गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

मानव मन का साक्षी: मणिपुरी बाल साहित्य


मानव मन का साक्षी: मणिपुरी बाल साहित्य

देवराज

उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री के आधार पर वाङ्खैमयुम तोमचौ सिंह ने मणिपुरी भाषा में बाल-साहित्य लेखन की शुरुआत की थी। सन् 1959 में प्रकाशित इबेन्पोक्की वारि उनकी पहली बाल-साहित्य विषयक पुस्तक थी। सन् 1960 में उनकी दूसरी पुस्तक ग्रह यात्रा प्रकाशित हुई। इनमें से पहली पुस्तक में मणिपुरी समाज में प्रचलित लोक कथाओं का बालकों को ध्यान में रखकर पुनर्लेखन किया गया है, अर्थात ये री-टोल्ड कथाएँ हैं, जो जिज्ञासा, आकस्मिक घटना परिवर्तन, मानव और मानवेतर शक्ति के विभिन्न आश्चर्यजनक प्रभावों, पुश-पक्षियों की विस्मयकारी भूमिकाओं तथा मनोरंजन आदि तत्वों से भरपूर हैं। इबेन्पोक्की वारि का अर्थ है, दादी की कहानियाँ। लेखक ने दादी की ओर से कहानी होने का लाभ उठा कर यत्र-तत्र प्रत्यक्ष-परोक्ष उपदेश एवं शिक्षाओं का भी विधान किया है और हल्के-फुल्के रूप में गाँवों, जंगलों तथा नगर-जीवन की जानकारी देकर बालकों का ज्ञान बढ़ाने का प्रयास भी किया है।
वाङ्खैमयुम तोमचौ की दूसरी पुस्तक काल्पनिक विज्ञान कथाओं के माध्यम से बच्चों की कल्पना शक्ति का विकास करने के उद्देश्य से लिखी गई है। उन दिनों यद्यपि किसी ग्रह पर मनुष्य के कदम नहीं पड़े थे, किन्तु इस दिशा में सोवियत रूस और अमेरिका जैसे देशों के वैज्ञानिक महत्वाकांक्षी योजनाओं पर कार्य कर रहे थे। इससे प्रकृति और ब्रह्माण्ड के रहस्यों पर विजय पाने की मनुष्य की दबी हुई आकांक्षा आदिम गुफाओं और आधुनिक प्रयोगशालाओं से बाहर मौखिक और लिखित भाषा में कुलांचें भर रही थी। ग्रह यात्रा शीर्षक पुस्तक में उसी का एक रूप दिखाई देता है, जो बालकों के मनोरंजन के साथ उन्हें विज्ञान संबन्धी रुचि से भी जोड़ता है।
सन् 1961 में लालबाबू सिंह द्वारा लिखित अङाङ् सभा, (बालकों की सभा), खुंन्जा सभा (गाँव की सभा) और मतमगी मङाल (युग-प्रकाश) शीर्षक तीन बाल-पुस्तकंे प्रकाश में आईं। इन सभी में बच्चों के लिए मनोरंजक और शिक्षाप्रद कहानियाँ संकलित हैं। कुछ कहानियों में सरल शैली में मणिपुरी जन-जीवन, संस्कृति और इतिहास की जानकारी भी दी गई है। इस विषयवस्तु की दृष्टि से लाइमयुम कृष्णचन्द्र शर्मा की पुस्तक अङाड्गी लमजिड् वारि (बाल दिग्दर्शक कथाएँ) और हिजम याइमा की रचना, थौ नाफबा खरगी वारि (कुछ वीरों की कथाएँ) भी उल्लेख योग्य हैं। उसी काल में छपी ये कृतियाँ बालकों के लिए बड़ी उपयोगी जानकारी से युक्त हैं। इनके मूल में बाल-मानस को प्रारम्भ से ही अपने समाज और संस्कृति संबन्धी मूल्यों से जोड़ने का भाव भी झलकता है।
बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक के प्रारंभ में ही मणिपुरी बाल-साहित्य को प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक चेतना से संपन्न बनाने का प्रयास भी देखने को मिलता है। यह सर्वज्ञात है कि भारतीय मनीषा का सार-तत्व रामायण और महाभारत की रचना के रूप में प्रस्तुत हुआ था। इनमें इतिहास, पुराण, धर्म, संस्कृति, दर्शन, राजनीति, लोक, समाज, व्यक्ति, न्याय और सबसे बढ़कर जीवन-संघर्ष की चुनौतियों को स्वीकारने के दृढ़ संकल्पों से जुड़े मूल्य विद्यमान हैं। इन विशेषताओं के कारण ये महाग्रंथ आज तक भी विविध रूपों में सभी के प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। बालकों को जीवन के आदर्शों के साथ ही उनको यथार्थ से जोड़ने के लिए भी इनका उपयोग दीर्घ काल से किया जा रहा है। मणिपुरी भाषा में सर्वप्रथम अयेकपम श्यामसुंदर सिंह ने अङाङ्गी रामायन (बाल रामायण) और अङाङ्गी महाभारत (बाल महाभारत) के रूप में राम-कथा तथा महाभारत-कथा का बालकों के बौद्धिक विकास हेतु सरल भाषा-शैली में पुनर्लेखन किया। कुछ वर्षों बाद मणिपुर में हिंदी प्रचार आंदोलन के प्रारम्भिक कार्यकर्ताओं में से एक, तेमेल आबीर सिंह ने भी अङाङ्गी महाभारत नाम पुस्तक की रचना की। राजकुमार सनातोंबा सिंह ने महाभारत कथा को बच्चों के लिए प्रस्तुत करते समय चित्रों का प्रयोग भी किया। उनके द्वारा री-टोल्ड शैली में रचित अङाङ्गी महाभारत पुस्तक में विभिन्न प्रसंगों के चित्र भी दिए गए हैं। इसका उद्देश्य बालकों की रुचि के साथ ही उनकी कल्पना व कलात्मक रुचि का विस्तार करना भी है। निश्चित रूप से बाल-साहित्य के क्षेत्र में यह प्रयास नवीन और अधिक वैज्ञानिक कहा जा सकता है।
सन् 1965 में सगोलसेम इंद्रकुमार ने बालकों के लिए अरबगी अहिङ् (अरब की रातें) पुस्तक प्रस्तुत की। इसकी कहानियाँ अरेबियन नाइट्स की विभिन्न कथाओं के आधार पर लिखी गई हैं, अतः इनमें जिज्ञासा के साथ ही रहस्य-रोमांच भी विद्यमान है। सन् 1966 में इंद्रकुमार की एक और रचना पिनाकियो का प्रकाशन हुआ। पिनाकियो एक रोमांचकारी पात्र है, जिसे केंद्र में रखकर लेखक ने अनेक बालोपयोगी कथाओं का ताना-बाना तैयार किया है। यह प्रकाशन कथा-क्रम (स्टोरी-सिरीज) शैली में हुआ। सगोलसेम इंद्रकुमार आकाशवाणी में कार्यक्रम अधिकारी थे और बाद में उप निदेशक बने। स्वाभाविक रूप से वे भाषा के बालोपयोगी श्रवण और संप्रेषण पक्ष से अच्छी तरह परिचित थे। उनकी ये कहानियाँ आकाशवाणी के बाल कार्यक्रम में सुनाई जाती थीं। बच्चे इनसे आनंद प्राप्त करते थे।
सन् 1966 में ही तंफासना देवी (राजकुमारी तंफासना) की पंचतंत्र शीर्षक बाल पुस्तक प्रकाशित हुई। इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें विष्णु शर्मा के पंचतंत्र की पशु-पक्षियों के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने वाली कथाओं से प्रभावित कहानियाँ हैं। लेखिका ने यथास्थान और यथावश्यक रूप में घटनाओं को नया रूप दिया है तथा उनके आकार को छोटो-बड़ा किया है।
सन् 1968 में फान्जौबम गुलाप बाबू ने बाल-साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा। उनके आने से मणिपुरी बाल-साहित्य के विस्तार की भूमिका तैयार हुई। उन्होंने बालकों के लिए नोङ हौ लैहौ शीर्षक पुस्तक लिखी। इसमें सृष्टि के प्रारम्भ की कथा कही गई है। इसमें बताया गया है कि खोयुम लाइनिङ् थौ प्रथम के माध्यम से पांच तत्वों (मयाइ मङा), अतिया (आकाश), लैपाक (भूमि), मैइ (अग्नि), नुङ्शित (वायु), इशिङ् (जल) का निर्माण हुआ। इसके पश्चात् पा (सोरारेन सिदबा) और पी (लैमरैन) का अवतरण हुआ। पुस्तक में इससे आगे सृष्टि के अस्तित्व में आने की कथा है। लेखक ने इस कथा की प्रस्तुति लीला नाट्य की भाँति की है।
सन् 1968 में ही मणिपुरी बाल-साहित्य लेखन के क्षेत्र में लौबुकतोङ्बम रघुमणि शर्मा के रूप में एक ऐसे प्रतिभाशाली लेखक ने कदम रखा, जिसने विषय-वैविध्य और परिमाण, दोनों ही दृष्टियों से आज तक के इतिहास में सबसे अधिक बाल-साहित्य की रचना की। उन्होंने 1968 में बाल-साहित्य विषयक प्रथम पुस्तक का लेखन-प्रकाशन किया था। तब से अब तक प्रकाशित उनकी पुस्तकों की सूची अग्रांकित है --- भागवतकी वारि (भागवत कथा, 1968), लैबाक्की गाड़ी (मिट्टी की गाड़ी 1973), पंचतंत्रगी वारि (पंचतंत्र की कहानियाँ, 1973), तुलसी, 1974, उपनिषद की वारि (उपनिषद की कहानियाँ, 1974), अङाङ्गी पंचतंत्र (बाल पंचतंत्र, 1982), पंचतंत्रगी वारि खरा (पंचतंत्र की कुछ कहानियाँ, 1983), काङ्नबा वारि खराः प्रथम भाग (कुछ उपयोगी कहानियाँ 1987), लमजिड्, बा, 1887 (पथ प्रदर्शक), कांनबा वारि खराः दूसरा भाग, 1988 मरूप कायनबा (मित्र-वियोग 1988), केसकी फल, (मामले का फैसला, 1987), माचिल-मौपबा (भाई-बहिन, 1988), दधिचिगी त्याग (दधीचि का त्याग, 1990), अखन्नबा वारि (चुनी हुई कहानियाँ, 1992), हिंङ्चाबगी खाबोङ् (दानव की झोली, 1993), को इशाङ्बा (लम्बी दाढ़ी वाला, 1994), लाइबक (भाग्य, 1995), मणि माला-1995, तम्फा-1995, वारि मखल मथेल (तरह-तरह की चुनी हुई कहानयाँ, 1995), लिड्.जेल माङ्नबा- (साहस और एकता, 1993), फजबी- 1995, फुङा वारि खरा (कुछ लोक कथाएँ, 1996) लमनखुम्बा, (बदला, 1998)।
रघुमणि शर्मा द्वारा लिखित इन चौबीस पुस्तकों में पौराणिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक स्रोतों के साथ ही पंचतंत्र जैसी विश्व प्रसिद्ध आख्यायिका को भी आधार सामग्री के रूप में प्रयुक्त किया गया है। ये ऐसे स्रोत हैं, जिन्हें प्रत्येक भारतीय भाषा के बाल-साहित्य लेखकों ने उन्मुक्त भाव से अपनाया है, जिससे इस महादेश के सभी क्षेत्रों के बच्चे समन्वित सांस्कृतिक जानकारी से संपन्न हुए हैं। जैसे अन्य क्षेत्रों में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रसंगों को कहने की शैली विभिन्न लेखकों की अपनी रही है, वही शैली रघुमणि शर्मा की भी है। इस विपुल बाल-साहित्य की दूसरी विशेषता है, लोक-स्रोत का उपयोग। मणिपुरी भाषा में एक शब्द है, ‘‘फुङा वारि’’, जिसका सामान्य अर्थ होगा-अलाव के पास बैठ कर सुनाई जाने वाली कथा। मान्यता है कि पुराने जमाने में आज जैसे मनोरंजन के साधन न होने के कारण यह आशंका बनी रहती थी कि रात का भोजन तैयार होने के पूर्व ही बच्चे सो जाएँगे, फिर उन्हें नींद से जगा कर खिलाना कठिन होगा। इसलिए दादी-नानी उन्हें जगाए रखने के लिए मनोरंजक कहानियाँ सुनाती रहती थीं।
उस काल में यहाँ सर्दी ही अधिक पड़ती थी, अतः कहानी सुनाने का यह कार्य अलाव तापते हुए होता था। इसी से इनका नाम पड़ा फुङ् (अलाव), वारि (कहानी)। इनमें कुछ कहानियाँ पुरानी परंपरा से प्रचलित होती थीं, कुछ कहानियांे में बड़ी बूढ़ियाँ, अपनी ओर से कुछ मिला देतीं और कुछ कहानयाँ पूरी तरह उनकी अपनी कल्पना से बुनी हुई होती थीं। आजकल ये सभी लोक-कथाएँ कहलाती हैं और इनके चलते फुङ्ा वारि का अर्थ लोक-कथा माना जाने लगा है। रघुमणि शर्मा ने इसी फुङ्ा वारि शैली में अनेक बाल-पुस्तकें तैयार की हैं। उन्होंने न केवल भारत, बल्कि अन्य देशों की फुङ्ावारियों का भी पुनर्कथन (पुनर्लेखन) करके अपने वारि मखल मथेल इसी प्रकार की रचना है। ररघुमणि शर्मा ने तीसरे प्रकार की रचनाएँ पूर्णतः अपनी कल्पना के आधार पर प्रस्तुत की हैं। इनमें लेखक की प्रतिभा, बाल मनोविज्ञान की गहन जानकारी, व्यापक विषय-ज्ञान, और कथक्कड़ी का प्रभावकारी समन्वय दिखाई देता हैं। उन्होंने दो बाल-नाटक भी लिखे हैं, जिनमें से एक पंचतंत्र की कथा पर आधारित है। मरूप कायनबा नामक इस नाटक में पिंगलक, कर्तक, संजीवक, दमनक आदि पशु-पात्र हैं। दूसरा नाटक, लिङजेल मान्नबा, पूरी तरह लेखक की मौलिक कल्पना पर आधारित है तथा बालकों को एकता का रहस्य और महत्व समझाता है। अपने स्तर पर दोनों नाटक शिक्षाप्रद हैं।
रघुमणि शर्मा द्वारा रचित बाल-साहित्य में कोइशाङबा विशेष चर्चित है। इसकी कथा स्वर्ण भूमि नामक एक सुखी-संपन्न्न और चोरी जैसी बुराईयों से रहित राज्य की है। बालउपन्यास जैसी यह रचना पढ़ने में रोचक और आकर्षक है। इसमें उल्लिखित स्वर्ण भूमि मणिपुर का एक प्राचीन नाम ‘सना लैबाक’ ही है।
रघुमणि शर्मा के विषय में इस तथ्य का उद्घाटन करना भी आवश्यक है कि उन्होंने एकाधिक नामों से बाल-साहित्य की रचना की है। रघुमणि, रघुमणि शर्मा, आर0एम0शर्मा, रामनाथ देव, तुङ्गनाथ देव, तुङ्गनाथ शर्मा आदि के नाम से उनकी बाल-साहित्य की पुस्तकें उपलब्ध हैं। इस नाम-वैभिन्य के मूल में एक गंभीर और बड़ा कारण है, जीविकोपार्जन की विवशता। स्वतंत्र लेखन को अपनाने वाले रघुमणि शर्मा अपनी अद्भुत प्रतिभा के बल पर विपुल मात्रा में श्रेष्ठ कोटि का बाल-साहित्य रचने के बाद भी एक ही नाम से न तो बार-बार सरकारी पुस्तक क्रय योजना का लाभ उठा सकते थे और न पुरस्कार योजनाओं में शामिल होकर सफल हो सकते थे। इसका उपाय यही था कि वे अलग-अलग नामों से लेखन करें ताकि आजीविका की समस्या भी हल होती रहे और साहित्य-सृजन में निरंतरता भी बनी रहे। यह एक अप्रीतिकर प्रसंग है, जिससे रघुमणि शर्मा के पाठकों को पीड़ा भी पहुँच सकती है, किंतु इतिहास लिखते समय सत्य और तथ्य के प्रकाशन की विवशता के साथ ही इस वास्तविकता का उल्लेख मणिपुरी भाषा के एक बाल-साहित्य लेखक की जीवन-संघर्ष-गाथा को पाठकों के सामने लाने की दृष्टि से भी अनिवार्य है। इस रूप में उनका जीवन-संघर्ष अपने आप में एक ऐसी सक्षम कहानी है, जो साहित्य प्रेमियों को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। इससे हम कम पाठक संख्या वाले, अल्प परिचित तथा प्रोत्साहन की ठोस योजनाओं से दूर रहती आई अनेक भारतीय भाषाओं के लेखकों की व्यावहारिक समस्याओं का सीधा साक्षात्कार कर सकते हैं।
मणिपुरी बाल-साहित्य में एक अभिनव मोड़ 1969 में देखने को मिला। इस वर्ष तत्कालीन मणिपुरी रंगमंच के प्रख्यात पुरुष एच. अङौबा सिंह की पुस्तक फुङा वारि का प्रकाशन हुआ। पहले उल्लेख किया जा चुका है कि इंद्रकुमार सिंह की रचना, पिनाकियो की कहानियाँ आकाशवाणी पर प्रसारित की जाती थीं। लेकिन फुङा वारि में उस लेखक की कहानियाँ हैं, जो उन्हें स्वयं आकाशवाणी के कार्यक्रम में बालकों को सुनाया करता था। एच.अड्.ौबा सिंह आकाशवाणी के इंफाल केन्द्र पर प्रत्येक रविवार को बाल-सभा में कहानी सुनाते थे। वे स्वयं उच्च कोटि के नाट्य-निर्देशक, नाटक-लेखक और अभिनेता थे, अतः उन्होंने लोक-स्रोत से उपलब्ध कथाओं को बालकोपयोगी बनाने के लिए सर्व प्रथम उनमें नाट्य-तत्व का समावेश कराया और बाल-सभा की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए हास्य प्रधान मनोरंजन पर विशेष बल दिया। आकाशवाणी की बाल-सभा को जीवंत बनाने के लिए ऐसा करना स्वाभाविक भी था।
सन् 1971 में लाइश्रम थानिल द्वारा रचित दो बाल पुस्तकें प्रकाशित हुई- पानबा लाइरिक (सफलता की पुस्तक) और अङाङ्गी पाओताक वारि (बाल उपदेश कथाएँ)। इन दोनों पुस्तकों के नाम से ही स्पष्ट है कि लेखक के मन में कहानी से अधिक बच्चों को उपदेश देने और अच्छा नागरिक बनाने की चाह है। स्वाभाविक रूप से यहाँ कहानी पीछे है और उपदेश आगे।
सन् 1980 में पी. कोकङाङ् की पुस्तक लिङ्जल मान्नबा (मतैक्य) का प्रकाशन हुआ। इसके साथ ही उनकी दूसरी बाल-पुस्तक, अङाङ्गी लमचत (बच्चों की सीढ़ी) भी छपी। कोकङाङ् मणिपुरी भाषा के आधुनिकबोध संपन्न कवि रहे हैं, अतः उनकी बाल-कथाओं में लोक और व्यवहार के साथ ही कल्पना की भी अच्छी-खासी भूमिका देखने को मिलती है। वे बालकों को नए युग की संभावनाओं के सामने भी खड़ा करना चाहते रहे होंगे।
सन् 1981 में मणिपुरी और हिंदी, दोनों भाषाओं पर असाधारण अधिकार रखने वाले विद्वान लेखक इबोहल सिंह काङ्जम की बाल-कथा पुस्तक- नयाम्बगी खुदोन (बड़े भाई का उपहार) प्रकाश में आई। इसकी सभी कहानियाँ बालकों को उनके बड़े भाई द्वारा सुनाई जाती हैं। लेखक ने अपने स्वभाव के अनुसार स्थान-स्थान पर सामाजिक जीवन-मूल्यों को बालकों के संस्कारों में
सन् 1988 में वाई0एम0सिंह ने बालकों के लिए वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में रुचि ली और उनकी अतियादा पाइबा (आकाश की उड़ान) शीर्षक पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें बड़ी सरल भाषा में बालकों को हवाईजहाज की निर्माण-कथा सुनाई-समझाई गई है। लेखक की विशेषता है कि उसने वायुयान निर्माण के विभिन्न चरणों की जानकारी देते हुए यान, उड़ान, विमानपत्तन, आकाश आदि की विज्ञान सम्मत तथ्यात्मक जानकारी भी रोचक शैली में प्रदान की है।
सन् 1989 में एक युवा लेखिका देवला देवी ने बच्चों के लिए वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में कदम रखा और वे पूरी तरह उसी को समर्पित हो र्गइं। उनके द्वारा लिखित बाल-विज्ञान साहित्य इस प्रकार है- खङ्बदा कान्नबा- (उपयोगी जानकारी, 1989), अङाङ्गी विज्ञान (बाल-विज्ञान, 1991), खङ्जिनबदा कान्नबा खरा (कुछ जानने योग्य बातें, 1993), मतमगी विज्ञान (आधुनिक विज्ञान, 1993), अकोयबी शक्तम्बू शेइहन्दबा अमसुङ् मसिगी फल (पर्यावरण प्रदूषण और उसके प्रभाव, 1995), ऐखोयगी जगत (हमारा जगत, 1998)। इसके अतिरिक्त उनकी एक बाल-विज्ञान साहित्य की अप्रकाशित पुस्तक इनर्जी अमसुड्. ओयबगी फीभम (ऊर्जा और पर्यावरण) भी है।
देवला देवी ने अब तक बालकों के लिए सबसे अधिक वैज्ञानिक साहित्य का निर्माण किया है। इसके माध्यम से उन्होंने ब्रह्माण्ड की संरचना, सौर-जंगल, सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी का वैज्ञानिक संबंध, सूर्य एवं चंद्र ग्रहण, दिन और रात होने का वैज्ञानिक कारण, पशु-पक्षियों एवं अन्य जीवों का व्यवहार, रहन-सहन, स्वभाव, वनस्पतियों की जानकारी, तत्व, अणु, परमाणु, क्रिया-प्रतिक्रिया का सिद्धांत, वायु, गैस, वाष्पीकरण, निर्वात, भोजन, भूख और शरीर का संबन्ध, प्रोटीन, विटामिन्स और अन्य पुष्टिकारक तत्वों की भूमिका, जल का महत्व, पर्यावरण-प्रदूषण के कारण एवं पर्यावरण-चेतना जैसे महत्वपूर्ण विषयों की उपयोगी जानकारी को बालकों के लिए सुलभ बनाया है। लेखिका ने वैज्ञानिक ज्ञान की सुलभता बढ़ाने के लिए चित्रों का भी भरपूर उपयोग किया है।
सन् 1992 में मणिपुरी भाषा के कहानीकार राजकुमार मणि की पुस्तक, वारिली खीङुल्ली. (कहानी सुनो अनुसरण करो) के प्रथम भाग का प्रकाशन हुआ। इसमें छोटी-छोटी एक सौ एक कहानियाँ हैं। इसी पुस्तक के दूसरे भाग का प्रकाशन 1997 में हुआ। इसमें एक सौ बारह कहानियाँ हैं। राजकुमार मणि की इन पुस्तकों में दी गई कहानियों का आकार लघु है तथा चित्र-दृश्यों पर अधिक बल दिया गया है। कथाकार ने अपने सृजन-कौशल का प्रयोग करते हुए इन्हें कौतूहल-तत्व से परिपूर्ण भी बनाया है। इन पुस्तकों के प्रकाशन में प्रस्तुतीकरण तकनीक और सौंदर्य पर अधिक बल दिए जाने के कारण बालकों के लिए इनका आकर्षण बढ़ गया है।
मणिपुरी बाल-साहित्य के इतिहास में सन् 1999 का वर्ष सबसे महत्वपूर्ण रहा। इस वर्ष मणिपुरी भाषा के पहले बाल-काव्य का प्रकाशन हुआ। सनाकैथेलगी लाइफदिबी बाइ तोनू देवी (समृद्ध बाजार की गुड़िया: द्वारा तोनू देवी) शीर्षक से इस बाल-काव्य की रचना आधुनिक मणिपुरी कविता आंदोलन के प्रारम्भकर्ताओं में से एक, लाइश्रम समरेन्द्र ने की। तोनू देवी गुड़िया बनाने में कुशल मणिपुरी स्त्री है। वह चार खण्डों वाली एक ऐसी कहानी सुनाती है, जिसकी वह स्वयं साक्षी है। कहानी के चारों खंड भी उपखंडों में विभक्त हैं।
इस बाल-काव्य की सबसे बड़ी विशेषता है, कथा में वर्णित कथक्कड़ पात्र का पूरे घटना क्रम में शामिल रहना। दूसरी विशेषता, बच्चों और गुड़िया का विविध खेलों में भाग लेना है। इसकी तीसरी विशेषता इतिहास, परम्परा और रीति-रिवाजों की अनजाने में ही जानकारी देना है और चौथी विशेषता है, बालकोचित अति साधारण भाषा का प्रयोग। इस काव्य-पुस्तक में मणिपुरी गुड़िया तथा अन्य वर्णित घटनओं के चित्र भी दिए गए हैं। ये सारे चित्र कवि समरेन्द्र द्वारा ही बनाए गए हैं। मणिपुरी शैली की गुड़िया का वास्तविक चित्र इसी कविता के साथ देखने को मिलता है।
मणिपुरी बाल-साहित्य अपनी विकास-यात्रा को आगे बढ़ाते हुए नए-नए मार्ग तलाश रहा है। सन् 2002 में मणिपुरी बाल-साहित्य में एक ऐसी पुस्तक शामिल हुई, जिसमें तेरह भाषाओं की बालकथाओं का अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। कंुजो निङोम्बम द्वारा तैयार की गई इस पुस्तक, ख्वाइदगी फजबा वारीमचा तराहुमदोई में असमीया (अनंत देव शर्मा), बंगला (सत्यजीत राय), अंगरेजी (रस्किन बॉण्ड), गुजराती (पन्नालाल पटेल), हिन्दी (भीष्म साहनी), कन्नड (त्रिवेणी), मलयालम (कारूरनीकान्त पिल्लै), मराठी (वी0आर0भागवत), ओड़िया (शान्तनुकुमार आचार्य), पंजाबी (गुरूबख्श सिंह), तमिल (सुन्दर रामस्वामी),तेलुगु (रा0सोमराजन) और उर्दू (सिराज अनवर) की बाल कहानियों का मणिपुरी अनुवाद उपलब्ध है। हम समझ सकते हैं कि मणिपुरी भाषा के इस बाल-साहित्य लेखक ने अपनी मातृ भाषा को समृद्ध बनाने के लिए अत्यधिक परिश्रम किया है। इस प्रकार के और भी प्रयास होने चाहिए।
सन् 2004 में ङाथेम निङोल काङ्बम, ओङ्ग इबेयाइमा की लोक कथा पुस्तक, उमाइबी अमसुङ्, अतै फुङ्गावारि सिङ् का प्रकाशन हुआ इसमें लेखिका ने बालकों के मनोरंजन के लिए कथाओं का ताना-बाना तैयार किया है। इसकी एक बालकथा, वारी ङाङ्बा निङ्थौ एक ऐसे राजा की कहानी है जिसे कहानियाँ सुनने का बहुत शौक था। वह समझता था कि उसे कोई भी कहानी सुना कर उसका मन नहीं भर सकता। उसने अपने राज्य में एक शर्त प्रचारित कर दी कि जो भी व्यक्ति उसे कहानियाँ सुनाकर संतुष्ट कर देता, तो वह उस व्यक्ति के साथ अपनी पुत्री का विवाह करेगा। विवाह के लालच में एक से एक ज्ञानी-पण्डित कहानी सुनाने आता है और राजा प्रतिदिन कहानी सुनने के बाद कह देता है कि उसकी सुनाई कहानी से वह संतुष्ट नहीं है। इस पश्चात् कहानी सुनाने वाले निराश होकर चला जाता और राजा आनन्द मनाते हुए किसी दूसरे कहानी सुनाने वाले की राह देखने लगता। अन्त में एक निर्धन युवक कहानी सुनाने आता है। वह राजा से कहता है कि उसके पास एक ऐसी कहानी है, जिससे राजा का मन अवश्य ही भर जाएगा। राजा उसे वचन देता है कि यदि उसके द्वारा सुनाई गई कहानी से वह संतुष्ट हो जाता है, तो अपनी पुत्री उस युवक को सौंप देगा। युवक कहानी सुनाना शुरू करता है- ‘एक राजा था उसके पास एक कुठला था। कुठला धान से भरा हुआ था। चींटियों को इसका पता चल गया। वे एक दिन आईं और कुठले में से एक-एक धान लेकर चली गईं। इतना कह कर युवक चुप हो गया। राजा ने कहा, इसके बाद क्या हुआ? युवक बोला कि कल फिर चींटियाँ आएँगी, तब कहानी आगे बढ़ेगी। अगले दिन कहानी में चींटियाँ आईं और एक-एक दाना लेकर चली गई। राजा ने कहा कहानी आगे बढ़ाओ। युवक बोला, जब चींटियाँ सारे दाने ले जाएँगी, तभी तो पता चलेगा कि आगे क्या हुआ? राजा युवक की चालाकी समझ गया। उसने हार मान लेने में ही भलाई समझी। युवक राजकुमारी लेकर चला गया।
सन् 2006 में कोईजम शांतिबाला ने मणिपुरी बाल-साहित्य को, तल तरेत (सात रोटियाँ) शीर्षक पुस्तक के माध्यम से विकास का एक नया आयाम प्रदान किया। तल तरेत बाल नाटकों की पुस्तक है। इसमें संग्रहीत बाल नाटकों के शीर्षक हैं, तल तरेत, पातालगी निङ्थौ, चन्द्रकङ्नान, इरेमतोइबी लैमा, ड्रामा तम्बा, तेनबा अनी और चिट्ठी। इनमें से शीर्षक बाल नाटक कतन नामक आलसी और अकर्मण्य युवक की कथा प्रस्तुत करता है। वह अपनी विधवा माँ के साथ रहता है। माँ उसे काम करके कुछ कमाने के लिए कहती है, किन्तु उसके कानों पर जूँ नहीं रेंगती। हार कर एक दिन उसकी माँ सात दिन तक खाने के लिए सात रोटियाँ बनाती है और कतन को देकर प्रदेश भेज देती है। कतन चलते-चलते एक जंगल से गुजरता है। वहाँ एक सरोवर है, जिसमें सात परियाँ जल क्रीड़ा कर रही हैं। उनके खेलने से पानी गन्दा हो गया है। कतन को सरोवर के किनारे पहुँचा देख कर परियाँ उसे सरोवर का मालिक समझती हैं और डर कर छिप जाती हैं। कतन कहता है कि सरोवर में लहरे क्यों उठ़ रही हैं? परियाँ और भी डर जाती हैं। कतन को भूख लगी है। वह एक पेड़ के नीचे बैठ कर रोटियाँ खोलता है और कहता है, कौन सी पहले खाऊँ? पहली बड़ी है, तीसरी मोटी है, सातवीं छोटी है...... अच्छा सबको खा जाता हूँ। परियाँ उसी पेड़ के पीछे छिपी थीं। कतन की बात सुनकर उनके प्राण निकलने लगते हैं। वे उसके सामने आ जाती हैं और क्षमा याचना करती हैं। फिर वे उसे पानी गन्दा करने के बदले एक बकरी देती हैं। कतन बकरी लेकर खुशी-खुशी घर लौटने लगता है। इसी बीच रात हो जाती है। उसे एक निर्धन परिवार में रात काटनी पड़ती है। रात में जब कतन सो जाता है, तो निर्धन पति-पत्नी उसकी बकरी बदल देते हैं। कतन को इस बात का पता नहीं चलता। वह बदली हुई बकरी के साथ घर आ जाता है, किन्तु वह दूध नहीं देती। उसे परियों पर गुस्सा आता है। वह फिर उनके पास जाता है। इसके बाद परियाँ उसे रस्सी और कछुआ देती हैं। यह बाल नाटक मंच पर बहुत अधिक मनोरंजन करता है।
सन् 2007 में पृथ्वीगी फुङ्गावारी खरा शीर्षक पुस्तक का पुनः प्रकाशन हुआ। इसे इसकी लेखिका क्षेत्रियमयुम सुवदनी ने 1994 और 1997 में भी प्रकाशित कराया था। यहाँ इसके उल्लेख का उद्देश्य यह है कि जैसे-जैसे मणिपुरी भाषा का बाल-साहित्य आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ही अपने देश के साथ ही अन्य देशों की बाल-कथाओं को भी उसका अभिन्न अंग बनाया जा रहा है। इस पुस्तक में कोरिया, म्यांमार, फिलिपिंस, मलेशिया, इण्डोनेशिया, तिब्बत, श्रीलंका, पाकिस्तान, चीन, इटली, अफगानिस्तान आदि देशों की कहानियाँ हैं। जब यह पुस्तक पहले पहल प्रकाशित हुई थी, तो इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया था, किन्तु जब इसका प्रकाशन सन् 2007 में हुआ, तो इसने पाठकों पर अत्यधिक प्रभाव छोड़ा। क्षेत्रिमयुम सुवदनी इसके पूर्व सन् 2001 में प्रजातन्त्र चत्पा लैबाक अमगीवारी और 2002 में अवाङ् लोङ्पोक्की फुङ्गावारी शीर्ष पुस्तकों से भी मणिपुरी बाल-साहित्य को पर्याप्त समृद्धि प्रदान कर चुकी हैं।
मणिपुरी बाल-साहित्य के क्षेत्र में गोपाल शर्मा, डॉ0 जामिनी देवी, टी-एच0नोदिया, सनामतुम सिंह, इबोतोम्बी वाइखोम, वीणापाणि देवी, इबोसना खुमन, पृथ्वी मीतै, मधुमंगल आदि भी समय≤ पर पुस्तकाकार और मुक्त रूप में बाल-साहित्य की रचना करते रहे हैं।
मणिपुरी भाषा में बालकों के लिए दो कॉमिक्स भी प्रकाशित हुए हैं। इनमें से एक, हीराचंद्र ऐतिहासिक घटनाओं पर और दूसरा कबुई कैओइबा लोक साहित्य स्रोत पर आधारित है।
मणिपुरी बाल-साहित्य के इस इतिहासपरक सर्वेक्षण के साथ ही कुछ ऐसे तथ्यों पर प्रकाश डालना भी आवश्यक है, जो इस साहित्य और उसके रचनाकार, दोनों के समक्ष उपस्थित समस्याओं का संकेत करते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, साहित्य के इतिहास लेखकों द्वारा बाल-साहित्य की उपेक्षा। यह एक कष्टप्रद सच्चाई है कि मणिपुरी लेखकों ने साहित्येतिहास लेखन पर सबसे कम ध्यान दिया है। पद्मश्री कालाचांद शास्त्री और पद्मश्री खेलचंद्र सिंह ने ही मणिपुरी भाषा में साहित्य का इतिहास लिखा है, लेकिन इनमें से किसी की भी पुस्तक में इतिहास-दृष्टि का समावेश देखने को नहीं मिलता। इनमें बाल-साहित्य की जानकारी का भी सर्वथा अभाव है। राजकुमार झलजीत सिंह ने अंग्रेजी भाषा में मणिपुरी साहित्य का इतिहास लिखा है, किंतु वह प्राचीन और मध्यकाल तक की रचनाओं का ही परिचय देता है। अंग्रेजी में एक इतिहास सी0एच0मणिहार सिंह ने भी तैयार किया है। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित इस ग्रंथ में आधुनिक काल को भी चर्चा का विषय बनाया गया है, किंतु वहाँ भी बाल-साहित्य के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गई है। स्पष्ट है कि मणिपुरी भाषा के साहित्येतिहास लेखकों ने बाल-साहित्य के प्रारंभ, विकास, दशा, स्तर आदि के बारे में न कोई सर्वेक्षण किया है न कोई चिंतन। बाल-साहित्य को सृजनात्मक साहित्य की एक गहन-गंभीर शाखा के रूप में न लिए जाने के कारण बाल-साहित्य के रचनाकार नितांत उपेक्षित बने रहे हैं। सातवें दशक से मणिपुर सरकार के शिक्षा निदेशालय ने बाल-साहित्य के लिए एक पुरस्कार योजना शुरू की थी। ऐसा ही एक प्रयास एस0सी0ई0आर0टी0 ने भी किया था। इन योजनाओं का उद्देश्य लेखन के साथ ही पुस्तक प्रकाशन को भी प्रोत्साहन देना था। यह उद्देश्य निश्चित रूप से ही पूर्ण हुआ, किंतु साहित्य के इतिहास लेखकों द्वारा बाल-साहित्य को फिर भी गंभीरता से नहीं लिया गया। परिणाम सामने है, मणिपुरी बालासाहित्य का कोई वैज्ञानिक और, प्रामाणिक इतिहास आज तक नहीं लिखा जा सका। पिछले वर्षों में कुछ लेखक-संगठनों और सरकारी विभागों द्वारा बाल-साहित्य विषयक कुछ आयोजन हुए हैं, किंतु वे बाल-साहित्य और उसके लेखकों की ओर ध्यान खींचने वाले प्रभावहीन प्रयास भर थे। इतिहास से उनका कोई लेना-देना नहीं था। मणिपुरी बाल-साहित्य के समक्ष एक बड़ी समस्या उसके विकास के लिए किसी ठोस योजना का अभाव है।
एक गंभीर समस्या प्रौढ़ साहित्य के लेखकों का बाल-साहित्य रचना की ओर ध्यान न देना भी है। मणिपुरी भाषा के सैकड़ों नए-पुराने लेखकों में मात्र दो-चार ही ऐसे हैं, जिन्होंने कभी बाल-साहित्य रचा है। इतना ही नहीं, उनकी दृष्टि से बाल-साहित्य लेखकों का कोई गंभीर लेखकीय व्यक्तित्व नहीं है। यह हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में भी है, किंतु मणिपुरी भाषा में संभवतः सबसे अधिक है।
एक बात और, इस आलेख के अनुसार मणिपुरी भाषा में बाल-साहित्य का इतिहास बीसवीं शताब्दी के छठे दशक से प्रारंभ हुआ है। यह निष्कर्ष प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त पुस्तकों और तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। किंतु मौखिक स्रोतों को भी विश्वास योग्य माना जाए तो मणिपुरी भाषा की पहली बाल-साहित्य की पुस्तक सन् 1947 में प्रकाशित हुई थी। कुछ वृद्ध लोगों को उस पुस्तक की क्षीण-सी स्मृति है, किंतु वे पुस्तक और उसके लेखक, दोनों का ही नाम बताने में असमर्थ हैं। उस काल में ङसि दैनिक में बाल-साहित्य के प्रकाशन का तथ्य तो प्रामाणिक ही है, अतः उसी अवधि में किसी पुस्तक की संभावना से भी पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता। तब मणिपुरी बाल-साहित्य के इतिहास को काफी पीछे ले जाना होगा