शनिवार, 8 मई 2010

घर

                                  
घर से लौटा हूँ
लेकिन लौटा कहाँ हूँ
घर तो मैं कभी गया  ही नहीं
खोजता ज़रूर रहा घर
अपने भीतर अपने बाहर
मगर वह कभी मिला नहीं मुझे
अकेले क्षणों में पिघलते चौराहों पर
आवाजों के ऊंचे पहाड़ पर चढ़ कर
बुलाया भी मैंने घर को
कि आओ यार
एक बार तो आ जाओ मेरे पास
मगर वह सुनता तब ना!
ऐसा  पत्थर-दिल क्यों हो जता है घर ?
दूर क्यों चला जता है घर किसी-किसी से?

3 टिप्‍पणियां:

  1. लगता है घर की बहुत याद आ रही है। तभी तो घर घर होता है। कहीं भी चले जाओ मगर अपने घर जैसा सुख कहीं नहीं। फिर याद क्यों न आये? शुभकामनायें

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