शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

सांस्कृतिक संवाद में जुटी भाषाएँ: हिंदी - मणिपुरी



 देवराज


सना लैबाक (स्वर्ण भूमि) के नाम से विख्यात मणिपुर भारत की पूर्वोत्तरी सीमा पर स्थित स्वर्गोपम प्रकृति-सौन्दर्य से भरापूरा राज्य है। बाईस हजार तीन सौ छप्पन वर्ग किमी0 क्षेत्रफल वाले इस प्रदेश का नब्बे प्रतिशत भाग पर्वतीय है। इसकी सीमाएँ म्यामार, नागालैण्ड, मिजोरम और असम से घिरी हैं तथा इसे कर्क रेखा दो भागो में विभाजित करती है। इस भूमि को समय≤ पर मैत्रबाक, कड्.लैबाक, युवापलि, चक्पा लड.बा, कत्ते, मेखलेत, मोगले आदि नामों से पुकारा जाता रहा है, किन्तु वर्तमान में इसके लिए मणिपुर नाम-संज्ञा का प्रयोग ही सबसे अधिक किया जाता है। इस राज्य को नौ जनपदों में बाँटा गया है- इम्फाल पूर्वए इम्फाल पश्चिमए विष्णपुर, थौबाल  सेनापति, उख्रुल, चुड़ाचांदपुर, तमेंड्.लोड्.,चन्देल। मणिपुर की राजधानी इम्फाल भारत के श्रेष्ठ और आधुनिक सुविधा सम्पन्न नगरों में से एक है। मणिपुर में सर्वाधिक जनसंख्या मीतै (या मैते) जाति के लोगों की है। लोकतन्त्र आने से पहले राज्य-सत्ता पर इसी जाति का अधिकार था, अतः सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक समृद्धि की दृष्टि से यही जाति सबसे विकसित भी है। जातीय-दृष्टि से यहां कबुई, ताड्.खुल, माओ, मरिड्.,कुकी, थादौ, पाइते, मार, अनाल, गड्.ते, कौम, पाओमै, हाओकिप, मोयोन आदि उनतीस जनजातियों से जुडे़ लोग निवास करते हैं। इनमें से अधिकांश ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है। इनके अतिरिक्त मणिपुर में मणिपुरी मुस्लिम (जो शताब्दियों पहले मुगल-काल में सैनिक के रुप में आए थे और यहीं के होकर रह गये) तथा बाहर से आए अनेक जातियों के लोग भी निवास करते हैं। इनमें नेपाली, पंजाबी और बिहार, राजस्थान के विभिन्न स्थानों से आकर बस गई कई जातियों के लोगों की बड़ी संख्या है।
      
मणिपुर की मुख्य और सामान्य सम्पर्क-भाषा मणिपुरी कहलाती है। मैते लोल और मीतै लोन भी इसी के नाम हैं। भाषावैज्ञानिकों के अनुसार मणिपुरी, तिब्बत-बर्मी परिवार के कुकी-चिन उप-परिवार की भाषा है। इसका विकास ईसा की प्रथम शताब्दी के लगभग चेड्.लै नामक एक स्थानीय बोली से हुआ। इस सम्बन्ध में एक अन्य मत यह है कि मंगोलिया तथा अन्य स्थानों से जो जन-समूह मणिपुर में आकर बसे थे, वे समय≤ पर आये थे। प्रब्रजन की अवधि शताब्दियों में फैली होने तथा अन्य कारणों से विभिन्न समूह स्वाभाविक रुप से भाषा-वैज्ञानिक भिन्नता लिये हुए थे। मणिपुरी भाषा का विकास इन सभी की बोलियों के मिश्रण से हुआ । कालान्तर में निकटवर्ती बोलियों व भाषाओं के सम्पर्क ने भी उसे प्रभावित किया।
    
 प्राचीन-काल में पामहैबा (महाराजा गरीबनवाज) के शासन-काल के प्रारम्भ सन् 1714 तक मणिपुरी भाषा अपनी प्राचीन लिपि (मीतै मयेक) में लिखी जाती थी, किन्तु पामहैबा के शान्तिदास गोसाई से वैष्णव मत की दीक्षा लेते ही इस लिपि का प्रयोग कम कर दिया गया और बंगला भाषा के लिये प्रयुक्त लिपि का प्रचलन प्रारम्भ हो गया । उस समय धार्मिक-कृत्यों के अवसर पर मणिपुरी भाषा का प्रयोग भी बाधिक हो गया । बाद में मणिपुरी भाषा तो सामान्य रुप से प्रयोग में आने लगी, किन्तु उसकी प्राचीन लिपि का उद्धार नही हो सका । लेखन में बंगला-लिपि का व्यवहार ही चलता रहा । मणिपुरी समाज को इससे बहुत हानि उठानी पड़ी ।
    
 भाषायी-सम्पर्क की दृष्टि से मणिपुरी भाषा प्राचीन काल से ही अनेक भाषाओं से शब्दों का आदान-प्रदान करती रही है। अपने विकास के प्रथम चरण, प्रथम शताब्दी से 1730 तक, में मणिपुरी भाषा ने देशज शब्दों के साथ ही चीनी और बर्मी भाषा से अनेक शब्द ग्रहण किए । लगातार होने वाले युद्वों में मिलने वाली जय-पराजय के क्रम में यह ग्रहणशीलता निरन्तर बनी रही। शान्तिकाल में भी भौगोलिक निकटता के कारण जनता के आवागमन के चलते भाषायी- सम्पर्क बना रहा । विकास के दूसरे चरण (सन् 1731 से 1890 तक) में मणिपुरी का अधिक संपर्क बंगला आदि से हुआ । यद्यपि यह अनुमान करना कठिन नहीं है कि रचना शैलियों की दृष्टि से मणिपुरी भाषा इस अवधि से बहुत पहले ही संस्कृत के सम्पर्क में आई होगी । मणिपुरी की औग्री, खेनचो आदि शैलियाँ प्राचीन संस्कृत की स्तोत्र-शैली से बहुत मिलती है। कथ्य की दृष्टि से भी दोनों भाषाओं में सूर्य, चन्द्र पर्वत, वर्षा और पौराणिक पात्रों से सम्बन्धित वर्णन पर्याप्त साम्य रखते हैं। इसके मूल में संभवतः प्रब्रजन की प्रक्रिया रही होगी, जिसके अन्तर्गत एक समाज के लोग सुदूर समाजों के बीच जाकर बसते और वहाँ की संस्कृति से घुलने-मिलने के क्रम में अपनी मूल संस्कृति का प्रभाव भी छोड़ते रहे है। इसके बावजूद प्राचीन-काल में भाषिक-प्रभाव अथवा शब्द-ग्रहण के प्रमाण अधिक नही मिलते। यह कार्य दूसरे चरण में संभव हुआ । तीसरे चरण (सन् 1891 से प्रारम्भ) में मणिपुरी भाषा का सम्पर्क हिन्दी और अंग्रेजी से विशेष रुप से बढ़ा। इन भाषाओं से उसने व्यापक प्रभाव ग्रहण किया । यह भी देखने में आया कि इस काल में मणिपुरी भाषा ने बंगला से एक नये प्रकार की प्रगाढ़ता स्थापित की । यह काल मणिपुरी भाषा में नवजागरण के उदय का काल था । नवजागरणकालीन लेखकों ने इस प्रगाढ़ता में नए रंग भरे। हवाइबम नवद्वीपचन्द्र ने माइकेल मधुसूदन दत्त के मेघनादवध तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि के चुने हुए अंशों का मणिपुरी अनुवाद प्रस्तुत किया । ख्वाइराक्पम चाओबा ने बंगला लेखकों- विशेषकर कालीप्रसन्न घोष से प्रभावित होकर मणिपुरी भाषा में निबन्धों व अन्य गद्य-साहित्य की रचना की। इसी प्रकार लमाबम (डा0) कमल, अशाड्.बम मीनकेतन सिंह, अराम्बम दरेन्द्रजीत, राजकुमार शीतलजीत आदि नवजागरणकाल से जुडे़ लेखकों ने बंगला से पर्याप्त मात्रा में प्रभाव ग्रहण किया । वस्तुतः बंगला ने साहित्य के माध्यम से मणिपुरी भाषा को प्रभावित करने का अभियान बहुत पहले ही प्रारम्भ कर दिया था । राजकुमार झलजीत सिंह की मान्यता है कि मुखोपाध्याय, चट्टोपाध्याय, बन्द्योपाध्याय आदि बंगाली ब्राहमण पन्द्रहवीं शताब्दी से ही मणिपुर में रह रहे हैं। इसी कारण जब गरीबनवाज के शासन-काल में वैष्णव मान्यताओं का वर्चस्व स्थापित हुआ, तो कृत्तिवास-रामायण तथा गंगादास सेन के महाभारत के (आंशिक) मणिपुरी- अनुवाद में अधिक कठिनाई नहीं हुई । इसी के साथ बंगला-लिपि का प्रयोग भी उस समय और बाद में सिक्कों, पत्रों और शिलालेखों के सन्दर्भ में किया जाने लगा । आधुनिक-शिक्षा के प्रारम्भिक युग में मणिपुरी भाषा में पाठ्य-पुस्तकों का अभाव था । इस समस्या के समाधान के लिये अंग्रेजी और बंगला पुस्तकों का सहारा लिया गया । कहा जाता है कि प्रसिद्ध मणिपुरी लेखक चाओबा अपने अध्यापन काल में बंगला पुस्तकों को पहले स्वयं पढ़ते थे, तब मणिपुरी में प
      
यहाँ एक सांस्कृतिक-सन्दर्भ का उल्लेख करना आवश्यक जान पड़ता है । डॉ. कपिला वात्स्यायन ने अपनी, पारंपरिक भारतीय रंगमंच: अनन्त धाराएँ पुस्तक में लिखा है कि सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में चैतन्य के ही वैष्णव आन्दोलन से दो धाराएँ निकलीं । एक, कीर्तन-गायन की धारा थी और दूसरी धारा थी, नाटय प्रस्तुति की, जो कृष्ण या कृष्ण और राधा के कथ्य पर आधारित होती थी । आगे चल कर मणिपुर ने भी उन दोनों को अपना लिया । इनमें से नाट्य-प्रस्तुति की धारा यात्रा अथवा जात्रा-नाटक (जात्रावली) के रुप मे प्रचलित हुई । प्रारम्भ में इसका रुप पूर्णतः धार्मिक था, किन्तु बाद में बंगाल, ओडिशा आदि के समान ही इसमें सामाजिक विषयों का प्रवेश हुआ । इसके प्रभाव का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि सन् 1925 के पूर्व मणिपुरी भाषा में मौलिक नाटक नहीं लिखे जा सके थे । उस काल में बंगाला से अनूदित नाटकों का मंचन किया जाता था और रंग-आन्दोलन पूरी तरह बंगला थियेटर के प्रभाव में था । सन् 1925 में लाइरेनलाकपम इबुंगोहल  सिंह ने ”नरसिंह“ नाटक लिख कर मणिपुरी भाषा में मौलिक नाटक-लेखन का प्रारम्भ किया। यह नाटक उसी वर्ष 30 अप्रैल को राजमहल में मंचित हुआ । इस क्षेत्र में सोरोखाइबम ललित दूसरे लेखक थे, जिन्होंने  ”सती खोड्. नाड्.“ तथा ”अरेप्पा मरुप“ शीर्षक नाटक लिख कर यह सिद्ध किया कि मणिपुरी भाषा में सरलता पूर्वक नाटक लिखे जा सकते हैं । बंगला थिएटर की जकड़न से मुक्ति की व्याकुलता भी स0 ललित में दिखाई दी । बाद में प्रसिद्ध कवि अड.ाड्.हल ने ”इबेम्मा“ और ”पोक्तबी“ जैसे सामाजिक-यथार्थ उजागर करने वाले नाटक लिख कर तथा चित्रंागदा नाट्य मन्दिर (1936) की स्थापना करके (साथ ही मणिपुर ड्रामेटिक यूनियन नामक थियेटर की स्थापना में सहयोग देकर ) मणिपुरी-रंग-आन्दोलन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
      
यह घटना दर्शाती है कि किस प्रकार भाषा, साहित्य और संस्कृति के बीच उत्पन्न सम्बन्ध संवेदनशील होते हैं। प्रारम्भ में मणिपुरी-समाज ने बंगला से आई सांस्कृतिक वायु के स्वागत में अपने समस्त वातायन और द्वार खोल दिए, किन्तु जब इस वायु ने समाज की शिराओं में प्रवहमान साहित्य, संस्कृति व कला निर्मित रक्त को बहुत अधिक प्रभावित किया, तो उसकी प्रतिक्रिया भी हुई। धार्मिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में भी और साहित्यिक क्षेत्र में भी। यह प्रतिक्रिया इतनी विस्फोटक थी कि मणिपुर में बंगला की तर्ज पर होने वाले अनुष्ठान स्कूलों से गायब हो गए और साहित्य में मणिपुरी पहचान की व्याकुलता छा गई । लेकिन इस घटना से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इस सम्पूर्ण व्याकुलता के बावजूद कभी भी मणिपुर और बंगाल या मणिपुरी-भाषा और बंगला-भाषा एक दूसरे के विरोध में खड़ी नहीं हुईं। आज भी यहाँ वैष्णव-धारा में आस्था रखने वालों की बड़ी संख्या है । रास, संकीर्तन, जात्रावली का आयोजन होता है। बंगला साहित्य का अनुवाद होता है और बंगला की ओर बड़ी आशा भरी दृष्टि से देखा जाता है । और इस व्याकुलता ने मणिपुरी समाज को जो लाभ दिया, वह यह कि वैष्णव पूर्व प्राचीन धार्मिक रुप को खोजने का प्रयास हुआ, ऐतिहासिक व पौराणिक प्रतीकों को साहित्य में स्थान मिला, मणिपुरी भाषा व प्राचीन लिपि के सम्बन्ध में जागृति आई तथा विश्व प्रसिद्ध मणिपुरी- थिऐटर प्रत्पक्ष हुआ। यह भाषायी और सास्कृतिक सम्बन्ध का ऐसा अनोखा उदाहरण है, जिसमें टकराहट और सहयोग या संघर्ष और सह-अस्तित्व एक साथ कार्यरत हैं।  उत्तर आधुनिकतावादी आसानी से देख सकते हैं कि यह सम्बन्ध किस प्रकार विश्व-सभ्यता व संस्कृति के विकास का रहस्य खोल रहा है।
      
मणिपुरी और हिन्दी के सम्पर्क का इतिहास भी आश्चर्यजनक रूप से बहुत पुराना है। ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में भारत पर हुए मुस्लिम आक्रमण के फलस्वरूप राजनैतिक-अशान्ति तथा सांस्कृतिक-संघर्ष का जो वातावरण निर्मित हुआ, उसके कारण उत्तर भारत से बड़ी संख्या में सामान्य जनता ने इधर-उधर पालयन किया । इनमें धर्म की रक्षा के लिये चिन्तित ब्राहमणों और पुरोहितों की संख्या अधिक थी । ये लोग अनेक स्थानों पर गए । उसी क्रम में मणिपुर भी आए । प्रब्रजन का यह सिलसिला बहुत समय तक चलता रहा । आज भी यह पता लगाया जा सकता है कि इनमें से कौन पहले आए थे और कौन बाद में, क्योंकि जो पहले आ गए थे, उन्होंने अपने नाम के पूर्व अरिबम (अरिबा-पुराना या प्राचीन) तथा जो बाद में आए, उन्होंने अनोैबम (अनौेबा-नया) शब्द जोड़ लिया । आगे चल कर ये वंश के नाम-प्रतीक की भाँति प्रयुक्त होने लगे। इन ब्राहमणों ने मणिपुरी भाषा सीखी तथा स्थानीय परिवेश का अंग बन गए । साथ ही उन्होंने अपनी मूल-धार्मिक-आस्थाओं व कर्म-काण्ड का पालन भी अपने घरों पर जारी रखा । स्वाभाविक रुप से घरों के भीतर होने वाले पारस्परिक-संवाद में ये अपनी मातृ-भाषा अथवा बोली का प्रयोग ही करते होगें । कभी-कभी आस-पड़ोस वालों के सामने भी इनके मुख से अपनी भाषा या बोली के शब्द निकलते होगें। इसे एक नए सांस्कृतिक सम्पर्क की शुरुआत कहा जा सकता है। आगे चल कर जब इस प्रदेश में वैष्णवी धार्मिक विचारधारा का प्रवेश हुआ, तो धार्मिक-कृत्य सम्पन्न कराने का कार्य ब्राहमणों को सौंपा गया। इससे मन्दिरों में संस्कृत का प्रवेश हुआ । साधारण जनता के समक्ष संस्कृत के स्तोत्रों और मन्त्रों की व्याख्या मणिपुरी भाषा में की जाने लगी, जिस कारण मणिपुरी जनता संस्कृत तथा उसके साथ हिन्दी के कुछ शब्द सुनने-समझने लगी।
      
धार्मिक-विकास के इतिहास के अनुसार अठारहवीं शताब्दी आते-आते मणिपुर के मन्दिरों में ब्रजबुलि के नाम से पदों का गायन होने लगा था । कहा जाता है कि ये पद मैथिल-कोकिल विद्यापति के थे । इनके ब्रजबुलि नामकरण का प्रश्न तो भाषा वैज्ञानिकों के विचार का विषय है, किन्तु इतना अनुमान अवश्य किया जा सकता है कि इसके मूल में राधा-कृष्ण की लीला-भूमि, ब्रज क्षेत्र और ब्रज-भाषा की भूमिका रही होगी । भले ही मणिपुर में वैष्णव विचारधारा का आगमन चैतन्य महाप्रभु और बंगाल से जुड़ा हो, किन्तु उसकी मूल भूमि ब्रज ही है। राधा-कृष्ण को केन्द्र बना कर विकसित रासलीला का सम्बन्ध भी मुख्यतः ब्रज से ही है। रासलीला के अवसर पर गाए जाने वाले पद संस्कृत और ब्रज-भाषा में ही होते थे। ब्रज भाषा के लिये ब्रज-बोली का प्रयोग भी सामान्य रुप से किया जाता रहा है । धार्मिक प्रभाव के कारण वैष्णवी व्यापारों में प्रयुक्त संस्कृत को छोड़ कर शेष सभी के लिये ब्रजबोली का प्रयोग चल पड़ा होगा, इसीलिये विद्यापति के जो पद बंगाल होते हुए मणिपुर पहुंचे, उन्हें भी ब्रजबोली कहने के उद्देश्य से भाषिक उच्चारणगत कारणों से, ब्रजबुलि पुकारा गया । स्मरणीय है कि राधा-कृष्ण सम्बन्धी कीर्तन पदों को ब्रजबुली, ब्रजाली आदि भी कहा जाता है। इस बात की संभावना है कि इन पदों में विद्यापति के अतिरिक्त भी कुछ अन्य कवियों के पद रहे होगें । कालान्तर में तो मणिपुर के कृष्ण-भक्त कवियों ने भी भक्ति-काव्य की रचना की । इनमें से मणिपुरी-मीरा कही जाने वाली बिंब्रावती मंजुरी द्वारा सधुक्कड़ी में कुछ पदों की रचना करने का उल्लेख प्राप्त होता है । स्वाभाविक है कि इस सबसे मणिपुरी लोगों का परिचय हिन्दी की  बोलियों से कुछ अधिक बढ़ा होगा ।
      
धार्मिक उद्देश्य से नवद्वीप, पुरी, ब्रज आदि की यात्राओं ने भी भाषा-सम्पर्क की प्रक्रिया तीव्र की। विशेषकर जो लोग मथुरा-वृन्दावन की यात्रा करते थे, वे काम चलाऊ हिन्दी सीख कर वापस लौटते थे और यहाँ आकर अन्य लोगों को बताते थे कि यदि वे अपनी यात्रा को सुखद व सहज बनाना चाहते हैं, तो उन्हें सामान्य वार्तालाप की हिन्दी सीख लेनी चाहिए । इससे हिन्दी के प्रति आकर्षण बढ़ता था । आगे चल कर यही कार्य शिक्षा के लिये काशी जैसे स्थानों पर जाने वाले मणिपुरी विद्यार्थी भी करने लगे। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों के साथ आए व्यापारियों व सैनिकों के साथ भी हिन्दी की शब्दावली मणिपुर पहुंची। इसी के बाद गांधी जी की प्रेरणा से विकसित हिन्दी प्रचार आन्दोलन की हवा इस राज्य में बही, जिसने हिन्दी और मणिपुरी भाषा के सम्बन्धों का एक नया अध्याय लिखना प्रारम्भ किया । इस अध्याय में हिन्दी भाषा का विधिवत प्रचार और साहित्यिक स्तर पर विकसित सम्बन्धों का महत्व है।
    
 ”मणिपुर का सनातन धर्म“, मणिपुर राज्य से प्रकाशित प्रथम हिन्दी पुस्तक है। आधुनिक ऋषि कहे जाने वाले पण्डित अतोमबापू शर्मा द्वारा लिखित यह पुस्तक, स्वयं उन्हीें के द्वारा 6 मार्च सन् 1951 को चुराचांद प्रिटिंग वर्क्स, इम्फाल में मुद्रित करा कर प्रकाशित की गई थी । इसमें धर्म और उसके कर्म-काण्ड से जुड़ी परम्पराओं तथा विधि-विधानों का परिचय दिया गया है। लेखक ने सृष्टि सम्बन्धी मिथकीय-चिन्तन तथा इसी प्रकार की अन्य अभिकल्पनाओं की व्याख्या भी की है। इस पुस्तक के पृष्ठ दो पर कहा गया है- इस जगत की सृष्टि के पहले जल ही जल था। इस समय लाउपूड्.थौ नाम नौ देवगणने सुर्गसे मत्ति दी थी। उन्होनें लाईनूरा नामक सात देवताओं जल के ऊपर नर्तन करती हुई रही थी । उन्होंने उस मत्ति का लेकर जल में डाल दी थी। यह एक दण्ड में एक तापु हुआ। जिस तरह आठ दण्ड में आठ तापुओं हुये, पर उन देवताओं ने उन आठ तापूपर विश्रामकर सुरापान किया । इस तरह आठ बार सुरापान करके विश्राम किया था । इससे चौंसठ दण्डों में चौंसठ तापु हो गये । उन चौंसठ तापुओं से मिलकर यह विशाल पृथ्वी हो गयी । इससे यह पार्थव दिन में चौंसठ दण्ड होते है । और एक दण्ड का नाम मणिपुरीय भाषा में पूड्. अर्थात तापु कहते है। और आठ दण्डों का नाम पूथक अर्थात सुरापान का समय कहते है।
      
पृथ्वी सृष्टि के बाद मणिपुर अर्थात पृथ्वी के नाभि स्थल में आकर सदाशिवजी ने देखा कि उदरावर्त की तरह घिरे हुये पर्वतों के बीच समुन्द्र की तरह जल समूह रहते है । तब शिवजी ने उस पर्वत त्रिशूल ने भेद निकाला । पर उस मणिपुर में शिवजी पार्वती के साथ नर्तन किया था, उस समय देवगण ने भी अपनी अपनी देवीगण के साथ शिवजी के नर्तन में आपस किया था। पर उमा-महेशुर ने उनके साथ सर्ब्बरत कदम्बमय रस क्रीडा की थी। उसको मणिपुरीय भाषा में लाइहराउबा कहते है। मणिपुरीय लोग देवो के प्रीति के लिये उस लाइहराउबा अर्थात उमा महेशुर की रासक्रीडा अभियनय करते हैं।
    
 पं0 अतोमबापू शर्मा मूलतः संस्कृत और अंग्रेजी के विद्वान थे। हिन्दी का उनका ज्ञान सामान्य ही था । हाँ, तत्कालीन परिवेश में बंगला से वे काफी परिचित थे। इस कारण उन्होंने जो हिन्दी लिखी है, उस पर बंगला का स्पष्ट प्रभाव हैं । ऊपर उद्घृत अंशो में एकाधिक स्थान पर विराम के पश्चात पर का प्रयोग हुआ है । यह बंगला का प्रयोग है, जिसका अर्थ है- बाद में या अनन्तर। लिपि लेखन में उन्होने राष्ट्र भाषा प्रचार समिति, वर्धा की तत्कालीन लिपि-नीति का अनुसरण किया है। मणिपुर में हिन्दी प्रचार आन्दोलन का प्रारम्भिक वास्तविक व्यापक कार्य इस समिति की वर्तमान प्रान्तीय शाखा (उन दिनों यह केवल शाखा कहलाती थी) ने किया था।,  अतः शर्मा जी द्वारा इस लिपि का प्रयोग स्वाभाविक था ।
      
भाषा सम्बन्धी सन्दर्भ से हट कर दो अन्य बातें हमारा ध्यान आकर्षित करती है । इनमें से एक यह है कि इस पुस्तक से पता चलता है कि सृष्टि की उत्पत्ति आदि के सम्बन्ध में जिस प्रकार विश्व के अन्य समाजों मे पौराणिक-कथाएँं प्रचलित हैं, उसी प्रकार मणिपुरी पौराणिक साहित्य में भी इनका उल्लेख है। इससे यह भी पता चलता है कि दुनिया भर में फैली इन कथाओं की मूल-प्रकृति समान ही है और इनमें प्रतीकात्मक शैली के प्रयोग द्वारा सृष्टि-विकास या फिर पृथ्वी-निर्माण की प्रक्रिया समझाई गई है। दूसरी बात यह है कि पं0 अतोमबापू शर्मा ने इस पुस्तक में मीतै समाज के जितने धार्मिक पौराणिक विधि विधानों को विचार का विषय बनाया है, उन सभी की व्याख्या हिन्दू धर्म (जिसे रुढ़ अर्थ में हिन्दूवादी व्याख्या कहा जाता है) के आधार पर की है।
    
इस प्रकार की प्रतीक व्याख्या तथा महाभारत आदि के विविध प्रमाणों के आधार पर मणिपुरी संस्कृति को विशाल हिन्दू- संस्कृति की धारा का एक अंग सिद्ध किये जाने की परम्परा रही है। जब राष्ट्रीय-एकता जैसी शब्दावली का बहुतायत से प्रयोग होना शुरु हुआ, तो ऐतिहासिक से अधिक इन्हीं पौराणिक आधारों की छाया में भारत और मणिपुर के बीच एकत्व की खोज भी की जाने लगी । एक समय वह भी आया, जब यह प्रयास अतिवाद की सीमाएँ छूने लगा और प्राचीन मीतै-संस्कृति को एक स्वतन्त्र इकाई मानने वालों मंें इसकी उतनी ही घोर प्रतिक्रिया भी हुई। उस समय पं0 अतोमबापू शर्मा वाली प्रतीक व्याख्या को ब्राहमणवाद के आक्रमण के रुप में देखा गया । संस्कृति की नवीन प्रतीकात्मक व्याख्या और उसके विरोध के मूल में कौन से कारण वास्तविक आधारभूमि वाले थे, यह निर्णय करना या इस रहस्य को खोलना यहाँ अभीष्ट नहीं है । यहाँ केवल इस और संकेत करना लक्ष्य है कि मणिपुर में प्रकाशित पहली हिन्दी पुस्तक भाषायी के साथ ही सांस्कृतिक संसार की जानकारी देने वाली थी । इससे हिन्दी के ज्ञान-भंडार में निश्चय ही वृद्धि हुई।
    
 इसके बाद भी मणिपुरी संस्कृति तथा इस क्षेत्र की धार्मिक स्थिति की जानकारी देने वाली पुस्तकों का प्रकाशन जारी रहा । सन् 1972 में मणिपुरी संस्कृति एक झाँकी (एस0 गोपेन्द्र शर्मा) का प्रकाशन हुआ। इसकी भाषा यद्पि बहुत उलझी हुई है, किन्तु इससे सामान्य सांस्कृतिक जानकारी अवश्य मिल जाती है। सन् 1988 में मणिपुरः विविध सन्दर्भ तथा मणिपुरः भाषा और संस्कृति पुस्तकों का प्रकाशन हुआ । इनमें मणिपुरी-भाषा, संस्कृति, जन-जीवन, कला और धर्म के सम्बन्ध में पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत की गई । ये दोनों ही सम्पादित पुस्तकें हैं । मणिपुर संस्कृति के सम्बन्ध में कुछ ऐसे लेखकों की पुस्तकें भी छपीं, जो मूलतः मणिपुरी भाषी नही हैं । इनमें डॉ0 रमाशंकर नागर (मणिपुर की सांस्कृतिक झलक), डॉ0 जगमल सिंह (मणिपुरी संस्कृति,मणिपुर) और डॉ0 जवाहर सिंह (मणिपुर: साहित्य और संस्कृति) के नाम उल्लेखनीय हैं। इन लोगों के अतिरिक्त सिल्चर (असम) में जन्मे और भातखण्डे हिन्दुस्तानी संगीत महाविद्यालय, लखनऊ के मणिपुरी नृत्य-विभाग के प्राध्यापक डॉ0 गुरु वनमाली सिन्हा ने भी मणिपुरी नर्तन कला पुस्तक लिखी है। इन सभी के माध्यम से मणिपुरी जीवन का परिचय हिन्दी व उसके द्वारा अन्य भाषाओं तक पहुँचा, इसलिये इन्हें सांस्कृतिक सम्बन्ध के विकास की समर्थ-कड़ी के रुप में जोड़ कर देखा जा सकता है । इधर सन् 1994 में आचार्य राधागोविन्द थोड.ाम कविराज द्वारा रचित तीन पुस्तकें-हिन्दू धर्म के मूल तत्व भाग- 1 एवं -2 तथा भारतीय संस्कृति की आधारशिला शीर्षक से प्रकाशित र्हुइं । सन् 1995 में शिवगोविन्द दास (यह थोड.ाम जी का ही नाम है) द्वारा रचित सिद्धेश्वर चालीसा भी छपा है। इसके प्रकाशन का मुख्य उद्देश्य उन मणिपुरी भाषा भाषी लोगों को हिन्दू धर्म की जानकारी देना है, जो हिन्दी पढ़ने और समझने लगे हैं।
      
हिन्दी भाषा का यह सौभाग्य है कि उसे अनेक मणिपुरी भाषी लेखकों ने अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। क्षितिज सा ध्येय (कविता- 1976, आचार्य राधागोविन्द थोड.ाम), हदय सुमनः राष्ट्रीय चेतना चिन्तन (कविता- 1996, हजारीमयुम गोकुलानन्द शर्मा), खम्बा- थोइबी (नाटक- 1963 सी-एच. निशान सिंह) वीर टिकेन्द्रजीत (नाटक- 1987 के0 याइमा शर्मा) खम्बा थोइबी (उपन्यास- 1963, एल0 कालाचांद) मणिपुर के नर-नारियों की जीवन गाथाएँ (जीवनी-1985 सम्पा.फुराइलातपम गोकुलानन्द शर्मा) मणिपुर के अमर दीप (जीवनी- 1988 आचार्य राधागोविन्द थोड.ाम) आदि कृतियाँ हिन्दी साहित्य की सम्पत्ति बन चुकी हैं । इनमें से अधिकांश पुस्तकों की विषयवस्तु मणिपुरी इतिहास, संस्कृति, लोक-जीवन और विचार दर्शन का परिचय देने वाली हैं । कविता की पुस्तकें मुक्त कल्पना, राष्ट्रीय भावना, सौन्दर्य-बोध, मानवतावाद आदि की अभिव्यक्ति करती हैं । यदि इस सूची में श्रेष्ठ मणिपुरी लोक कथाएँं (डॉ0 एस0 तोम्बा सिंह), मणिपुरी लोककथाएँ (सी-एच. निशान सिंह एवं डॉ0 जगमल सिंह), मणिपुर की लोककथाएँं (वही) नोंदोननु (सी-एच. निशान सिंह एवं एक अन्य लेखक) आदि ग्रन्थों तथा डॉ0 हीरालाल गुप्त (मणिपुर की लोक कथाएँ) और डॉ0 जगमल सिंह (तलाश, मणिपुर की विभूतियाँ) जैसे हिन्दी भाषियों द्वारा लिखी पुस्तकों को भी सम्मिलित कर लिया जाए, तो पता चलेगा कि मणिपुर का व्यापक परिचय देने वाली सामग्री हिन्दी में पहुँच चुकी है ।
      
मणिपुर में हिन्दी प्रचार और राज-भाषा के रुप में हिन्दी की स्थिति का विस्तृत परिचय देने वाली दो पुस्तकें उल्लेखनीय हैं, मणिपुर में राज भाषा की प्रगति (डॉ0 जगमल ंिसह) और मणिपुर हिन्दी परिषद, इम्फाल द्वारा प्रकाशित संकल्प और साधना । इनमें मणिपुर और हिन्दी के सम्बन्धों का इतिहास, हिन्दी की वर्तमान स्थिति, हिन्दी प्रचारकों का महत्वपूर्ण योगदान, हिन्दी साहित्य, हिन्दी पत्रकारिता आदि पक्षों पर पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है ।
    
 मणिपुरी और हिन्दी के मध्य अनुवाद कार्य का इतिहास धीरे-धीरे पाँच दशक पूरे कर लेगा । सन् 1962 में श्री अ0 छत्रध्वज शर्मा ने मणिपुरी भाषा के महान कवि लमाबम डा0 कमल के काव्य-संग्रह ”लै परेड.“ की नौ कविताओं का गद्यानुवाद किया था, जिसका प्रकाशन कविश्रीमाला शीर्षक योजना के अन्तर्गत पुस्तक रुप में किया गया था । यह प्रकाशन राष्ट्र भाषा प्रचार समिति, वर्धा ने किया था । सन् 1978 में कमल के ही उपन्यास, माधवी का अनुवाद सी- एच. निशान सिंह द्वारा सम्पन्न होकर प्रकाशित हुआ । सन् 1989 में पाचा मीतै के उपन्यास, इम्फाल अमसुड्. मागी इशिड्.नुड्. शितकी फीभम का हिन्दी अनुवाद इम्फाल और उसकी अबोहवा शीर्षक से छपा । यह अनुवाद युमनाम इबोतोम्वी द्वारा किया गया । सन् 1989 में ही इबोहल सिंह काड्.जम द्वारा अनूदित कविताओं की महत्वपूर्ण पुस्तक, आधुनिक मणिपुरी कविताएँ शीर्षक से छपी । वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में 34 मणिपुरी कवियांें की 78 कविताएँ संकलित हैं । सन् 1991 में डॉ0 सापम तोम्बा सिंह के सम्पादन में आधुनिक मणिपुरी कहानियाँ पुस्तक छपी । मणिपुरी हिन्दी अकादमी, इम्फाल की इस पुस्तक में विभिन्न व्यक्तियों द्वारा हिन्दी में अनूदित दस मणिपुरी कहानियाँ हैं । सन् 1994 में अठारह मणिपुरी कहानियोें का अनुवाद, प्रतिनिधि मणिपुरी कहानियाँ नाम से पुस्तकाकार छपा । राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के अनुवादक डॉ0 इबोहल सिंह काड्.जम हैं । सन् 1993 में डा0 कमल के काव्य-संग्रह, लै. परेड्. की सम्पूर्ण कविताओं का अनुवाद, पुष्प माला शीर्षक से प्रकाशित हुआ । यह अनुवाद डॉ0 हजारीमयुम सुवदनी देवी द्वारा किया गया। सन् 1994 में अरिबम कृष्णमोहन शर्मा निष्णात द्वारा बी0 जयन्तकुमार शर्मा के नाटक, थम्बालनु का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हुआ । सन् 1997 में सुप्रसिद्ध कवि डॉ0 नीलकान्त सिंह की काव्य पुस्तक, तीर्थ यात्रा का हिन्दी अनुवाद इसी नाम से बिड़ला फाउण्डेशन के सहयोग से हिन्दी बुक सेैण्टर, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया। इस गं्रथ का अनुवाद डॉ0 इवोहल सिंह काड्.जम ने किया है। इसी वर्ष कमलेश्वर के सम्पादन में भारतीय शिखर कथा कोश का मणिपुरी खण्ड, पुस्तकायन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया । इसमें डॉ0 इबोहल सिंह काड्.जम, अरिबम कृष्णमोहन शर्मा और डॉ0 ई0 दीनमणि सिंह द्वारा मणिपुरी से हिन्दी में अनूदित सत्ताईस कहानियाँ है। सन् 1997 में महाकवि अड.ाड्हल के सामाजिक उपन्यास, जहेरा का हिन्दी अनुवाद इसी नाम से प्रकाशित हुआ । यह अनुवाद श्री सी-एच0 निशान सिंह ने किया । सन् 1998 में खुमनथेम प्रकाश के कहानी-संग्रह, मड्.गी इशै का हिन्दी अनुवाद, सपने का गीत शीर्षक से प्रकाशित हुआ । यह अनुवाद-कार्य हाओवम आनन्दी देवी ने किया और इसका प्रकाशन अरिबम कृष्णमोहन शर्मा की स्मृति में हुआ । मणिपुरी से हिन्दी में कहानियों के अनुवाद के क्षेत्र में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य डॉ0 ई0 विजयलक्ष्मी ने किया । उनके अब तक दो अनूदित कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके है, एक: पर्वत के पार (सन् 2005) और दूसरा: धरती (सन् 2008) । उनका अनुवाद हिन्दी भाषा के मुहावरे के निकट होता है, इसीलिए उसे पढ़कर मौलिक रचना पढ़ने जैसा अनुभव होता है।
      
काव्यानुवाद के क्षेत्र में हिन्दीभाषी श्री सिद्धनाथ प्रसाद का उल्लेख अति आवश्यक है । उन्होनें मणिपुरी भाषा के आठ नवजागरणकालीन कवियों की चुनी हुई कविताओं का अनुवाद किया, जिन्हंे सन् 1995 में सुजाता प्रकाशन मेरठ द्वारा ”नवजागरणकालीन मणिपुरी कविताएँं“ शीर्षक से छापा गया । सन् 1998 मैं उनके द्वारा अनूदित दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं, ”माँ की आराधना“ (जननेता हिजम इरावत की काव्य-पुस्तक इमागी पूजा का अनुवाद) और जित देखूँ (युवा कवि लनचेनबा मीतै की काव्य पुस्तक येड्.लु येड्.ल बदा का अनुवाद) इनमें से माँ की आराधना कर प्रकाशन भी सिद्धनाथ प्रसाद जी ने अपने धन से ही कराया । साहित्य और राष्ट्र-सेवा के प्रति समर्पण के ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं ।
      
हिन्दी से मणिपुरी भाषा में भी पर्याप्त अनुवाद कार्य किया गया है। प्रेमचन्द, बच्चन, प्रसाद, भगवतीचरण वर्मा, मोहन राकेश, भीष्म साहनी, धर्मवीर भारती, नागार्जुन, बालशौरि रेड्डी, शिवानी, राजेन्द्र सिंह बेदी, जयप्रकाश भारती, जवाहर सिंह, वेद प्रताप वैदिक आदि की रचनाएँ मणिपुरी मंे उपलब्ध हैं । प्रेमचन्द की रचनाएँ तो उच्च स्तरीय मणिपुरी पाठ्यक्रम में भी स्थान पा चुकी हैं । जयशंकर प्रसाद की कामायनी का अनुवाद-कार्य पूर्ण हो चुका है । मणिपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा रामचरितमानस के अतिरिक्त नागार्जुन के कहानी संग्रह (आसमान में चन्दा तैरे) और वालशौरि रेड्डी के उपन्यास (जिन्दगी की राहें) का अनुवाद कराया गया है।
      
अनुवाद के क्षेत्र में दो पुस्तकें , मीतै चनु और फागुन की धूल भी प्रकाशित हुई हैं । इनकी विशेषता यह है कि ये एक साथ मौलिक और अनूदित सामग्री प्रदान करती हैं । इम्फाल की एक साहित्यिक संस्था, पूर्वा द्वारा सन् 1987 में प्रकाशित मीतै चनु में बारह मणिपुरीभाषी कवि संकलित हैं, जिन्होंने मूलतः हिन्दी में कविताएँ रची हैं और डॉ0 इबोहल सिंह काड्.जम द्वारा उन्हें रचनाकारों की मातृ-भाषा में अनूदित किया गया है । इसी प्रकार सन् 1990 में काड्.जम एण्टरप्राईजेज, इम्फाल द्वारा प्रकाशित फागुन की धूल में मणिपुरी खण्ड और हिन्दी-खण्ड को मिला कर कुल पच्चीस कवि संकलित हैं और मूल रचनाओं का प्रकाशन अनुवाद के साथ किया गया है।
      
भाषाओं के पारस्परिक सम्पर्क और साहित्यिक-माध्यम से जिस सांस्कृतिक समन्वय तथा वैचारिक-विकास की कल्पना की जाती है, वह अनुवाद कार्य से सुलभ होता है। मणिपुरी साहित्य के हिन्दी अनुवाद की जो जानकारी दी गई है, उसका अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि अनुवाद के रूप में केवल कुछ पुस्तकें हिन्दी में नही पहुँची हैं, बल्कि उनके माध्यम से एक पूरा समाज और उसका जीवन हिन्दी में पहुँचा हैं। हिन्दी भाषी समाज की भाँति मणिपुरी समाज भी दासता का शिकार रहा है । भले ही कम वर्षो तक, किन्तु इस समाज ने भी अग्रेंजी-साम्राज्यवाद के लम्बे नाखूनों की पीड़ादायक चुभन अनुभव की है। इससे पहले राजतन्त्र की कठोरता का अनुभव भी इस समाज को हुआ है। सामाजिक-धार्मिक दृष्टि से इस समाज ने बड़ी उथल-पुथल का सामना किया है। जिस समाज में जाति की अवधारणा नही थीं और जहाँ श्रम के प्रति ऊँच-नीचं का भाव नहीं था, वही समाज ब्राहमणवादी-व्यवस्था आने पर अनेक सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों का शिकार बन कर कष्ट सहने को भी बाध्य हुआ । स्वतन्त्र भारत में राजनैतिक मूल्यों के पतन, आर्थिक असमानता, शोषण, पिछड़ेपन, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अवसरवाद आदि को भी इस समाज ने भोगा है। अपनी युवा-पीढ़ी को बन्दूकें लेकर जंगलों की ओर जाते तथा प्रति-आतंकवाद का शिकार होते हुए भी यही समाज देखने का अभिशप्त है। इसी के साथ आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता के प्रभाव भी इस समाज के जीवन पर पड़ रहे हैं । इस पूरे अन्तर्बाह्य जीवन तथा परिवेश का चित्रण मणिपुरी साहित्य में विद्यमान है और उस साहित्य का एक बड़ा प्रतिनिधि भाग अनुवाद के माध्यम से हिन्दी में पहुँच चुका है । अब यदि कोई मणिपुर को जानना व उसके यथार्थ का अनुभव करना चाहता है, तो वह इस साहित्य का उपयोग कर सकता है । अरिबम कृष्णमोहन शर्मा द्वारा अनूदित नाटक, थम्वालनु के माध्यम से तत्कालीन राजतन्त्रात्मक-व्यवस्था के वास्तविक रुप और इसकी नायिका थम्बालनु में निरीह जनता की दशा के दर्शन किये जा सकते हैं। कमल और उनके समकालीन कवियों की कविताओं में नवजागरण की राजनैतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक-चेतना को पहचाना जा सकता है।  आधुनिक कविता में वर्तमान युग की समस्याओं, विचारणाओं और अन्तर्विरोधों को देखा जा सकता है और कहानियाँ पढ़ कर दिन-रात तनाव में जीते समाज के हृदय की धड़कनें अनुभव की जा सकती हैं। ठीक यही बात अनूदित होकर मणिपुरी भाषा में आ चुके हिन्दी साहित्य के विषय में भी है। किसी भाषा में प्रेमचन्द या प्रसाद की रचनाओं का अनुवाद हो जाना उस भाषा में सम्पूर्ण हिन्दी-समाज तथा वृहत्तर रूप में भारतीय-संस्कृति व समाज का उपस्थित हो जाना है। यदि इनके साथ कुछ अन्य युगीन साहित्यकार और आ जाएँ, तो वह उपस्थिति और सघन हो जाती है और इसका सांस्कृति अर्थ अधिक विस्तृत हो जाता है। यह जान कर विस्मयपूर्ण आश्चर्य हो सकता है कि मणिपुरी साहित्यकार मुक्तिबोध और अज्ञेय से खासे परिचित हैं । आधुनिक मणिपुरी कविता आन्दोलन के प्रारम्भकर्ताओं में से एक, एलाड्.बम नीलकान्त सिंह तो अज्ञेय को अपना काव्य-चेतना गुरू तक स्वीकार करने में नहीं हिचकते थे । दूसरी और कामायनी समझने के लिए वे मुक्तिबोध को पढ़ना आवश्यक मानते थे । यह अकेला उदाहरण ही मणिपुरी और हिन्दी के सांस्कृतिक-सम्बन्धों की अनेक पर्तें खोलने वाला है।
      
यह सम्बन्ध साहित्य-रचना की परिपाटियों और भाषा की दृष्टि से भी ध्यान देने योग्य है। मणिपुरी भाषा के लेखक, युम्लेम्बम इबोमचा ने सन् 1969 में पहली लघु-कथा लिखी थी, किन्तु वह नहीं जानते थे कि उनकी रचना कहानी हैं, या लघु-कथा । नौवंे दशक में लघु-कथा आन्दोलन की आँच हिन्दी से मणिपुरी में पहुँची, तो लोगांे का ध्यान इबोमचा की रचना की ओर गया । थोडे़ समय बाद ही कई कथाकारों के लघु-कथा-संकलन प्रकाशित हो गए। प्रो. इबांेहल सिंह काड्.जम ने लघुकथा के लिए ”वारिपिक्त्रु“ शब्द का चयन किया और इसी नाम से अपना लघु-कथा संग्रह भी प्रकाशित किया । यह उदाहरण भाषाओं के साहित्यिक रिश्तों की पड़ताल करता है और भाषायी-संस्कृति को खोजने में लगे लोगों का मार्ग-दर्शन करता है। एक अन्य उदाहरण इससे भी विस्मयजनक है। तेलुगु-हिन्दी विद्वान प्रो0 भीमसैन निर्मल ने प्रख्यात तेलुगु कवि सी0 नारायण रेड्डी की कृति, विश्वंभरा का हिन्दी अनुवाद किया है। हिन्दी के माध्यम से वह कृति मणिपुर तक पहुँची । एक युवा मणिपुरी हिन्दी लेखक डॉ0 लनचेनबा मीतै ने विश्वंभरा का अध्ययन किया और मणिपुरी भाषा में पंचपदी-शैली की अनेक कविताएँ रच डालीं । ये पंचपदियाँ येड्.लु येड्.लुबदा शीर्षक से पुस्तकाकार छपीं । बाद में श्री सिद्धनाथ प्रसाद द्वारा इनका हिन्दी अनुवाद किया गया । भाषाओं के सम्पर्क और प्रभाव का यह उदाहरण रोमांचित कर देने वाला हैं।
    
इस सम्पर्क से मणिपुरी और हिन्दी भाषा को जो प्रतीक, मुहावरे, कहावतें, विशिष्ट ध्वन्यात्मक शब्द, आलोचना सम्बन्धी पारिभाषिक शब्द, सांस्कृतिक शब्द, ललित और उपयोगी कलाओं से जुडे़ शब्द मिले है, वे संख्या में कम भले ही हो, किन्तु महत्व की दृृष्टि से कम नहीं हैं। इसी प्रकार पौराणिक सन्दर्भो के प्रयोग के क्रम में जो सामग्री दोनों भाषाओं में आ-जा रही है, वह अभिव्यक्ति के अभिनव माध्यम भी उपलब्ध करा रही है। भविष्य में इसके सुखद परिणाम सामने आएँगे । मणिपुरी से हिन्दी में अनुवाद करने वाले साहित्यकार इस दिशा में बड़ी सावधानी भरा कदम उठा रहे है। वे ऐसे शब्दों और मुहावरों को ज्यों का त्यों अनूदित सामग्री में खपाते हैं, जिनके समानार्थक शब्द हिन्दी में नहीं है और जो आसानी से हिन्दी में खपाए जा सकते हैं।  इनमें केवल पौराणिक शब्दावली ही नही आती, बल्कि अन्य अनेक क्षेत्रों से जुड़े शब्द भी आते हैं । उदाहरण के लिये शरीर के अंग, उपांग और प्रत्यंग सम्बन्धी जितने शब्द मणिपुरी में हैं, उतने हिन्दी में नही हैं, कालावधि की दृष्टि से हिन्दी और मणिपुरी महीनों के नाम पूर्ण साम्य नहीं रखते, दोनों भाषाओं में वर्णित राज-परम्पराओं में कुछ भिन्नतााएँं हैं आदि । अनुवाद करते समय इनसे सम्बन्धित शब्दों को मूल रुप में प्रयोग करके पाद-टिप्पणी मे उनका अर्थ दे दिया जाता है। इस विधि का उपयोग हिन्दी से मणिपुरी में अनुवाद करते समय भी किया जाता है। परिणास्वरुप दोनों भाषाएँ साहित्य-सम्पदा पाती हैं और दोनों समाज एक दूसरे की सांस्कृतिक-विशिष्टता से परिचित होते हैं। इस परिचय से प्रेरित होकर तुलनात्मक भाषा वैज्ञानिक शोध को भी प्रोत्साहन मिलता है। मणिपुरी और हिन्दी की व्याकरणिक कोटियों का तुलनात्मक अध्ययन (डा0 एस0 तोम्बा सिंह), हिन्दी और मणिपुरी परसंर्गो का तुलनात्मक अध्ययन (अ. कृष्णमोहन शर्मा), हिन्दी-मणिपुरी क्रिया संरचना(डॉ. इवोहल सिंह काड्.जम) आदि ग्रन्थ इसी परिचयोत्पन्न प्रेरणा के परिणाम हैं। इनमें दो भिन्न भाषा-परिवारों की सदस्य-भाषाओं के समान और व्यतिरेकी सम्बन्धों को जाँचा-परखा गया हैं, जिससे भाषायी-समझ और वैचारिक विकास में सहायता मिली है। भारत की वर्तमान भाषा-तमस्या को हल करने के सन्दर्भ में ऐसे अध्ययनों की उपादेयता असंदिग्ध है।
    
 भाषा और साहित्य, पारस्परिक-संवाद और समझ पर आधारित सांस्कृतिक -दृष्टि के विकास में जुटे हैं, हम चाहें तो  इनसे प्रेरणा लेकर अपनी भूमिका का निर्धारण कर सकते हैं।.....


-हिन्दी विभाग
मणिपुर विश्वविद्यालय
कांचीपुर, इम्फाल- 795 003 (मणिपुर)

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा । सुदर प्रयास है। जारी रखिये ।

    अगर आप हिंदी साहित्य की दुर्लभ पुस्तकें जैसे उपन्यास, कहानियां, नाटक मुफ्त डाउनलोड करना चाहते है तो कृपया किताबघर से डाउनलोड करें । इसका पता है:

    http://Kitabghar.tk

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  2. आपका इतने महत्वपूर्ण विषय पर इतने विस्तार से लिखना बहुत अच्छा लगा। लेख विविध प्रकार की नवीन जानकारी से भरपूर है।

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  3. विनोद रिंगानियासोमवार, 8 मार्च 2010 को 9:58:00 pm IST

    आदरणीय देवराज जी,

    आपने बहुत ही विस्तार से अच्छे विषय को उठाया है। आपसे संपर्क ही कट सा गया है। कृपया अपना संपर्क नंबर दें। मेरा नंबर है 98640-72186. मेल करें, bringania@gmail.com
    विनोद रिंगानिया

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  4. आदरनीय बाबुजी, २४.०६२०१० चरणस्पर्श,




    आशा करता हूं, आप स्वस्थ एवं सानंद होंगे। आजकल मैं वर्धा में हूं। नेहरु स्टडी सेंटर, म.गां.अ.हि.वि.में रिसर्च एसोसियेट हूं। आपके मदद की जरुरत है।मेरा मो.नं-०9881018020,e-mail id- jerrykeith2010@gmail.com है।

    आपका-शिवप्रिय

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  5. BAHOT ACHHA LIKHA HAI AAP NE SIR



    SHAILESH DUBEY
    E- mail shailesh_dubey23@rediffmail.com

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  6. उत्‍तर पूर्व में बैंक के माध्‍यम से रहने का सुअवसर प्राप्‍त हुआ है। आपके इस विस्‍तृत एवं ज्ञान से परिपूर्ण लेख मेरे जैसे नौसिखिये के लिये कितना महत्‍वपूर्ण है मैं बता नहीं सकता। आपको सादर नमन

    अजय द्विवेदी

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  7. मैं गुवाहाटी में पंजाब नैशनल बैंक में प्रबंधक राजभाषा के रूप में कार्यरत हूं। आपसे अनुरोध है कि आपके संपर्क नं0 यदि मिल पायें तो मेरा सौभाग्‍य होगा। मेरे संपर्क नं0 9707541411 है।

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