मंगलवार, 16 मार्च 2010

लाइहराओबा : मणिपुरी संस्कृति :धार्मिक-अनुष्‍ठान



देवराज




"सनालैबाक" (स्वर्ण-भूमिके नाम से विश्‍व भर में विख्यात मणिपुर भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित राज्य है । बाईस हज़ार तीन सौ छप्पन वर्ग कि०मी० क्षेत्रफ़ल वाला यह राज्य संस्कृति समाज और प्रकृति-वैभव की दृष्‍टि से अपने प्राचीन नाम के अनुरूप स्वर्ण-भूमि ही है । मणिपुर में सर्वाधिक जनसंख्या मीतै (मैतैजाति के लोगों की है ।लाइहराओबा’ इसी जाति का धार्मिक-अनुष्‍ठान है। यह मीतै जाति के गहन जीवन-दर्शनउत्सवप्रियता और कलात्मक-रुचि को एक साथ प्रस्तुत करता है ।



लाइहराओबा से जुडी़ अनेक पौराणिक-कथाएँ मीतै-समाज में प्रचलित हैं । इन्हीं में से एक कथा के अनुसार नौ देवताओं (लाइपुङ्‍थौने मिलकर पृथ्वी को स्वर्ग से उतारा था । उस समय सात देवियाँ (लाइनुरा तरेतजल पर नृत्य कर रही थीं । उन्होंने विशेष नृत्य-भंगिमाओं के साथ पृथ्वी को संभाला और जल पर स्थापित कर दिया । अपने मूल रूप में पृथ्वी बहुत ऊबड़-खाबड़ थी । इसे रहने योग्य बनाने का दायित्व माइबियों (विशेष पुजारिनेंको सौंपा गया । उन्होंने इसे नृत्य-गति-नियंत्रित चरणों से समतल किया । इस प्रकार पृथ्वी का निर्माण हो जाने के बाद अतिया गुरु शिदबा’ और लैमरेन’ ने निश्‍चय किया कि वे किसी सुन्दर घाटी में नृत्य करेंगे । खोज करने पर उन्हें पर्वत-मालाओं से घिरी एक घाटी मिलीजो जल से परिपूर्ण थी । अतिया गुरु शिदबा ने घाटी को परकोटे की तरह घेरे पर्वत-माला में अपने त्रिशूल से तीन छेद कियेजिससे जल बह गया और पृथ्वी निकल आई । गुरु शिदबा और देवी लैमरेन ने अन्य सात देवियों के साथ इस पृथ्वी पर नृत्य किया । माना जाता है कि देवताओं की प्रसन्नता का यह प्रथम नृत्य था । उसी की स्मृति में लाइहराओबा नामक धार्मिक-अनुष्‍ठान संपन्न किया जाता है ।




लाइहराओबा संबन्धी दूसरी कथा के अनुसार सृष्‍टि के प्रारंभ में देवताओं ने सभा करके विचार किया कि देव


-व्यस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिये एक राजा (सलाइलेनकी आवश्‍यकता है । विचार-विमर्श के पश्‍चात नोङ्‍पोक मालङ्‍’ नामक देवता को सलाइलेन बनाने पर सहमति हुई । इसके बाद आनंदोत्सव मनाया गया । उसी की स्मृति में लाइहराओबा की परंपरा शुरु हुई ।





लाइहराओबा से जुडी़ एक और कथा भी प्रचलित है । इसका संबन्ध नोङ्‍पोक निङ्‍थौ’ नामक देवता और पान्थोइबी’ नामक देवी की प्रणय-कथा से है । ऐसा विश्‍वास किया जाता है कि इन दोनों ने तय किया कि पारस्परिक प्रेम का भोग करने के लिये वे दोनों संसारी प्राणी के रूप में जन्म लेकर एक-दूसरे को प्राप्त करेंगे और मानवी-लीला करते हुए प्रेमानंद का अनुभव करेंगे । इसके बाद नोङ्‍पोक निङ्‍थाऔ ने एक जनजातीय बालक और पन्थोइबी ने राज-कन्या के रूप में जन्म लिया । युवावस्था आने पर दोनों के मध्य प्रेम का बीज अंकुरित हो गयाकिन्तु पान्थोइबी का विवाह खाबा वंश के एक युवक के साथ कर दिया गया । ससुराल आने के बाद पान्थोइबी अपने प्रेमी से मिलने के लिये व्याकुल रहने लगी । वह कुछ ऐसे काम करने लगी कि जिनसे नाराज़ होकर उसकी सास उसे घर से निकाल दे और वह सरलता से अपने प्रेमी के पास चली जाए । कभी-कभी वह बाघ की सवारी करती थी । अंन्ततएक दिन वह जनजातीय युवक के रूप में मानव-लीला करते नोङ्‍पोक निङ्‍थौ के पास पहुँच गई । उधर खाबा अपनी पत्‍नी की खोज में निकल पडा़ । चलते-चलते वह उसी स्थान पर पहुँच गयाजहाँ नोङ्‍पोक निङ्‍थौ और पान्थोइबी थे । तब उसने जान लिया कि वे दोनों साधारण मानव न होकर देवता हैं । यह पता चलते ही खाबा और उसके परिवार वालों ने नोङ्‍पोक निङ्‍थौ की पूजा-अर्चना की तथा आनंदोत्सव मनाया । तभी से लाइहराओबा प्रारंभ हुआ ।



लाइहराओबा का संपूर्ण अनुष्‍ठान अनेक चरणों में संपन्न होता है । सबसे पहले लाइ फि सेत‌‍पा’ होता हैजिसके अंतर्गत लाइहराओबा उत्सव के पूर्व देव-स्थान की अच्छी तरह सफ़ाई होती है तथा देवताओं को नव-परिधान अर्पित किया जाता है । इसके पश्‍चात लाइ इकौबा’, अर्थात प्राण-प्रतिष्‍ठा का चरण संपन्न होता है । इसके अंतर्गत माइबा-माइबी (ओझा और वैद्‍य के मिश्रित चरित्र वाले स्त्री-पुरुषनर्तक-दलों और भक्‍तों के साथ देवता के प्राण लेकर आते हैं । ये प्राण एक घडे़ में जल या पृथ्वी से लाए जाते हैं । यह घडा़ विशिष्‍ट वेशभूषा वाली स्त्री सिर पर ढोकर लाती है । प्राणों की रक्षा के लिये परंपरानुमोदित वस्त्र धारण किए भक्‍त-जन उस स्त्री के आगे-पीछे चलते हैं । इसके पश्‍चात होइलाओबा (विशिष्‍ट गायनऔर लाइबौचोङ्‍बा (विशिष्‍ट नृत्यका अवसर आता है । एक ओर सृष्‍ट-उत्पत्ति की कथा विस्तार के साथ गाई जाती हैजबकि दूसरे के अंतर्गत नृत्याभिनय द्‍वारा देवताओं के निवास हेतु झोंपडी़ निर्मित करने का भाव दर्शाने वाला नृत्य किया जाता है । झोंपडी़ में से नोङ्‍पोक निङ्‍थौ बाहर निकलते हैं । उनके हाथ में शगोल काङ्‍जै’ का डण्‍डा (मणिपुरी पोलो में प्रयुक्‍तहोता है । उनकी पान्थोइबी से भेंट होती है और दोनों श्रृंगारिक नृत्य करते हैं । इसके साथ गायन चलता रहता है ।



लाइहराओबा अनुष्‍ठान के अवसर पर गए जाने वाले गीतों को मुख्य रूप से चार वर्गों में रखा जाता है


--- औग्रीखेनचोअनोइरोल और लाइरेम्मा पाओसा । मणिपुरी वर्ष के चार महीनों (लाङ्‍बनमेराहियाङ्‍गैपोइनुको छोड़ कर शेष आठ महीनों (शजिबुकालेनइङाइङेन,थवानवाकचिङ्‍फैरेनलमदामें यह अनुष्‍ठान कभी भी संपन्न किया जा सकता है । इसके मनाने की अवधि तीनपाँचसात या ग्यारह दिन होती है । लाइरोइ, (अर्थात‍ समापनके दिन माइबा-माइबी शोय खाङ्‍बा’ नामक पूजा करके भक्‍त-जनों की अकालरोग आदि से रक्षा की प्रार्थना करते हैं । अन्त में पेना’ नामक लोक-वाद्‍य पर नोङ्‍गरोलनामक गीत गाया जाता है ।



लाइहराओबा मीतै जाति ही नहींसंपूर्ण मणिपुर की प्राचीन संस्कृति के भव्य रूप का प्रतिनिधि अनुष्‍ठान है । विश्‍व-सभ्यता के विकास में ऐसे अनुष्‍ठानों की महती भूमिका है|




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