बुधवार, 29 अप्रैल 2015

कॉकबरक कविताएँ
मूल :-   नंद्कुमार देबबर्मा
वह कहानी



वे कभी खींचा करते थे राजा का रथ
आज भी खीचते जा रहें हैं
वे सात घोड़े ही तो जानते – महसूस करते हैं
राजा का वजन –
सातों घोड़ों के पीछे राजा का ध्वज उठाए
एक और घोड़ा चलता हैं
जिसे मालूम हैं ध्वज का वजन
राजा सदा से यह जानते रहें हैं
सामने खड़ा हैं प्रतिरोध
जिनके हाथों में राइफ़ले हैं , बन्दूके हैं |
जजिया में वे देते हैं
अपनी भूख और अपना दिल ,
वे ही लिखते हैं –
मृत्यु और रक्त से गीत |
राजा के सात घोड़े बहुत पहले ही
सूंघ लेते हैं उस जगह को
जहाँ प्रतिरोध के बीज बोना वर्जित हैं |
युद्ध ख़त्म होता हैं
सातों घोड़ों को मिलती है
झुलसी हुई रोंटिया
सुनहरी झालर से सजाया जाता है
आठवें घोड़ो का मस्तक
राजा के नर्म हाथ
उसकी पीठ सहलाते हैं
घोड़े भी सुनते हैं गीत
सातवाँ घोड़ा गीत बुनता हैं |
जिसके सामने एक दिन परास्त होगा
राजा का सिरस्त्राण  |





नया साल
आश्विन का महीना हैं
समय हैं चील के नीचाई पर उड़ने का |
तिल के बीजो के अंकुरण का
समय हैं धान के पकने का
खेतों के रोने का
और पहाड़ों के हंसने का |
समय हैं पुराने और नए साल के संगम का
समय हैं अभिभावकों के वर – वधु खोजने का
उन्हें परिणय सूत्र में बंधने का ,
जॉरा हैं त्रिंग का ,
नए साल का |



सूखे के बाद वर्षा

                          ‘ इस बार ईश्वर ने दया की हैं –
कह रहे थे वे दोनों ,
उन्होंने पहने थे ,घुटनों तक ऊँचे कपडे
उनके चेहरे पर खिला था भोलापन
और शरीर से फुट रही थी
कीचड़ – मिटटी की गंध
वे खड़े थे , वही जहां सिल रही थी
बारिश , धरती की दरारे और
कर रही थी निरिक्षण
सूखे के बाद के अपने कुशल कार्य की
अब उन्हें ईश्वर की नहीं
एक मनुष्य की जरुरत हैं
जिसकी मुट्ठियों में भरे हों बीज
वे जानते हैं
सूखे के बाद की वर्षा ,
संतान के लिए माँ का अजस्त्र प्रेम हैं | 



पुकार

                                                             करता हूँ रात – दिन इंतज़ार
एक आवाज के लिए
अकेला , मैं  अकेला
जाने कब टकराएगी आवाज से आवाज
और गूंजेगी
समवेत आवाज
जो खिलाएगी जंगल में फूल
क्रांति की राह पर कदम रखने
नई पीढ़ी को सौंपने उसका
दाय – भाग
यह एक आवाज इन्तजार करवाएगी
और कितना .............





संघर्ष की राह

वहीं छोड़ आया था
तेज तीखी आवाज
दबा आया था
पत्थरों के तले
चक्कर लगाती हुई उसके चारों ओर
निकल जाति हैं नदी
पास ही खिला है खुमपुई
लौटता हूँ पुन:
पत्थर हटाने , बात रखने के लिए
अब भी मन को प्रेरित करने के लिए
इंतज़ार में हैं बादल
बुला लाते हैं नवाई को
चाँदनी छिटकाती रात
सुनाती है समूह में कथा
लेकिन
अब कहाँ मिलती है पवित्र ओस
दोस्तों , जंगल अभी भी प्रतीक्षारत है |



नदी किनारे घर

फिर बटोंरुगा सुखे पत्ते
वहीं से जहाँ कुंकॉक के गीत भी
जहरीले हो गए है
मैं नहीं तो कई और
इस समय भी जिसे है
जीवन से गोपन प्रेम
मुझे मालुम है, ऐसे अनगिनत
साथी होंगे खड़े
ह्वागहों – मेकांग के किनारे
जो गा रहे होंगे
कुहासे की चादर चीर
भोर के स्वागत में गीत
लड्न्तराई के गायरींग के
खुल जाएँगे पूर्वी दरवाजे
प्रवेश करेंगी नाना क्रुतुएँ
फूलों की बहार लिए
क्यों न हो
मेरा घर भी नदी किनारे
जिनमें रखी होंगी मेरी संतान के लिए
गोपन कथाएँ
कवि भी तो मनुष्य है
उसकी भी मृत्यु होगी
हत्या भी हो सकती है उसकी
यदि ऐसा हुआ तो
ह्वांगहो , मेकांग , गोमती के समवेत
रुदन से टूट जाएँगे तटबंध
लोगों के पद चिन्ह रेत पर
अमर रह जाएँगें |  

अनुवाद – डॉ. मिलन जमातिया

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