा ने अग्रणी भूमिका निभाई थी. कुछ दिनों बाद श्री कुंजबिहारी सिंह कैशाम ने मोइरांगखोम और तेरा कैथेल में हिंदी स्कूल प्रारम्भ किये. वे देवनागरी लिपि को राष्ट्र-लिपि नाम देने के पक्षधर थे और उन्होंने 'राष्ट्र-लिपि-स्कूल' नामक शिक्षण-संस्था बनाई थी. यह स्कूल इन दिनों मणिपुर सरकार के नियंत्रण में चल रहा है.

हिंदी की व्यवस्थित शिक्षा देने के लिए 1933 में इम्फाल के व्यापारी- समाज के विशेष प्रयास से बीकानेरवासी सेठ भैरोदान मोहता के नाम पर 'भैरोदान हिंदी स्कूल' की स्थापना हुई. इसकी मुहूर्त-पूजा पं. राधामोहन शर्मा ने की और समाज के आग्रह पर वे इस विद्यालय में हिंदी का अध्यापन भी करने लगे. मणिपुर में हिंदी शिक्षण की समस्त सुविधाओं से युक्त यह पहला विद्यालय था, जिसमें अध्यापकों को नियमित-वेतन-भुगतान पर नियुक्त किया गया था. श्री टी. बिशेश्वर शास्त्री के प्रयास से 1951 में इसका सरकारीकरण हुआ.

संस्थागत हिंदी प्रचार-आन्दोलन की दृष्टि से मणिपुर में हिंदी-प्रचार का कार्य 1927-28 में 'हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग' द्वारा प्रारंभ किया गया. मणिपुर के जो हिंदी-कार्यकर्ता व्यक्तिगत रूप से पहले से ही अपने काम में जुटे थे, उन्होंने सम्मलेन के कार्य को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. तत्कालीन अंगेज़ सरकार के अनेक विरोधों के बावजूद सम्मलेन ने मणिपुर में प्रचार-कार्य जारी रखा और परीक्षा- केन्द्र भी चलाया. 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा' के अंतर्गत 'मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति' की स्थापना 1939-40 में हुई. उल्लेखनीय है कि प्रारम्भ में सरकार ने 'राष्ट्रभाषा' शब्द पर आपत्ति करते हुए इस नाम से कार्य करने की मनाही कर दी थी. इस पर, मूल उदेश्यों को महत्व प्रदान करते हुए हिंदी प्रचारकों ने इसका नाम 'मणिपुर हिंदी प्रचार समिति' रखकर कार्य करना प्रारम्भ किया और जैसे ही अनुकूल अवसर मिला, पुनः 'मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति' नाम रख लिया. इस संस्था ने 1959 में इम्फाल जेल में भी एक परिक्षा केंद्र शुरू किया था, जिससे बंदी लोग हिंदी सीखकर परीक्षा में बैठ सकें. स्वाधीनता प्राप्ति के बाद 7 जून,1953 को 'मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल' अस्तित्व में आई. इसकी स्थापना में मणिसना शास्त्री, नीलवीर शास्त्री, पं.राधामोहन शर्मा, हिजम विजय सिंह, भागवतदेव शर्मा आदि की महत्वपूर्ण भूमिका थी. मणिपुर हिंदी परिषद ने हिंदी भाषा का प्रचार तो किया ही, हिंदी और मणिपुरी भाषाओं के साहित्य को निकट लाने और मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता को विकसित करने में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई. मणिपुरी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलत कराने के लिए जो जनांदोलन चला था, उसमें इस संस्था ने ऐतिहासिक योगदान किया था.

मणिपुर हिंदी प्रचार सभा, नागा हिंदी विद्यापीठ, मणिपुर ट्राइबल्स हिंदी सेवा समिति आदि अन्य संस्थाएं हैं, जिन्होंने इस राज्य में हिंदी-आन्दोलन की जड़ें मज़बूत करने का कार्य किया. 'अखिल मणिपुर हिंदी शिक्षक संघ' और 'मणिपुर हिंदी शिक्षक संघ' आदि भी हिंदी का वातावरण तैयार करने का प्रयास करते हैं. केन्द्रीय हिंदी शिक्षण योजना, हिंदी शिक्षण प्रशिक्षण महाविद्यालय, आकाशवाणी की हिंदी -शिक्षण एवं हिंदी कार्यक्रम योजना आदि को सम्मिलित किया जाए, तो इस राज्य में हिंदी की अच्छी तस्वीर उभरती है. मणिपुर विश्व विद्यालय में एक समृद्ध हिंदी-विभाग कार्य कर रहा है. यह 1979 में तत्कालीन ज.ने.वि. विस्तार केंद्र के नियंत्रण में प्रारम्भ हुआ था. इसमें स्नातकोत्तर कक्षाओं के अध्ययन के साथ ही उच्च-स्तरीय शोध-कार्य भी किया-कराया जाता है.

मणिपुर राज्य में हिंदी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन भी होता है. 'युमशकैश' और 'महिप पत्रिका' यहाँ से प्रकाशित होने वाली नियमित - मासिक एवं त्रैमासिक - पत्रिकाएँ हैं. इसके साथ ही 'कुन्दोपरेंग' नामक पत्रिका अनियतकालीन रूप में प्रकाशित होती है. चैयोल पाओ नाम से एक साप्ताहिक का प्रकाशन भी इस राज्य से होता है. स्कूल-कॉलेज से लेकर विश्व विद्यालय की वार्षिक पत्रिकाओं में भी हिंदी संबंधी सामग्री का स्वतंत्र विभाग होता है. ये प्रयास हिंदी-प्रचार के इतिहास में उल्लेखनीय महत्व रखते हैं.



हिंदी विभाग
मणिपुर विश्वविद्यालय

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