सोमवार, 18 जनवरी 2010

ज्योति बसु के लिए - २


    ज्योति बसु के लिए - २


 एक पेड़ का बयान
फूल से होते हुए
फल के पेट में पहुंचा
पकता रहा वहीँ
मुद्दत तक
एक दो- पहर
पेड़ का बयान
टपक कर
धूल में जा गिरा
आँखों में एक समझदार चमक लिए
बड़ी - बड़ी सफ़ेद और पीली
कीलों  की नोकों पर
टिके ऊंचे दरवाज़े
थरथराने लगे
कबूतरों पर झपटने को
तैयार बिल्लियाँ
सोचने लगीं
हमलों के नए तरीकों के बारे में
वक़्त का एक छोटा सा टुकड़ा मिल गया
पेड़ के बयान को
कबूतरों की बंद आँखों को
आवाज़ देकर
उसने सिर्फ इतना कहा
              ' यह डरने का समय नहीं है
                सोचने का समय है.'


कबूतरों की आँखों में
हरकत उभर आई है
यह बिल्लियों के लिए
अपशकुन से कम नहीं.





रविवार, 17 जनवरी 2010

ज्योति बसु के लिए-१


                                                      

ज्योति बसु के लिए



    एक पहाड़ के भीतर 
      अचानक हुए भारी विस्फोट ने
रौंद डाले 
दिशांत तक फैले
जंगल, मैदान 
नदियाँ. झरने, 
देर तक हिलते रहे
चिड़ियों के घोंसले
कांपती रहीं
चास्लाना के भीतर
अब तक दिशा भटकी 
अधमरी आवाजें
क्या तुम महसूस कर सके थे
इतना सब
अपने जाने के वक़्त !
मेरे समय की 
भूख से उत्पन्न
एक बेसहारा रिरियाहट
लगातार घूर रही है
तुम्हारी पीछे छूट गयी चप्पलें
जिनमें तुम
हमेशा पहचान लिए जाते थे
अपनी पूरी सच्चाई के साथ
नंगे बच्चों से घिरी कुछ आकृतियाँ
अपने जूते छिपा रही हैं
कालीनों के नीचे
तुम्हारी चप्पलों पर 
हक अजमाने के लिए
भला क्यूँ भूल गए तुम
अपनी चप्पलें
यहाँ से चलते  समय? 
कल से तुम्हारे सपनो का
नक्शा तय करेंगे
कुहरे से ढकी बस्ती के
दिशाहारा भेड़िये

खड़ी  करेंगे
तुम्हारी इन्ही चप्पलों को
अपनी गवाही में.

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

प्रकाश की तरंगें छोड़तीं पदचिह्न



''प्रकाश की तरंगें
छोड़तीं पदचिह्न


समय के खेत तक
पहुँचा सकते हैं वे हमें


लेकिन
चलना तो हमें ही होगा
किसान की तरह
सधे कदमों से
अपने खेत की मिट्टी की
पुकार सुनते ही


क्या तैयार हैं हम ?''